असाधारण पराक्रमी झांसीकी रानी लक्ष्मीबाई

-श्री सुरेश मुंजाल – हिन्दू जनजागृती समिति

जन्म तथा बाल्यावस्था
दूसरे बाजीराव पेशवा के बंधु चिमाजी अप्पा के व्यवस्थापक मोरोपंत तांबे तथा भागीरथीबाई दंपति के घर कार्तिक कृष्ण १४, शके १७५७ अंग्रेजी कालगणनानुसार १८ नवंबर, १८३५ को लक्ष्मीबाई का जन्म हुआ । मोरोपंतने उसका नाम ‘मनुताई’ रखा । मनुताई सुन्दर तथा कुशाग्रबुद्धि की थी । जब मनुताई ३-४ वर्ष की थी तब उनकी मां का निधन हो गया । वह आगे ब्रह्मावर्त (बिठूर, उत्तर प्रदेश) में दूसरे बाजीराव पेशवाके आश्रय में चली गई ।

युद्धकला का शिक्षण
ब्रह्मावर्त की हवेली में नाना साहेब पेशवा अपने बंधु रावसाहेब के साथ तलवार, दंडपट्टा तथा बंदूक चलाना साथ ही घुडदौड का शिक्षण लेते । उनके साथ रहकर मनुताई ने भी युद्धकला का शिक्षण लेकर उसके दांवपेंच सीख लिए । अक्षर- ज्ञान तथा लेखन-वाचन मनुताई ने साथ-साथ ही सीख लिया ।

विवाह
आयु के ७ वें वर्ष में शके १७६४ के वैशाख, १८४२ ईस्वीमें मनुताई का विवाह झांसी रियासत के अधिपति गंगाधरराव नेवाळकर के साथ धूम-धाम से हुआ । मोरोपंत तांबे की मनुताई विवाह के उपरांत झांसी की रानी के नाम से पुकारी जाने लगीं । विवाह के उपरांत उनका नाम ‘लक्ष्मीबाई’ रखा गया ।

पुत्र वियोग का दु:ख
इ.स. १८५१ मार्गशीर्ष शु. एकादशी को रानी लक्ष्मीबाई ने एक पुत्र रत्न को जन्म दिया । गद्दी का उत्तराधिकारी मिल गया । इस कारण गंगाधरराव अति प्रसन्न हुए । जब वह मात्र तीन महीने का था उस समय काल ने उसे छीन लिया तथा रानी लक्ष्मीबाई तथा गंगाधरराव को पुत्र वियोग का दु:ख सहन करना पडा ।

पति वियोग का आघात तथा दत्तक विधान
पुत्र वियोग का दुःख सहन न होने के कारण, अस्वस्थ होकर गंगाधरराव कुछ मास में ही संग्रहणी के विकार से ग्रस्त हो गए । गंगाधरराव की इच्छानुसार गद्दी के उत्तराधिकारी के रूप में नेवाळकर राजवंश के वासुदेव नेवाळकर के पुत्र आनंदराव को दत्तक लेकर उसका नाम ‘दामोदरराव’ रखा गया । दत्तक विधि के उपरांत २१ नवंबर १८५३ की दोपहर गंगाधरराव मृत्यु को प्राप्त हो गए । पति के निधन के कारण आयुके मात्र १८वें वर्ष में ही रानी लक्ष्मीबाई विधवा हो गई ।

‘मेरी झांसी नही दूंगी’
७ मार्च १८५४ को अंग्रोजों ने एक राज घोषणा प्रसिद्ध कर झांसी रियासत के सर्व अधिकार निरस्त कर दिए । रानी लक्ष्मीबाई इस अन्याय की आग में जलते हुए भी गोरा अधिकारी मेजर एलिस लक्ष्मीबाई से मिलने आया । उसने झांसी संस्थान निरस्त किए जानेकी राज घोषणा पढकर सुनाई । संतप्त रानी लक्ष्मीबाई से एलिस ने वापस जाने की अनुज्ञा मांगते ही चोटील शेरनी की भांति गरजकर वे बोलीं, ‘‘मेरी झांसी नहीं दूंगी!”, यह सुनकर एलिस निकल गया ।

१८५७ का संग्राम
१८५७ की जनवरी में प्रारंभ हुए स्वतंत्रता संग्राम ने १० मई को मेरठ में भी प्रवेश कर लिया । मेरठ के साथ ही दिल्ली, बरेली और झांसी भी अंग्रेजों के राज्य से स्वतंत्र हो गए । झांसी में अंग्रेजों की सत्ता समाप्त होने पर रानी लक्ष्मीबाई ने ३ वर्ष के बाद शासन हाथ में ली । उसके बाद उन्होंने अंग्रेजों के संभाव्य आक्रमण से झांसी की रक्षा करने की दृष्टि से सिद्धता की । अंग्रेजों ने लक्ष्मीबाई को जीवित पकड लाने हेतु सर ह्यू रोज को नामित किया । २० मार्च १८५८ को सर ह्यू रोज की सेना ने झांसी से ३ मील की दूरी पर अपनी सेना को पडाव डाला तथा लक्ष्मीबाई को शरण आने का संदेश भेजा; परंतु इसे न स्वीकार कर उन्होंने स्वत: झांसी के तट पर खडे होकर सेना को लडने की प्रेरणा देना आरंभ किया । लडाई प्रारंभ होनेपर झांसी के तोपों ने अंग्रेजों के छक्के छुडा दिए । ३ दिनों तक सतत लडाई करके भी झांसी के दुर्ग पर तोप न चला पाने के कारण सर ह्यू रोज ने भेद मार्ग का अवलंब किया । अंततः ३ अप्रैल को सर ह्यू रोज की सेना ने झांसी में प्रवेश किया । सेना ने झांसी के लोगों को लूटना आरंभ कर दिया । केंद्रीय दुर्ग से रानी लक्ष्मीबाई ने शत्रु का घेरा तोडकर पेशवाओं से जा मिलेने की ठानी । रात में चुनिन्दा २०० सवारों के साथ अपने १२ वर्ष के दामोदर को पीठ पर बांध ‘जय शंकर’ ऐसा जय घोष कर लक्ष्मीबाई दुर्ग से बाहर निकलीं । अंग्रेजों का पहरा तोडकर कालपी की दिशा में उन्होंने कूच की । इस बीच उनके पिता मोरोपंत उनके साथ थे । घेरा तोडकर बाहर जाते हुए अंग्रेजों की टुकडी के साथ हुई अचानक लडाई में वे घायल हो गए । अंग्रेजों ने उन्हें पकडकर फांसी दे दी ।

