आइये जानें असम की प्राचीन संस्कृति को

आइये जानें असम की प्राचीन संस्कृति को   

(१) ब्रह्मा का स्थान-महाभारत शान्ति पर्व, अध्याय ३४८-३४९ में ७ मनुष्य ब्रह्मा का वर्णन है। उसमें पद्मनाभ ब्रह्मा का निवास असम में था। इन्होंने दक्ष, विवस्वान्, इक्ष्वाकु को शिक्षा दी थी। यह एक व्यक्ति नहीं हो सकते। दक्ष यज्ञ के बाद शिव का दूसरा विवाह हुआ जिससे कार्त्तिकेय उत्पन्न हुए। उनका जन्म प्रायः १५,८०० ईपू. था जब अभिजित नक्षत्र से उत्तरी ध्रुव की दिशा दूर हट रही थी तथा धनिष्ठा से वर्षा और वर्ष का आरम्भ होता था (महाभारत, वन पर्व, अध्याय २३०/८-१०)। वैवस्वान् के पुत्र वैवस्वत मनु १३९०२ ई.पू. में तथा इक्ष्वाकु ८५७६ ई.पू. में हुए। उनके पुत्र विकुक्षि (उकुसी) का इराक के किश में लेख मिला था जिसका काल ८३०० ई.पू. अनुमानित है। प्रायः ८००० वर्षों की परम्परा दक्ष काल से आरम्भ हो कर इक्ष्वाकु (१६-८,००० ई.पू.) तक चली।

महाभारत शान्ति पर्व-अध्याय ३४८-

यदिदं सप्तमं जन्म पद्मजं ब्रह्मणो नृप। तत्रैष धर्मः कथितः स्वयं नारायणेन ह॥४८॥

पितामहाय शुद्धाय युगादौ लोकधारिणे। पितामहश्च दक्षाय धर्ममेतं पुरा ययौ॥४९॥

ततो ज्येष्ठे तु दौहित्रे प्रादाद् दक्षो नृपोत्तम। आदित्ये सवितुर्ज्येष्ठे विवस्वान् जगृहे ततः॥५०॥

त्रेता युगादौ च ततो विवस्वान् मनवे ददौ। मनुश्च लोकभूत्यर्थं सुतायेक्ष्वाकवे ददौ॥५१॥

इक्ष्वाकुणा च कथितो व्याप्य लोकानवस्थितः। गमिष्यति क्षयान्ते च पुनर्नारायणं नृप॥५२॥

यही गीता (४/१) में भगवान् कृष्ण ने योग परम्परा के विषय में कहा है-

इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्। विवस्वान् मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽभ्रवीत्॥

महाभारत शान्ति पर्व-अध्याय ३४९-

प्राप्ते प्रजाविसर्गे वै सप्तमे पद्मसम्भवे। नारायणो महायोगी शुभाशुभविवर्जितः॥१७॥

 

भारत पृथ्वी में ज्ञान का केन्द्र होने से अज था। विष्णु या अज की नाभि मणिपुर है (शरीर में नाभि के पास मणिपुर चक्र) उससे ब्रह्मा की उत्पत्ति हुई। ह्माल का पूर्वी भाग ब्रह्मा का क्षेत्र था जहां से निकली नदी ब्रह्मपुत्र है। नदियों के स्रोत का क्षेत्र विटप (वृक्ष) है-जैसे वृक्ष की हजारों छोटी जड़ें मिट्टी से जल ले कर ऊपर तक पहुंचाती हैं, उसी प्रकार एक बड़े क्षेत्र के वर्षा का जल भी छोटी छोटी धाराओं से निकलता है जो मिल कर नदी बनती है। पश्चिमी हिमालय का जल सिन्धु नदी से निकलता है-वह विष्णु विटप है। मध्य हिमालय का जल गंगा से निकलता है, वह शिव विटप या शिव जटा है। पूर्वी भाग ब्रह्म विटप है जिससे ब्रह्मपुत्र निकलता है। ब्रह्मपुत्र के पूर्व का भाग ब्रह्म देश है। असम की एक उपाधि भी ब्रह्मा है। हर्षवर्धन की ६४२ ई. की रथयात्रा में राजा के रूप में हर्षवर्धन इन्द्र बना था तथा ब्रह्मा क्षेत्र असम के राजा भास्करवर्मन् ब्रह्मा बने थे। (History of Ancient India by R S Tripathi, page 307)

