अकर्मण्यता और कायरता मानव जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप

अकर्मण्यता और कायरता मानव जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप

वीर भूमि खिंदौड़ा में परशुराम कालीन शिवमन्दिर में सनातन धर्म की रक्षा और इस्लामिक जिहादियो के समूल विनाश की कामना से चल रहे माँ बगलामुखी महायज्ञ के साथ ही चल रही श्रीमद्भागवद कथा के दूसरे दिन कथा वाचन कर रहे विख्यात धर्मज्ञ यति नरसिंहानन्द सरस्वती जी महाराज ने श्रीमद्भगवद गीता के अवतरण पर प्रकाश डालते हुए बताया कि युद्धभूमि में शत्रुओं के सामने खड़े महावीर अर्जुन के मन में जब भय और मोह इतना बढ़ गया की उसने युद्धभूमि को छोड़ने का निश्चय कर लिया तो भगवान श्रीकृष्ण ने अपने शिष्य और मित्र को कायरता और अकर्मण्यता के अभिशाप से बचाने के लिये उसे गीता का उपदेश दिया।पुरे विश्व में केवल श्रीमद्भगवद गीता ही एकमात्र ऐसी पुस्तक है जिसे स्वयं परमात्मा ने अपनी वाणी से एक मानव को माध्यम बना कर संपूर्ण मानवता को प्रदान किया है।गीता मानवता के लिए साक्षात् अमृत कलश है।गीता के अवतरण के बाद पूरी दुनिया में धर्म और आध्यात्म की जितनी भी पुस्तकें लिखी गयी हैं उनपर गीता की छाप स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है।
उन्होंने बताया की भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के माध्यम से पूरी मानवता को बताया की मानव के जीवन में कायरता और अकर्मण्यता से बड़ा कोई अपराध हो ही नहीँ सकता।जो मनुष्य कायरता के वशीभूत होकर अकर्मण्य हो जाता है,उसके सभी सद्गुण नष्ट हो जाते हैं।जो व्यक्ति या समाज अपने जीवन में कायरता और अकर्मण्यता को स्वीकार कर लेता है,वह व्यक्ति या समाज सम्मान और स्वाभिमान के साथ जीने का अधिकार खो देता है।धर्म वही है जो व्यक्ति और समाज को साहसी,उत्साही और कर्मशील बनाता है क्योंकि धर्म का सबसे पहला कार्य अधर्म का विनाश होता है।जो भी कोई अधर्म के सामने लड़ने का साहस नहीँ करता,उसे धार्मिक नहीँ बल्कि पाखण्डी माना जाना चाहिये।
महायज्ञ के दूसरे दिन बड़ी मात्रा में क्षेत्रवासियों ने अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई।
मंदिर के महंत यति रामानन्द सरस्वती जी महाराज और बाबा परमेन्द्र आर्य ने क्षेत्रवासियों का इस महान आयोजन में तन,मन और धन से समर्थन माँगा ताकी यह मात्र एक आयोजन न रह जाए बल्कि यह मानवता और इतिहास पर अपना प्रभाव डालने वाली घटना बने।
सुन्दर कुमार (प्रधान सम्पादक)

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