आत्म और अनात्म भेद


नन्द किशोर वैश्य-

जैन दर्शन में सप्त पदार्थ की कल्पना है। वे सप्त पदार्थ हैं~
1-जीव।
2-अजीव।
3-आश्रव।
4-बन्ध।
5-संवर।
6-निर्जरः।
7-मोक्ष।
(आत्मा।(अत सातत्य गमने+मनिण्)
(अन्+आत्मा=अन् प्रत्यय भी है जो नकारात्मक के लिए है और अन् प्राग्दिशीय विभक्ति से अतः, अत, बहुत के अर्थों में भी प्रयुक्त है)
1-जीवः=तत्र चेतना लक्षणो जीवः।सः द्विविध: ज्ञान चेतना,दर्शनचेत्ना उपयोगो लक्षण:
जीव वे हैं जिनमें दो प्रकार चेतना पाई जाती है, वह है-ज्ञान चेतना और दर्शन चेतना।यह जीव के उपयोगी लक्षण हैं।
2-अजीवः=चेतना लक्षणस्य विपरीतो चेतना हीनस्य अजीवः।
अजीवः वे हैं जो चैतन्यता के विपरीत चैतन्यता के लक्षण से हीन है।जैसे अन्न आदि।जब वे पृथ्वी के संसर्ग को पाकर अन्य चार के संसर्ग से युक्त होते हैं तब उनमें चैतन्यता पाई जाती है। इस हेतु देवी महाभागवत में है-“प्रधानं पृथिवी तत्र शेषाणां सहकारिता”
श्रृष्टि रूप प्रकृति की रचना में प्रधान तत्त्व पृथिवी है।शेष चार तत्त्व(अग्नि,जल,वायु और आकाश) पृथिवी तत्त्व के सहयोगी तत्त्व हैं।
आत्म(न्) या आत्मा उसे कहते हैं जो सतत रूपसे सबमें चेतन रूपसे लक्षित है।
अनात्मा में अन् प्रत्यय लग जाने से अजीव की श्रेणी में नकारात्मक होकर जो चेतन के लक्षण से हीन होता है।
जैन दर्शन के शेष पाँच पदार्थ हैं-
3-आश्रव=शुभाशुभ कर्मागम द्वारः।
आश्रव मुख्य सत् तत्त्व के आसवन का नाम है।
शुभ और अशुभ कर्म के प्रवेश और अनुप्रवेश का नाम आश्रव है।
4-बन्ध= आत्म कर्मणो: अन्योन्य प्रवेशानुप्रवेशात्मको बन्ध:।
आत्मा के अनुसन्धान में कर्मो का प्रवेश होने या न होने अथवा आत्मानुसंधान के बाधक कर्मों का प्रवेश होने देना या न होने देना बन्ध है।
5-संवर=आश्रव निरोधः संवर।
शुभ और अशुभ कर्मों के प्रवेश को पूर्णतयः रोक देना संवर है।
6-निर्जरः= एकदेशीय कर्मक्षय हेतुकी निर्जरः।
एकदेशीय अर्थात् आत्मा की अपूर्णता या मात्र शरीर के माप का।नि:+जरः=न जीर्यते।(न जीर्यते= जो जीर्ण न हों)जो कर्म जीने अर्थात् भोगों के निमित्त होते हैं वे यदि एकदेशीय हो तो वे जरः हैं।जब यही कर्म आत्म पक्ष में होकर सांसारिक कर्म में न हों।
हमारे कर्म द्विपक्षीय होते हैं।पहला जगत् का अर्जन और दूसरा आत्मकल्याण के कर्म।जब आत्मकल्याण के ही कर्म होकर जगत् अर्जन के कर्म न हों तब यह निर्जरः होकर एकदेशीय होता है।
7-मोक्ष= सर्वकर्म विप्रमोक्षे मोक्षः।
सभी कर्मों से मुक्त हो जाने का नाम मोक्ष है।अर्थात् जिसके लिए कोई कर्त्तव्य कर्म शेष नही है वह मोक्ष है।
यदि कोई सोचता है कि अभी यह कर्म शेष है तो उसके लिए मोक्ष भी नही है।
हरि ॐ

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