ब्रह्मचर्य

इंद्रिय समूहों की बलवत्ता

गुरु बृहस्पति वामनजी को ब्रह्मचर्याश्रम का उपदेश देते है। बर्ह्मचर्य का पालन के बिना कोई महान नहीं हुआ है और होगा भी नहीं। स्पर्श से अनेक दोष उत्पन्न होते है। जिसे ब्रह्मचर्य का पालन करना है वह परस्त्री को शरीर और मन से भी भी स्पर्श न करे। यह तो ठीक है पर ऐसा भी लिखा है कि लकड़ी की बनी  पुतली को भी स्पर्श नहीं करना चाहिए। परस्त्री को माता मानना चाहिए।

लक्ष्मणजी का एक सुन्दर उदाहरण है।

लक्ष्मणजी चौदह वर्ष वन में रहे ,फिर भी उन्होंने सीताजी के मात्र चरणों पर दृष्टी रखी थी। सीताहरण के बाद रामजी ने सीताजी के मिले हुए गहने में से हार निकालकर  लक्ष्मणजी से पूछा -लक्ष्मण यह हार तेरी भाभी का है?लक्ष्मणजी बोले-मैंने यह हार कभी नहीं देखा है?मैंने तो भाभी के मुख के सामने भी नहीं देखा है। पर उनके पाँव के पायल को मै  जानता हूँ-क्योंकि हररोज में उन्हें प्रणाम करते हुए देखता था। कैसा आदर्श ब्रह्मचर्य-पालन !!

काम को जीतना कठिन है इसलिए ब्रह्मचर्य की प्रशंसा की गई है। जब व्यासजी भागवत की रचना कर रहे थे तो वे श्लोक की जाँच करने अपने शिष्य जैमिनी को देते थे।

जैमिनी ने नवम स्कंध का यह श्लोक देखा – बलवनिन्द्रियगामो विद्वांसमपि कर्षति।

(इन्द्रियाँ  इतनी बलवान होती है कि बड़े-बड़े विद्वानों को भी विचलित कर देती है।)

इस श्लोक पढ़कर जैमिनी ने सोचा कि व्यासजी ने इसमें कुछ भूल की है। क्या इन्द्रियाँ विद्वानों को भी विचलित कर शक्ती है?

उन्होंने व्यासजी से कहा-इस श्लोक में “विद्वांसमपि कर्षति”के स्थान पर “विद्वासं नापकर्षति”लिखना चाहिए। व्यासजी ने कहा-मैने जो लिखा है वह ठीक ही है। इसमें कोई भूल नहीं है।

एक दिन जैमिनी संध्या करके उसका जल आश्रम के बाहर डालने गए। वहाँ उन्होंने पेड़ के नीचे बारिस से भीगी हुई  सुन्दर युवती देखी। उसका सौंदर्य देखकर जैमिनी विचलित हो गए।

जैमिनी ने उस युवती से कहा -यह कुटिया तुम्हारी ही है। बरसात में भीगने के बजाय अंदर आओ।

युवती बोली- पुरुष कपटी होते है। मै आपका विश्वास कैसे करू?

जैमिनी कहने लगे-मै तो पूर्वमीमांसा का आचार्य जैमिनी ऋषि हूँ।

क्या मेरे  पर विश्वास नहीं करोगी?मुझ जैसे तपस्वी पर भरोसा नहीं है  तो फिर किस पर भरोसा करोगी?

अंदर आश्रम में आकर आराम करो। युवती आश्रम में आई।

जैमिनी ने बदलने के लिए कपडे दिए। बातों -बातों में जैमिनी का मन ललचाया। उन्होंने युवती से पूछा-क्या तुम्हारा विवाह हुआ है? युवती ने कहा कि-नहीं। तब-जैमिनी ने विवाह का प्रस्ताव रखा।

युवती ने कहा- मेरे पिताजी ने प्रतिज्ञा की है कि -जो पुरुष-खुद – घोडा बनकर मेरी पुत्री को अम्बाजी के मंदिर दर्शन कराने ले जायेगा,उसी के साथ उसका विवाह करूँगा।

और मैंने पिताजी से कहा कि- आपके दामाद का मुँह काला कर उन्हें ले जाऊंगी।

जैमिनी ने सोचा कि चाहे घोडा बनना पड़े और मुँह काला  करना पड़े किन्तु यह सुन्दर युवती तो मेरी हो जाएगी। वे सब कुछ करने तैयार हो गए।

जैमीनी ने घोड़ा बनकर उस युवती को अपने पर सवार कराके- अम्बाजी के मंदिर में ले आये।

मंदिर के बहार व्यासजी बैठे थे। यह दृश्य देखकर जैमिनी से पूछा कि कर्षति वा न कर्षति?

जैमिनी शरमा गए और बोले-कर्षति। गुरूजी आपका श्लोक सच्चा है।

क्षणभर भी असावधान न होना। असावधान होने से काम सर पर चढ़ जायेगा।

काम के कारण बड़े-बड़े ज्ञानी भटक गए है,तो फिर साधारण मनुष्य की बात ही क्या?

भर्तृहरिने भी कहा है कि- मात्र वृक्ष के पत्ते और जल पीकर निर्वाह करने वाले ऋषियों को भी काम ने विचलित कर दिया है।

तो फिर जीभ का लालन करने वाला और (सिनेमा की) अभिनेत्रियों की रात-दिन पूजा करने वाला  आज  का मनुष्य काम जितने की बात करे तो निरर्थक ही है।

ब्रह्मचर्य का पालन करने वाला शक्तिशाली बनता है। श्रीकृष्ण को दुर्बलता पसंद नहीं है।

हरि  का मार्ग शूरवीरों का है,कायरों का नहीं।

श्रुति भी कहती है- नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः। (आत्मा दुर्बल लोको को लभ्य नहीं है)

ब्रह्मचर्य का पालन करो और बलवान बनो।

 

नितिन श्रीवास्तव ( सलाहकार संपादक )

 

 

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