आध्यात्मिक स्तर की सहायता ही सच्ची सहायता !

आध्यात्मिक स्तर की सहायता ही सच्ची सहायता !

आजकल समाजसेवा के क्षेत्र में अध्यात्म तथा धर्म के विषय में संवेदनशील रहकर उनका समावेश करने का झुकाव बढ रहा है । इसका अर्थ है ‘समाजसेवक तथा वे जिनकी सेवा करते हैं, इन दोनों का धर्म और आध्यात्मिक श्रद्धा के प्रति संवेदनशील होना ।’ मूलतः अध्यात्म और समाजसेवा का क्या संबंध है ? क्या समाजसेवा आध्यात्मिक उन्नति करने का प्रभावी माध्यम है ? इस विषय के उत्तर देते समय महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय की श्रीमती ड्रगाना किस्लोव्स्की ने कहा ‘आध्यात्मिक स्तर की सहायता ही वास्तविक सहायता है !’ ‘क्या समाजसेवा से आध्यात्मिक उन्नति होती है ?’, इस विषय पर शोधनिबंध के माध्यम से विविध विषयों का विवेचन किया गया । इस शोधनिबंध के लेखक परात्पर गुरु डॉ.आठवलेजी हैं, जबकि श्रीमती किस्लोव्स्की एवं श्री. शॉन क्लार्क सहलेखक हैं । 3 से 6 दिसंबर 2018 की कालावधि में संपन्न हुई ‘दी इंटरनॅशनल जर्नल ऑफ आर्ट्स अ‍ॅण्ड सायन्स क्रिस्मस कॉन्फरन्स फ्रीबर्ग 2018’ इस आंतरराष्ट्रीय परिषद में 6 दिसंबर को श्रीमती किस्लोव्स्की बोल रही थी । दी इंटरनॅशनल जर्नल ऑफ आर्ट्स अँड सायन्स (फ्रीबर्ग, जर्मनी)ने इस परिषद का आयोजन किया था ।

श्रीमती किस्लोव्स्की ने आगे कहा, अनेक समाजसेवकों के लिए समाजसेवा उनकी आध्यात्मिक साधना भी होती है; परंतु अनेक लोगों को ‘अध्यात्म’ शब्द की व्याख्या स्पष्ट नहीं होती । सरल भाषा में कहना हो, तो ‘ईश्‍वर की अनुभूति लेने की मानव की उत्कंठा अध्यात्म है । यह अनुभूति किसी उन्नत आध्यात्मिक गुरु के मार्गदर्शन में साधना करने पर होती है । मूलतः इसका अर्थ है अपनी पंचज्ञानेंद्रिय, मन और बुद्धि से ऊपर उठकर आत्मा, अर्थात प्रत्येक में विद्यमान ईश्‍वरीय अंश की अनुभूती लेना ।

आज के काल में अधिकांश व्यक्ति केवल अपना और अपने कुटुंब का विचार करते हैं । अन्यों का विचार करनेवाले कुछ ही लोग होते हैं । इसलिए अन्यों का विचार करना,महानता का लक्षण है, विशेषतः यदि समाजसेवा निशुल्क की जा रही हो । अन्यों का विचार करने से थोडी आध्यात्मिक उन्नति होती है; परंतु समाजसेवक, तथा वे जिनकी सेवा करते हैं, उन व्यक्तियों की भी शीघ्र आध्यात्मिक उन्नति होने की दृष्टि से समाजसेवा का आध्यात्मिकीकरण कैसे कर सकते हैं ? सर्वप्रथम समाजसेवक को यह समझ लेना चाहिए कि लोगों की समस्याआें के मूल कारण आध्यात्मिक होते हैं उदा. प्रारब्ध, अनिष्ट शक्ति, अतृप्त पूर्वजों के सूक्ष्मदेह इत्यादि । जब किसी समस्या का मूलभूत कारण आध्यात्मिक होता है, तब उस पर विजय प्राप्त करने हेतु आध्यात्मिक स्तर पर सहायता करना अथवा आध्यात्मिक उपचार करना आवश्यक होता है । समाजसेवा के क्षेत्र में इसका अर्थ है ‘जो समस्या है, उस पर शारीरिक एवं मानसिक स्तर के अतिरिक्त आध्यात्मिक उपाय-योजना भी अनिवार्य है ।’

व्यक्तिगत स्तर पर भी परिस्थिति एवं व्यक्ति के प्रति समाजसेवक को अपनी वृत्ति एवं आचरण की ओर गंभीरतापूर्वक ध्यान देना आवश्यक है; क्योंकि आध्यात्मिक दृष्टि से अनुचित विचार एवं कृत्यों के कारण उसके द्वारा किए सभी अच्छे कार्य निष्फल हो सकते हैं, उदा. अहंकार के कारण आध्यात्मिक उन्नति कुंठित हो सकती है अथवा अधोगति हो सकती है, मानसिक स्तर पर अत्यधिक उलझ जाने से आसक्ति निर्माण होती है, अपेक्षाआें के कारण दुःख तथा कर्तापन (देखो मैंने कितना किया) मिलता है और इससे एक नए प्रकार का लेन-देन हिसाब निर्माण होता है ।

मूलभूत आध्यात्मिक कारणों से उत्पन्न समस्याएं टालना, तथा उनपर विजय प्राप्त करने का उपाय इसके लिए जिस धर्म में हमारा जन्म हुआ है, उसके अनुसार देवता का नामजप करना, एक निशुल्क और प्रभावी उपाय है, यह हमारे शोध में पाया गया । यह उपाय समस्याग्रस्त व्यक्ति, तथा समाजसेवकों को भी करना आवश्यक है । अंततः आध्यात्मिक स्तर की सहायता ही वास्तविक सहायता है; क्योंकि वह व्यक्ति को अपने अनिष्ट प्रारब्ध की बलि नहीं चढने देती, अपितु उसे जीतने हेतु सक्षम बनाती है, ऐसा भी श्रीमती ड्रगाना किस्लोव्स्की ने समापन के समय बताया ।

सुन्दर कुमार ( प्रधान सम्पादक )

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