अक्षयवट : एक अनमोल धरोहर

अक्षयवट : एक अनमोल धरोहर

सृष्टि संकल्प की अवधारणा को मूर्त रूप देने के लिए जब पारब्रह्म परमेश्वर ने अपनी शक्ति सत्ता को वैसे ही गुणों के अनुरूप अवतरित करना प्रारम्भ किया तो उसी क्रम में धराधाम को उसे वरदान स्वरूप अखण्ड महत्ता, प्रताप एवं पुण्य से युक्त अक्षयवट सत्य सनातन धर्म के संबल के रूप में सतोगुणी सरस्वती, रजोगुणी गंगा एवं तमोगुणी यमुना के प्रकृष्ट ब्रह्मयज्ञ से तेजःपुंजभूत परम पावन प्रयाग के संगम के तट पर प्रदान किया।

अपनी अत्याधुनिक वैज्ञानिक क्षमता पर इतराने वाला विज्ञान भी इसकी चमत्कारिक प्रतिभा का कायल हो चुका है। प्रलयकाल में जिस परम पावन वृक्ष के शीतल, मंद एवं सुगंधित जीवन वायु प्रसृत करने वाले पत्ते पर स्वयं परमेश्वर अपने समस्त गुण तत्व को स्वयं में केन्द्रीभूत कर सृष्टि के आरम्भ तक विश्राम करते हों। त्रिलोकी नाथ भगवान श्रीरामचन्द्र ने जिसे स्वयं अक्षय होने का वरदान दिया। जिससे उसका नाम आज भी अक्षयवट के रूप में जाना जाता है।

उसकी महत्ता का ज्ञान अपनी अल्प, अपूर्ण एवं दिशाविहीन इतरवैदिक तथाकथित अति उत्कृष्ट वैज्ञानिक संसाधनों के बल पर कैसे प्राप्त किया जा सकता है? जिसकी महत्ता का गुणगान बौद्ध धर्मावलम्बी चीनी यात्री ह्वेन सांग अपनी भारत यात्रा प्रकरण में कर चुका है। कट्टर हिन्दू विरोधी मुस्लिम शासक औरंगजेब ने अपनी सम्पूर्ण शक्ति लगाकर जिस वटवृक्ष को उखाड़ फेंकना चाहा तथा जिसे समूल जला भी दिया। जिसका अवशेष आज भी इस पावन वटवृक्ष के मूल में देखा जा सकता है। फिर भी इस परम शक्तिशाली वृक्ष का कुछ नहीं बिगाड़ सका। उसकी महिमा का गुणगान या उसकी परीक्षा आज का विज्ञान भला क्या ले सकता है?

भारतीय पुरातत्व एवं अन्वेषण विभाग के प्रसिद्ध अनुसंधानकर्त्ता डॉ. राखल दास बनर्जी ने जब इस वृक्ष की आयु जाननी चाही तो इसका रासायनिक परीक्षण कराया। तो यह परिणाम सामने आया कि इस वृक्ष की आयु कम से कम 3250 ई.पू. होनी चाहिए अर्थात इसकी उम्र 3250 ई.पू. से किसी भी तरह कम नहीं है। इससे ज्यादा कितनी है। इसका पता नहीं।

इस वृक्ष का आकार प्रकार, रूपरेखा, बनावट, इसके पत्तों का आकार, रंग एवं इसके छाया की अनुभूति साधारण वटवृक्ष से सर्वथा ही भिन्न है। इसे आज भी प्रत्यक्षतः देखा जा सकता है। रासायनिक, वैदिक एवं पौराणिक ग्रन्थों एवं प्रत्यक्ष विश्लेषण से इस वृक्ष के तीन रूप सामने आते हैं। इसका एक भाग जो गंगा प्रवाह की दिशा में है- इसे बीज, जो भाग यमुना प्रवाह की दिशा में है- उसे छन्द तथा जो मध्यवाला भाग है, जिसे औरंगजेब ने सतत प्रयत्न के द्वारा जलाना चाहा, उसे प्रणव के रूप में जाना जाता है।

आज का विज्ञान भी इस बात को पूरी तरह मानता है कि यही एकमात्र ऐसा वृक्ष है। जिससे रात दिन निरन्तर नाइट्रोजन परॉक्साइड, कन्सन्ट्रेटेड ऑक्सीजन एवं क्लोरोटॉक्सीकेन उत्सर्जित होता रहता है तथा इसकी जड़ें डाई अमोनियम फॉस्फेट, डाईअमोनियम सल्फेट एवं जिंक सल्फेट का निर्माण करती रहती हैं।