कालपी का संघर्ष
सतत २४ घंटे घोडा दौडाते १०२ मील अंतर पार कर रानी कालपी पहुंची। पेशवाओं ने सर्व परिस्थिति देखकर रानी लक्ष्मीबाई को सर्व सहायता करने का निश्चय किया । लडाई हेतु आवश्यक सेना उन्हें दिए गए । २२ मई को सर ह्यू रोजने कालपी पर आक्रमण किया । युद्ध आरंभ हुआ देख लक्ष्मीबाई ने हाथ की तलवार बिजली के चपलता से चमकाते हुए अग्राकूच की । उनके इस आक्रमण से अंग्रेज सेना पिछड गयी । इस हार से स्तब्ध हुए सर ह्यू रोज अतिरिक्त ऊंटों का दल रणभूमि पर ले आया । नए ताजे सेना के आते ही क्रांतिकारियों का आवेश न्यून हो गया । २४ मई को कालपी पर अंग्रेजों ने अधिकार कर लिया ।

कालपी में पराभूत रावसाहेब पेशवे, बांदा के नवाब, तात्या टोपे, झांसी की रानी तथा प्रमुख सरदार गोपालपुर में एकत्रित हुए । लक्ष्मीबाई ने ग्वालियर हस्तगत करने की सूचना दी । ग्वालियर के शिंदे अब भी ब्रिटिश समर्थक थे । रानी लक्ष्मीबाई ने आगे होकर ग्वालियर जीता तथा पेशवाओं के हाथ में दे दिया ।

स्वतंत्रता वेदी पर प्राणों का बलिदान
ग्वालियर की विजय का वृत्त सर ह्यू रोज को मिल गया था । उसके ध्यान में आया कि समय खर्च करने पर हमारी परिस्थिति कठिन हो जाएगी । उसने अपनी सेना का मोर्चा ग्वालियर की ओर कर दिया । १६ जून को सर ह्यू रोज ग्वालियर पहुंचा । सर ह्यू रोज से लक्ष्मीबाई तथा पेशवे ने मुकाबला करने की ठानी । ग्वालियर के पूर्व बाजू से रक्षण करने का काम लक्ष्मीबाई ने स्वयं पर लिया । लडाई में लक्ष्मीबाई का अभूतपूर्व धैर्य देख सैनिकों को स्फूर्ति आ गयी । उनकी मंदार तथा काशी ये दासियां भी पुरूष वेश में लडने आयीं । उस दिन रानी के शौर्य के कारण अंगे्रज पीछे हट गए ।

१८ जूनको रानी लक्ष्मीबाई के शौर्य से हताश अंग्रेजों ने ग्वालियर पर सर्व ओर से एकसाथ आक्रमण किया । उस समय शरणागति न करते हुए शत्रु का घेरा तोड कर बाहर जाने की सोची । घेरा तोडकर जाते हुए बाग का एक नाला आगे गया । रानी के पास सदा की भांति ‘राजरत्न’ घोडा न होने के कारण दूसरा घोडा नाला के पास ही गोल-गोल घूमने लगा । रानी लक्ष्मीबाई ने अपना भविष्य समझकर आक्रमण कर रहे अंग्रेजों पर धावा किया । इससे वह रक्त से नहाकर घोडे से नीचे गिर पडीं । पुरूष वेश में होनेके कारण रानी लक्ष्मीबाई को गोरे सैनिक उन्हें पहचान नहीं सके । उनके गिरते ही वे चले गए । रानी लक्ष्मीबाई के एकनिष्ठ सेवकों ने उन्हें पास ही स्थित गंगादास के मठ में ले जाकर उनके मुख में गंगोदक डाला । मेरा देह म्लेच्छों के हाथ न लगे, ऐसी इच्छा प्रदर्शित कर उन्होंने वीर मरण स्वीकार लिया ।

जगभर फैले क्रांतिकारियों को, सरदार भगत सिंह की संगठन तथा अंत में नेताजी सुभाषचंद्र बोस की सेना को यही झांसीकी रानी लक्ष्मीबाई के शौर्य ने स्फूर्ति दी । हिंदुस्तान की अनेक पीढियों को स्फूर्ति देते हुए झांसी की रानी तेईस वर्ष की बाली आयु में स्वतंत्रता संग्राम में अमर हो गई । ऐसी वीरांगना झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के चरणों में शतश: प्रणाम!

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