अदिति-दिति

अरुण कुमार उपाध्याय (धर्मज्ञ)


वेद में प्रायः अदिति का उल्लेख है। उसके विपरीत दिति है।
दिति का अर्थ है, कटा या खण्डित भाग। दो अवखण्डने (पाणिनि धातुपाठ, ४/३९)। जो अखण्ड है वह अदिति है। अदिति के बारे में वेद-मन्त्र है-
अदितिर्द्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्रः।
विश्वेदेवा अदितिः पञ्चजना अदितिर्जातमदितिर्जनित्वम्॥
(ऋक्, १/८९/१०, अथर्व, ७/६/१, वाज. यजु, २५/२३, मैत्रायणी संहिता, ४/१४/४ या २२/१, ऐतरेय ब्राह्मण, ३/३१/९, तैत्तिरीय आरण्यक, १/१३/२)
(१) द्यौ अदिति-प्रकाशित भाग अदिति है। इसके विपरीत अन्धकार भाग दिति है। सूर्य से देखने पर पृथ्वी (या अन्य ग्रह) का प्रकाशित भाग अदिति, ग्रह से कटा अन्धकार भाग दिति है।
पृथ्वी सतह पर देखने से क्षितिज के ऊपर आकाश का दृश्य भाग अदिति है, नीचे का भाग दिति है। क्षितिज वृत्त पर ८ दिशा तथा कोण अदिति के ८ पुत्र हैं।
अष्टौ पुत्रासो अदितेः (ऋक्, १०/७२/८, मैत्रायणीसं. ४/६/९ या ९२/२, शतपथ ब्राह्मण, ३/१/३/२, तैत्तिरीय आरण्यक, १/१३/२)
(२) अन्तरिक्ष अदिति-ग्रह, तारा या ब्रह्माण्ड पिण्डों के बीच के खाली स्थान अन्तरिक्ष हैं। ये पूरी तरह शून्य नहीं हैं, बल्कि विरल पदार्थ से भरे हैं जिनको विभिन्न प्रकार का जल या अप् कहा जाता है। अन्तरिक्ष में जो प्रकाश मार्ग है वह अदिति तथा छाया मार्ग या पिण्डों से बाधित मार्ग दिति है। इनको कठोपनिषद् (१/३/१) में छाया-आतप मार्ग कहा है-
ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे ।
छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति पञ्चाग्नयो ये च त्रिणाचिकेताः ॥ (कठोपनिषद्, १/३/१)
(३) माता अदिति-अपने गर्भ में जन्म देने वाले ओ माता कहते हैं। चेतन तत्त्व पुरुष है। पुरुष ने प्रकृति द्वारा सृष्टि का निर्माण किया। प्रकृति ८ प्रकार की है जिससे पुनः निर्माण सम्भव है। ये अदिति के ८ पुत्र हैं। ८ प्रकार की प्रकृति से १६ प्रकार की विकृति होती है, जिनसे पुनः निर्माण नहीं होता। ये दिति हैं। अदिति के पुत्र आदित्य हैं। ३ प्रकार के आदित्यों से विश्व के ३ धाम बने-अर्यमा से स्वयम्भू मण्डल, वरुण से परमेष्ठी मण्डल, मित्र से सौर मण्डल। आदित्य देव प्राण हैं, जिनसे सृष्टि होती है। असुर प्राण से सृष्टि नहीं होती। भौतिक विज्ञान के अनुसार परिवेश से अधिक तापक्रम होने पर ही कार्य हो सकता है। जैसे मोटर कार में प्रायः २५% ऊर्जा का ही उपयोग हो पाता है,जो देव प्राण है। मनुष्यों में भी जो स्वयं उत्पादन नहीं करते, असु या शक्ति द्वारा उसे छीनते हैं, वे असुर हैं। आत्मनिर्भर देव हैं।
भूमिरापोऽनलो वायुः ख्ं मनो बुद्धिरेव च।
अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा॥ (गीता, ७/४)
मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्।
हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते॥ (गीता, ९/१०)
अष्टौ प्रकृतयः (सांख्य तत्त्व समास, २)-प्रकृति के ३ गुणों-सत्त्व, रज, तम का समन्वय २ x २ x २ = ८ प्रकार से होता है। ये अदिति के ८ पुत्र हैं-जिनके नाम हैं-प्रकृति (मूल प्रकृति या प्रधान), महत् (कणों या पिण्डों का समूह), अहंकार (पिण्ड का एकत्व), ५ तन्मात्रा-शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध।
षोडश विकाराः (तत्त्व समास, ३)-८ प्रकृतियों से सत्त्व और रज द्वारा पुनः निर्माण होने से १६ विकार होते हैं। तम से कोई निर्माण नहीं होता। १६ विकार दिति हैं जिनके नाम हैं-पञ्च महाभूत-आकाश, वायु, अग्नि, अप्, भूमि, मन, ५ ज्ञानेन्द्रिय, ५ कर्मेन्द्रिय।