(२) पूर्व की संस्था। मनुस्मृति में लिखा है कि वेद शब्दों से संस्था बनी-सर्वेषां तु स नामानि कर्माणि च पृथक् पृथक्। वेद शब्देभ्य एवादौ पृथक् संस्थाश्च निर्ममे॥ (मनुस्मृति (१/२१) पूर्व का महा वाक्य है-अहं ब्रह्माऽस्मि। अहम से अहोम क्षेत्र (असम), ब्रह्मा से ब्रह्म देश तथा अस्मि का बहुवचन रूप स्यामः से स्याम देश (थाईलैण्ड) हुआ।

(३) इन्द्र का स्थान-इन्द्र को पूर्व दिशा का लोकपाल कहा गया है। पाकशासन नाम-इन्द्र ने पश्चिम दिशा में पाक दैत्यों का वध किया था, अतः उनका पाकशासन नाम पड़ा था। वामन पुराण, अध्याय ७१-

ततो बाणैरवच्छाद्य मयादीन् दानवान् हरिः। पाकं जघान तीक्ष्णाग्रै मार्गणैः कङ्कवाससैः॥१३॥

तत्र नाम विभुर्लेभे शासनत्वात् शरैर्दृढैः। पाकशासनतां शक्रः सर्वामरपतिर्विभुः॥१४॥

भागवत पुराण (८/११/२८) में भी। स्कन्द पुराण (७/४/१७/३६-४०)-

ऐशान्यां दिशि विप्रेन्द्राः स्थिता ये तान्वदाम्यहम्॥ ३६ ॥

एतेषां क्षेत्रपालानां सस्त्रीणां च द्विजोत्तमाः ॥ नेता प्रभु(म?)श्च स्वामी च जयन्तः पालकस्तथा ॥ ३८ ॥

निगृह्णात्यनुगृह्णाति रक्षिता पुरवासिनाम् ॥ जयन्तादेशमादाय ते दुष्टान्घातयन्ति च ॥ ३९ ॥

नागस्थलस्थितः स्वामी जयन्तः पालकः सदा ॥

भागवत पुराण (६/१८/७, ११/५/२६) में विष्णु का एक नाम जयन्त है।  देवीभागवत (९/२२/७)  में शङ्खचूड – सेनानी रत्नसार से जयन्त के युद्ध का उल्लेख है। पद्म पुराण (६/६/९) में इन्द्र – पुत्र जयन्त द्वारा जालन्धर – सेनानी संह्लाद से युद्ध का कथन है। जयन्त तथा उसकी बहन के नाम पर असम की जयन्तिया पहाड़ी है।

इन्द्र को शतक्रतु (१०० यज्ञ करने वाले, या १०० वर्ष तक कर्म करने वाले) तथा सहस्राक्ष (राजा रूप में १००० गुप्तचर या सूचना देने वाले) कहते थे। इनके नाम पर सैकिया तथा हजारिका उपाधि हैं। परवर्ती काल में इसका अर्थ हुआ १०० या १००० सैनिकों का नायक।

जो अभी तक अपराजित रहा वह अच्युत है। इन्द्र उनको भी पराजित करने वाले अच्युत-च्युतः थे। अतः यहा के राजा को च्युतः = चुतिया कहते थे। प्रायः ऐसा ही अर्थ हिब्रू भाषा के शब्द Chutzpah (चुतियापा) का है-unabashed audacity। शक्तिशाली व्यक्ति अत्याचार करने लगता है, अतः यह गाली हो गया। इन्द्र के अधीन नाग लोगों का क्षेत्र चुतिया-नागपुर था जो अंग्रेजी माध्यम से छोटा-नागपुर (झारखण्ड) हो गया।

यस्मान्न ऋते विजयन्ते जनासो यं युध्यमाना अवसे हवन्ते।

यो विश्वस्य प्रतिमानं बभूव यो अच्युतच्युत स जनास इन्द्रः॥ (ऋग्वेद २/१२/९)

= जिसके बिना लोगों की विजय नहीं होती, जिसको युद्ध के समय हवि दी जाती है, जो विश्व के लिये प्रतिमान हुआ (भाषा, माप-तौल, व्यवहार के प्रमाण निर्धारित करने वाला), जो अभी तक अच्युत या अपराजित थे, उनको भी च्युत या पराजित करनेवाला व्यक्ति (सजना) इन्द्र ही है।