कुछ वर्षों पहले जब कभी संगम इसी वटवृक्ष के नीचे हुआ करता था। किन्तु आज नदियों की धारा में विचलन या विकृति के कारण संगम कुछ दूर हट गया है, इस वृक्ष के ये तीनों ही भाग उस संगम के जल को स्पर्श कर उसमें आई कृत्रिम कलुषता का नाश करते थे। इसी वृक्ष की शीतल छाया में बड़े-बड़े भारद्वाज ऋषि जैसे महान तपस्वी अपना आश्रम बनाकर निरन्तर तप-साधना किया करते थे।

मुगलकाल में अकबर ने इन आश्रमों को विध्वंस कर उसके ऊपर अपना किला बनवा लिया। कुछ हिस्सा जो वह अन्त में भयभीत होकर छोड़ दिया। वह आज भी श्पातालपुरीश् मंदिर के नाम से प्रसिद्ध एक दर्शनीय स्थल है। अक्षयवट से तो वह इतना भयभीत हो गया कि उसे अपने किले की सीमा में लिया ही नहीं। बाद में अपनी हिन्दू पत्नी जोधाबाई की प्रसन्नता तथा वटवृक्ष को आदर सम्मान देते हुए उसने इसके चारों तरफ चहारदीवारी खड़ी कर दी।

कुछ एक किंवदन्तियाँ यह भी सुनने को मिलती हैं कि अकबर ने उसे घेरे में इस लिए ले लिया कि इसकी पूजा से शक्ति प्राप्त कर कोई हिन्दू राजा उसे पराजित न कर दें। अस्तु सत्य परमात्मा ही जाने। वर्तमान समय के लिए यह एक अति विचित्र एवं चमत्कृत कर देने वाला विषय है कि अपनी प्रबल बाढ़ विभीषिका से बड़े-बड़े तटवर्ती वृक्ष एवं भवनों को धराशाही कर देने वाली गंगा एवं यमुना की भयंकर लहरें भी इसका कुछ नहीं बिगाड़ सकीं तथा यह वृक्ष आज भी अटल, अक्षय एवं अमिट होकर गर्व से सीना ताने खड़ा उनके किनारे पर मुस्कुरा रहा है।

कुछ एक अति दुर्लभ एवं रहस्यमय तांत्रिक ग्रन्थों की मानें तो इसके तीनों विभाग वाले पत्तों का यंत्र बना कर घर में रखने से दुःख दारिदर््य का नाश होता है। यह एक बहुत ही अनुभूत प्रसंग है। जिसका परीक्षण अनेक लोगों द्वारा किया जा चुका है। हेमाद्रि ने मतंग मुनि के किसी अश्वत्थ विजय नामक ग्रन्थ अथवा शीर्षक का उल्लेख करते हुए कहा है कि-

सानुज दाशरथी रामेण सवैदेही कृतश्रमः। पृथकीकृतत्रिपत्रेण वटयंत्रं दुःखनाशकं।

असवश्वत्थ कृतं यंत्रं क्षितिजाधारं यः धारयेत्। सैव दुःखमुक्तं खलु क्क द्द्वीँ क्लीमंकितः।

इसकी व्याख्या इस प्रकार की गई है कि दशरथ पुत्र राम उनके भाई लक्ष्मण एवं वैदेही जानकी के द्वारा श्रमपूर्वक (अपनी कीलक शक्ति के द्वारा) वटवृक्ष को तीन दिशाओं में जो अभियंत्रण शक्ति प्रदान की गई। उन अलग-अलग दिशाओं वाले तीन पत्रों से बना यंत्र समस्त दुःखों का नाश करने वाला होता है। अश्वत्थ अर्थात वटवृक्ष के क्षतिजाकार पत्तों को क्रमशः श्क्क द्द्वीँ क्लींश् अंकित कर यंत्र के रूप में जो नर धारण करता है। वह दुःख मुक्त हो जाता है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि इस वटवृक्ष के नीचे आते ही समस्त अन्तःकरण एक असीम शान्ति से भर जाता है। समस्त पाप एवं कलुषता क्षण भर के लिए ही सही, निर्मूल हो जाती है। इसे प्रत्यक्ष रूप में आज भी देखा जा सकता है। पारब्रह्म परमेश्वर प्रदत्त धराधाम के इस परम पवित्र अनमोल धरोहर का दर्शन प्रत्येक व्यक्ति को आवश्यक रूप से करना चाहिए।

यह संयोग की बात है कि इसकी देखरेख का उत्तरदायित्व भारतीय सेना के ऊपर है। जिससे सनातन धर्म का यह अनमोल धरोहर आज भी धराधाम को पावन करने के लिए सुरक्षित है। अन्यथा आज इसके जड़ की मिट्टी भी खोदकर तस्करी कर दी जाती या फिर इसके टुकड़े-टुकड़े कर बड़े घरों को पहुँचा दिया जाता। जैसा कि आमतौर पर भारत में अति दुर्लभ चीजों के साथ होता है।

सुधीर शुक्ल

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