आर्मेनिया जहां हुआ था देवासुर संग्राम

अरुण उपाध्याय (धर्मज्ञ)-पुराण = पुरा + नवति (पुराना कैसे नया होता है)-History repeats itself.
इतिहास = इति ह आस= ऐसा ही हुआ था।
इतिहास में कालक्रम है। परिवर्तन चक्र तथा उसका वैज्ञानिक कारण, भौगोलिक एवं अन्य स्थिति, सर्ग, प्रतिसर्ग (सृष्टि, विस्तार) आदि मिलाकर पुराण है।
वेद में किसी एक समय में ऋषि द्वारा निसर्ग से प्राप्त ज्ञान या निगम है। भिन्न भिन्न काल तथा देश के ऋषियों के सूक्तों का संकलन अपौरुषेय संहिता है।
वेद की अपौरुषेय संहिता में आर्मेनिया तथा वहां देवासुर संगाम की स्थिति का उल्लेख है। देवासुर संग्राम का विवरण तथा उसके क्षेत्र, उसी प्रकार के अन्य युद्ध और कारण पुराणों में हैं।
पृथ्वी के उत्तर गोल के ४ पाद खण्डों के नक्शे अलग अलग बनते थे जिनको भूपद्म के ४ दल कहा गया है। भारत पाद उज्जैन से पूर्व पश्चिम ४५-४५ अंश तक एवं विषुव से उत्तर ध्रुव तक था। भारत खण्ड तथा उसके दक्षिण महासागर भाग-दोनों को कुमारिका खण्ड कहते थे। आज भी उसे हिन्द महासागर ही कहते हैं। भारत-चीन-रूस इन्द्र की त्रिलोकी थे। अतः चीन के लोग अपने देश को पृथ्वी और स्वर्ग के बीच कहते थे।
भारत का पश्चिमी भाग, अफ्रीका, यूरोप से ही आक्रमण हुए हैं। कभी कभी अमेरिका (पाताल) ने भी सहायता की है। दुर्गा सप्तशती (८/२६) में दुर्गा ने असुरों को चेतावनी दी है – यूयं गच्छ पाताल यदिजीवितुमिच्छथ (यदि जीवित रहना चाहते हो तो पाताल लौट जाओ। इसी प्रकार जब वामन अवतार में बलि से इन्द्र ने अपना तीनों लोक वापस ले लिया तो बलि पाताल लोक में रहने लगे।
भारत में पूर्व दिशा से बर्मा (म्यामार), स्याम (थाइलैण्ड) मलाया, वियतनाम द्वारा कभी आक्रमण नहीं हुआ है। इनसे जो युद्ध हुए वे आन्तरिक राज्य विस्तार के लिए थे, लूटमार के लिए नहीं।
उत्तर गोल में भारत पद्म में आकाश की तरह ७ लोक विषुव से उत्तर ध्रुव तक थे। अन्य ७ पाद (उत्तर के अन्य ३ एवं दक्षिण के ४) ७ तल थे। भारत के पश्चिम अतल, पूर्व में सुतल, विपरीत में पाताल थे। भारत के दक्षिण महातल या तल, अतल के नीचे (दक्षिण) तलातल, सुतल के नीचे वितल, पाताल के नीचे रसातल थे। अतल के पश्चिम का समुद्र अतलान्तक था। समतल पर नक्शा बनाने से ध्रुव प्रदेश में मापदण्ड बढ़ता जाता है और ध्रुव विन्दु पर अनन्त हो जाता है। उत्तरी ध्रुव में कोई समस्या नहीं है क्योंकि वह जल भाग में है (आर्यभटीय, ४/१२)। किन्तु दक्षिण ध्रुव स्थल में है, जिसका आकार नक्शा पर अनन्त होता था। अतः उसे अनन्त द्वीप कहते थे जो पातालॊ के नीचे है। (विष्णु पुराण, २/५/१३-२२, भागवत, ५/२५/१-२)