राजा या बड़े को नाम से नहीं बुलाते हैं, अतः इन्द्र को स-जना (वह व्यक्ति) कहते थे। इसी से सजना (पति) हुआ है।

बाद में राजा अत्याचारी हो गये, अतः चुतिया शब्द गाली हो गया। महान् अर्थ में बड़ा शब्द भी इन्द्र के लिये ही था-

बड़्-महान्-बण् महाँ असि सूर्य बळादित्य महाँ असि।

महस्ते महिमा पनस्यतेऽद्धा देव महाँ असि। (ऋग्वेद ८/१०१/११)

यहां मूल शब्द बट् है, सन्धि होने से बट् + महान् = बण्-महान्। आज भी थाईलण्ड की मुद्रा बट् (Baht) है। बट्-महान् का अर्थ है जिसके पास बहुत बट् या सम्पत्ति है। असम में कई नाम बट् (बड) पर हैं-बोडो, बड़दलई, बड़गुहैन, बड़पुजारी। बण्-महान् के नाम पर महान्त उपाधि है।

इन्द्र के हाथी को वटूरी तथा ऐरावत को महा वटूरी कहा गया है

अभिव्लग्या चिदद्रिवः शीर्षा यातुमतीनाम्। छिन्धि वटूरिणा पदा महावटूरिणा पदा।

ऐरावत का अर्थ है इरावती नदी क्षेत्र के हाथी। प्राचीन असम तथा थाईलैण्ड में हाथी को वटूरी कहते थे।

(४) प्राग्ज्योतिष पुर-दो प्राग्ज्योतिष पुर थे-एक भारत (मुख्य खण्ड) की पूर्व सीमा जहां सूर्योदय पहले होता था। दूसरा भारत के मध्य उज्जैन से ९० अंश पश्चिम जो असुर भाग की पूर्व सीमा थी। पश्चिम में सीता की खोज के लिये यहां तक जाने के लिये सुग्रीव ने वानरों को भेजा था। रामायण, किष्किन्धा काण्ड, अध्याय ४२-

चतुर्भागे समुद्रस्य चक्रवान्नाम पर्वतः। तत्र चक्रं सहस्रारं निर्मितं विश्वकर्मणा॥२७॥

तत्र पञ्चजनं हत्वा हयग्रीवं च दानवम्। आजहार ततश्चक्रं शङ्खं च पुरुषोत्तमः॥२८॥

तत्र प्राग्ज्योतिषं नाम जातरूपमयं पुरम्। यस्मिन्वसति दुष्टात्मा नरको नाम दानवः॥३१॥

यस्मिन्हरिहयः श्रीमान्माहेन्द्रः पाकशासनः। अभिषिक्तः सुरै राजा मेघवान्नाम पर्वतः॥३५॥

ब्रह्म पुराण (अध्याय ९३ या २०२)-भौमोऽयं नरको नाम प्राग्ज्योतिषपुरेश्वरः॥८॥

छत्रं यत् सलिलस्रावी तज्जहार प्रचेतसः। मन्दरस्य तथा शृङ्गं हृतवान् मणिपर्वतम्॥१०॥

भागवत पुराण (८/५९/२-६) में भी समुद्र के भीतर भौमासुर के दुर्ग का उल्लेख है। प्राग्ज्योतिष पुर की राजधानी लोहे आदि के घेरे से सुरक्षित रहने के कारण उसका नाम मुर था (मुर या मुर्रम = लौह अयस्क)-

हृतोऽमराद्रिस्थानेन ज्ञापितो भौमचेष्टितम्॥२॥ स भार्योगरुडारूढः प्राग्ज्योतिषपुरं ययौ।

गिरिदुर्गैः शस्त्रदुर्गैर्जलान्यनिलदुर्गमम्। मुरपाशायुतैर्घोरैर्दृढैः सर्वत आवृतम्॥३॥

मुरः शयान उत्तस्थौ दैत्यः पञ्चशिरा जलात्॥६॥

मत्स्य पुराण, अध्याय ११४ में भारत के पूर्व दिशा के देशों में प्राग्ज्योतिषपुर का उल्लेख है-

एते देश उदीच्यास्तु प्राच्यान् देशान्निबोधत॥४४॥ अङ्गा वङ्गा मद्गुरका अन्तर्गिरिर्बहिर्गिरी।

