अरुन्धती

अरुण कुमार उपाध्याय (धर्मज्ञ)-

सप्तर्षि मण्डल में वसिष्ठ के साथ मन्द प्रकाश का तारा अरुन्धती वास्तव में युग्म तारा हैं, इसका ज्ञान बहुत प्राचीन काल से था। आधुनिक विज्ञान में प्रायः १०० वर्ष से युग्म ताराओं का ज्ञान है तथा उनकी परस्पर परिक्रमा का काल बहुत बाद में पता चला। आकाश में जो तारा निकट दीखते हैं वे वास्तव में बहुत दूर हैं, केवल पृथ्वी से वे एक साथ दीखते हैं। पर अरुन्धती और वसिष्ठ परस्पर परिक्रमा करते हैं और आगे पीछे होते रहते हैं, यह महाभारत पूर्व से ज्ञात था। साथ रहते हुए भी अरुन्धती तारा बाधा नहीं देता है। इसके विपरीत-रुन्धति = रुद्ध करता है, रोकता है। अतः विवाह के समय पति-पत्नी द्वारा इसका दर्शन किया जाता है। यह रात्रि में ही सम्भव है। यह प्रतीक है कि परस्पर साथ रहते हुए सहयोग करें, बाधा नहीं दें। स्वामी दयानन्द सरस्वती की पुस्तक संस्कार विधि के विवाह प्रकरण, पृष्ठ १६५ पर ध्रुवतारा तथा अरुन्धती दर्शन विषय में लिखा है-
ॐ ध्रुवमसि ध्रुवाहं पतिकुले भूयासम् (अमुष्य असौ)-गोभिल गृह्य सूत्र (२/३/८)
उसके बाद-अरुन्धतीं पश्य-गोभिल गृह्य सूत्र (२/३/९)
सुश्रुत संहिता के अनुसार आयुष पूरा होने के समय अरुन्धती तारा नहीं दीखता है-
न पश्यति सनक्षत्रां यस्तु देवीमरुन्धतीम्।
ध्रुवमाकाशगङ्गां च तं वदन्ति गतायुषे॥
(सुश्रुत, सूत्र स्थान, ३०/२०)
अथर्व वेद (४/१२/१, ५/५/५,९, ६/५९/१-१, १९/३८/१) में अरुन्धती लता का वर्णन है जो प्लक्ष, अश्वत्थ, न्यग्रोध और पर्ण के वृक्षों पर चढ़ती (रोहिणी) है (अथर्व, ५/५/५)। आकाश में रोहिणी तथा वसिष्ठ प्रायः समान राशि पर हैं। अरुन्धती लता से घाव भरते हैं तथा गायों का दूध बढ़ता है।
तैत्तिरीय आरण्यक (३/९/२) में अरुन्धती का नक्षत्र रूप में उल्लेख है-ऋषीणामरुन्धती।
योग कुण्डली उपनिषद् (१/९) में प्राण के निर्बाध प्रवाह (अरुन्धती) को सरस्वती नाड़ी कहा गया है-
तयोरादौ सरस्वत्याश्चालनं कथयामि ते।
अरुन्धत्येव कथिता पुराविद्भिः सरस्वती॥
महाभारत के भीष्म पर्व में विपत्ति के शकुन के रूप में कहा है कि जो अरुन्धती पतिव्रताओं में श्रेष्ठ हैं, उन्होंने वसिष्ठ को अपने पीछे कर दिया है-
या चैषा विश्रुता राजंस्त्रैलोक्ये साधुसम्मता।
अरुन्धती तयाप्येष वसिष्ठः पृष्ठतः कृतः॥
(महाभारत, भीष्म पर्व, २/३१)
अरुन्धती तथा वसिष्ठ के आगे पीछे होने के आधार पर श्री नीलेश ओक ने काल निर्धारण का प्रयत्न किया है। उसकी विस्तृत समीक्षा श्रीमती जयश्री शरनाथन ने की है।

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