प्राचीन काल में काश्यपीय कृष्ण समुद्र के आर्मीनिया नाम के स्थान पर सीरिया तथा असीरिया आदि स्थानों में देवों और असुरों के बीच १२ महासंग्राम हुए-(१) आडीबक (इक्ष्वाकु के पौत्र रिपुञ्जय या ककुत्स्थ ने इन्द्र की सहायता की थी), (२) कोलाहल, (३) हालाहल, (४) समुद्रमन्थन, (५) त्रैपुर (लीबिया के त्रिपोली में केन्द्र), (६) मान्धक, (७) तारक, (८) वृत्र, (९) ध्वज, (१०) बलिबन्ध (बलि पाताल लौटे), (११) हिरण्याक्ष (वराह अवतार-रसातल-दक्षिण अमेरिका), (१२) हिरण्यकशिपु (नृसिंह अवतार-तलातल लोक, अतल लोक से दक्षिण)।
ऋक् (१/१३३)-
उभे पुनामि रोदसी ऋतेन द्रुहो दहामि सं महीरिन्द्राः।
अभिव्लग्य यत्र हता अमित्रा वैलस्थानं परि तृळ्हा अशेरन्॥१॥
ऋतेन = बल द्वारा शत्रुओं को हटाना। पुनामि =शत्रुशून्य कर पवित्र करना। अनिन्द्र (इन्द्र अधिकार से बाहर) मही (भूमि) को सन्दहामि (जलाना)। अभिव्लंग्य = युद्ध कर।
अभिव्लग्या चिदद्रिवः शीर्षा यातुमतीनाम्। छिधि वटूरिणा पदा महावटूरिणा पदा॥२॥
अद्रिवः = वैरी भक्षक। या अद्रि मेघ के विदारक इन्द्र। यातुमतीनाम् -असुर सेनापतियों को काटना, चूर्ण करना। वटूरि = सेना का हाथी। महा वटूरि -ऐरावत। बर्मा की इरावती नदी के क्षेत्र के श्वेत हाथी। इन्द्र पूर्व के लोकपाल थे, अतः थाई भाषा में वटुरि का अर्थ हाथी है।
अवासां मघवञ्जहि शर्धो यातुमतीनाम्। वैलस्थाने अर्मके महावैलस्थे अर्मके॥३॥
यातुमतीनाम् = असुर सेनाओं का बल तोड़ने वाला। शर्घ = बल, शस्त्र आदि। वैलस्थाने = युद्ध क्षेत्र में। श्मशान। अर्मके = शवगृह में।
यासां तिस्रः पञ्चाशतोऽभिव्लङ्गैरपावपः। तत्सु ते मनायति तकत्सु ते मनायति॥४॥
अवपः = कुचल दिया। मनायति = शाबासी। अभिव्लङ्गैः = आक्रमण करने वालों को।
= मैं यज्ञ के बल से दोनों लोकों को पवित्र करता हूं। इन्द्र के विरोधी बड़े बड़े शत्रुओं को जलाता हूं। जहां शत्रु लड़ते हुए मारे गए तथा मरे हुए श्मशान में सो गये॥१॥
हे वज्रधारी इन्द्र! हिंसा करने वाले अपने शत्रुओं के सिर पर पहुंच कर अपने विशाल पैर से उनको नष्ट करदे॥२॥
हे धनवान् इन्द्र! कुत्सित मरे लोगों के स्थान पर घृणित बड़े श्मशानों में इन हिंसा करने वाली सेनाओं का बल नष्ट कर दे॥३॥
हे इन्द्र! जिन तीन पचास अर्थात् १५० शत्रुओं को घेरने वाली नीति से तुमने मार दिया, भक्त गण उसकी बहुत प्रशंसा करते हैं॥४॥
बाइबिल में देव-असुरों के महायुद्ध को अर्मगड्डन (Armageddon) कहा गया है।

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