ततः प्लवङ्गमातङ्गा यमका मालवर्णकाः। सुह्मोत्तराः प्रविजया मार्गवागेय मालवाः॥४५॥

प्राग्ज्योतिषाश्च पुण्डाश्च विदेहास्ताम्रलिप्तका। शाल्वमागधगोनर्दाः प्राच्या जनपदाः स्मृताः॥४६॥

भगदत्त भी २ कहे गये हैं। महाभारत, सभा पर्व, अध्याय१४ में उनको पश्चिम दिशा में यवनाधिपति तथा मुर और नरकदेश का शासन करने वाला कहा है-

मुरं च नरकं चैव शास्ति यो यवनाधिपः। अपर्यन्त बलो राजा प्रतीच्यां वरुणो यथा॥१४॥

भगदत्तो महाराज वृद्धस्तव पितुः सखा। स वाचा प्रणतस्तस्य कर्मणा च विशेषतः॥१५॥

सभा पर्व अध्याय २६ में भारत के पूर्वी भाग के राजा तथा चीन और समीपवर्ती द्वीपों का भी अधिपति और इन्द्र का मित्र कहा गया है-

शाकलद्वीपवासाश्च सप्तद्वीपेषु ये नृपाः। अर्जुनस्य च सैन्यैस्तैर्विग्रहस्तुमुलोऽभवत्॥६॥

स तानपि महेष्वासान् विजिग्ये भरतर्षभ। तैरेव सहितः सर्वैः प्राग्ज्योतिषमुपाद्रवत्॥७॥

तत्र राजा महानासीद् भगदत्तो विशाम्पते। तेनासीत् सुमहद् युद्धं पाण्डवस्य महात्मनः॥८॥

स किरातैश्च चीनैश्च वृतः प्राग्ज्योतिषोऽभवत्। अन्यैश्च बहुभिर्योधैः सागरानूपवासिभिः॥९॥

उपपन्नं महाबाहो त्वयि कौरवनन्दन। पाकशासनदायादे वीर्यमाहवशोभिनि॥११॥

अहं सखा महेन्द्रस्य शक्रादनवरो रणे। न शक्ष्यामि च ते तात स्थातुं प्रमुखतो युधि॥१२॥

वर्तमान इण्डोनेसिया को शुण्डा द्वीप (एशिया नकशे में हाथी की सूंढ़ के जैसा) या सप्तद्वीप कहा है, या महानाद (मेदिनी कोष १८/५१ के अनुसार हाथी) कहा है। इसके पूर्व भाग में जहां जम्बू द्वीप में पहले सूर्योदय होता है, इन्द्र ने पिरामिड (त्रिशिरा-४ त्रिभुजों से घिरा) बनवाया था।

वाल्मीकि रामायण, किष्किन्धा काण्ड, अध्याय ४०-रत्नवन्तं यवद्वीपं सप्तराज्योपशोभितम्॥२९॥

त्रिशिराः काञ्चनः केतुस्तालस्तस्य महात्मनः। स्थापितः पर्वतस्याग्रे विराजति सवेदिकः॥५३॥

पूर्वस्यां दिशि निर्माणं कृतं तत्त्रिदशेश्वरैः। ततः परं हेममयः श्रीमानुदयपर्वतः॥५४॥

महाभारत युद्ध में ये कौरव पक्ष से लड़े थे तथा अपने सुप्रतीक हाथी द्वारा कई वीरों को पराजित किया। इसके वैष्णवास्त्र से अर्जुन की रक्षा भगवान् कृष्ण ने की थी। भगदत्त को अराने के लिये इसका चश्मा अर्जुन ने तोड़ा था

महाभारत द्रोण पर्व, अध्याय २६-भीमोऽपि निष्क्रम्य ततः सुप्रतीकाग्रतोऽभवत्॥२६॥

अध्याय २९-विद्धस्ततो ऽतिव्यथितो वैष्णवास्त्रमुदीरयन्।।१७॥

विसृष्टं भगदत्तेन तदस्त्रं सर्वघाति वै। उरसा प्रतिजग्राह पार्थं संच्छाद्य केशवः॥१८॥

वली संछन्न नयनः शूरः परमदुर्जयः। अक्ष्णोरुन्मीलनार्थाय बद्धपट्टो ह्यसौ नृपः॥४५॥

-अरुण कुमार उपाध्याय ( धर्म शास्त्र विशेषज्ञ  )  भुवनेश्वर

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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