(४) पिता-पुत्र क्रम-एक व्यक्ति नष्ट हो जाता है, पर पिता-पुत्र या गुरु-शिष्य क्रम से समाज तथा सभ्यता चलती रहती है। समाज और ज्ञान का अनन्त क्रम अदिति है। सनातन क्रम को नष्ट कर अपना व्यक्तिगत मार्ग आरम्भ करना दिति है। यह ब्रह्म के विपरीत अब्राहम मत हैं।
सृष्टि में भी कोई पिण्ड विशेष जन्म लेता और नष्ट होता है। यह क्षर रूप दिति है। किन्तु स्रोत से निर्माण का क्रम सदा चलता रहता है जिसे अविनाशी अश्वत्थ कहा गया है। यह अव्यय पुरुष रूप अदिति है।
ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्॥ (गीता, १५/१)
(५) विश्वेदेव अदिति-देवों का विश्वव्यापी रूप अदिति है। किसी स्थान, काल या मनुष्य जाति में सीमित देव दिति हैं। देव वर्ग कहता है कि सभी देव एक ही ब्रह्म के रूप हैं-तत् सृष्ट्वा तदेव अनुप्राविशत् (तैत्तिरीय उपनिषद्, २/६)। दैत्य वर्ग कहता है कि केवल मेरा देव ठीक है, इसे मान लो नहीं तो मारे जाओगे।
(६) पञ्चजन अदिति-पञ्च जन के कई अर्थ हैं-
औपमन्यव आचार्य के अनुसार ४ वर्ण तथा निषाद मिल कर पञ्चजन हैं।
अन्य के अनुसार गन्धर्व, पितर, देव, असुर, राक्षस पञ्चजन हैं। (निरुक्त, ३/७)
ब्राह्मण ग्रन्थों में देव, मनुष्य, गन्धर्व, अप्सरा, सर्प तथा पितर को पञ्चजन कहा है।
सर्वेषां वा एतत् पञ्चजनानाम् उक्थं देवमनुष्याणां गन्धर्वाप्सरसाम्, सर्पाणां च पितॄणां च। (ऐतरेय ब्राह्मण, ३/३१)
पञ्चजन एक समुद्री दैत्य भी था जिसे मार कर भगवान् कृष्ण ने पाञ्चजन्य शंख लिया था। यह शंख जाति का जीव है। भागवत पुराण (५/१९/२९-३०) में जम्बू द्वीप के ८ उपद्वीपों में एक का नाम पाञ्चजन्य कहा है। यह वर्तमान काल का जापान या निप्पन है, जो पाञ्चजन्य के अपभ्रंश हो सकते हैं। इसके ५ मुख्य द्वीप हैं, जिनमें एक सखालिन पर अभी रूस का अधिकार है। अन्य ४ जापान के पास हैं-होक्कैडो, होन्शू, शिकोक्यू, क्यूशू। यहां आज भी मन्दिरों में केवल शंख बजा कर ही पूजा होती है।
पच् धातु से पञ्च हुआ है अर्थात् मिलित रूप। ५ जातियों या भिन्न तत्त्वों का मिलित रूप अदिति है। ५ महाभूतों से बना विश्व का एकीकृत रूप अदिति है जिसे प्रपञ्च (५ तत्त्वों का ५ से मिलन) कहा गया है। समाज या विश्व के ५ प्रकार के वर्ग मिल कर परस्पर सहयोग करें, वह अदिति है। बाह्य या आन्तरिक वर्ग संघर्ष दिति है। ५ जातियां इन्द्र के नेतृत्व में एकत्र थीं उनको पञ्चजन कहा गया है-
यत् पाञ्चजन्यया विशा, इन्द्रे घोषा असृक्षत (ऋक्, ८/६३/७)
(७) अदितिर्जातमदितिर्जनित्वम्-सृष्टि या संवत्सर का सनातन अनन्त चक्र अदिति है। खण्डित भाग दिति हैं।
जिस समय अदिति के पुत्र मनुष्य की देव जातियों का प्रभुत्व था उस समय पुनर्वसु नक्षत्र से वर्ष का अन्त तथा आरम्भ होता था। अतः उस नक्षत्र का देवता अदिति कहा गयाहै। प्रायः १७,५०० ईपू. में पुनर्वसु नक्षत्र में विषुव संक्रान्ति होता थी। उसके बाद १० युग = ३६० x १० = ३६०० वर्षों तक देव असुरों में संघर्ष चला। तब १३९०० ईपू में वैवस्वत मनु के समय सूर्यवंश का प्रभुत्व आरम्भ हुआ। उनके बाद सत्य (४८०० वर्ष), त्रेता (३६००), द्वापर काअन्त ३१०० ईपू में हुआ।
सख्यमासीत्परं तेषां देवनामसुरैः सह ।
युगाख्या दश सम्पूर्णा ह्यासीदव्याहतं जगत्॥६९॥
दैत्य संस्थमिदं सर्वमासीद्दशयुगं किल॥९२॥
अशपत्तु ततः शुक्रो राष्ट्रं दश युगं पुनः॥९३॥ (ब्रह्माण्ड पुराण, २/३/७२)
युगाख्या दश सम्पूर्णा देवापाक्रम्यमूर्धनि।
तावन्तमेव कालं वै ब्रह्मा राज्यमभाषत॥ (वायु पुराण, ९८/५१)

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