इन नवरात्रि धारण करे एक अद्भुत सुरक्षा कवच

इन नवरात्रि धारण करे एक अद्भुत सुरक्षा कवच

आज के दौर में प्रायः लोग स्वयं को असुरक्षित मानकर सदा चिन्तित रहते हैं। बच्चे घर से बाहर निकलते हैं,और जब तक लौटकर वापस नहीं आ जाते अभिभावक चिन्तातुर रहते हैं। बच्चे ही नहीं,बड़े भी स्वयं को किसी न किसी कारण से असुरक्षित ही अनुभव करते हैं। ऐसे में यह सुरक्षा कवच आपको काफी राहत दे सकता है। वस, श्रद्धा और विश्वास पूर्वक इसे प्रयोग करने की आवश्यकता है।

जनकल्याण के लिए इसकी संक्षिप्त विधि यहाँ प्रस्तुत है-

खरमास छोड़ कर ,किसी महीने के शुक्लपक्ष में इसकी साधना की जा सकती है,वैसे दोनों नवरात्र (अश्विन और चैत्र)विशेष महत्त्वपूर्ण हैं। इस समय की गयी साधना अधिक फलवती होती है। प्रातः स्नान के बाद भोजपत्र के बड़े से टुकड़े(९”×९”)पर इस(श्रीदुर्गासप्तशती चतुर्थअध्याय के २४,२५,२६,२७वें श्लोक)को अष्टगन्ध (मलयगिरिचन्दन, रक्तचन्दन, कपूर,केसर, वंसलोचन,अगर,तगर,हरिद्रा)से,अनार की कलम से लिख लें। अनार की डंठल भी नौ ईंच का ही होना चाहिए,जिसके एक भाग को थोड़ा छीलकर नुकीला बना लें,ताकि लिखने में सुविधा हो। मन्त्र लिखने के बाद लाल वस्त्र का आसन देकर तांबें की तस्तरी में उसे स्थापित करके,षोडशोपचार पूजन करें। इसके बाद दिये गये मन्त्र का एक हजार जप करें। चतुर्थी से नवमीं पर्यन्त नौ हजार जप आसानी से पूरा किया जा सकता है। इस प्रकार पूजन और जप प्रातः-सायं के हिसाब से नौ हजार पूरा करें।(यदि चतुर्थी से क्रिया प्रारम्भ नहीं कर सकें तो आगे सप्तमी.अष्टमी,नवमी को करें। पंचमी,षष्ठी को नहीं ) तदपश्चात् अष्टोत्तरशत आहुति प्रदान करें। ध्यायव्य है कि पूजन और आहुति में देवी नवार्ण मंत्र का प्रयोग करना है। इस प्रकार आपका यह अद्भुत सुरक्षाकवच धारण करने के लिए तैयार हो गया। इसे सोने,चाँदी,या तांबे की ताबीज में भर कर,लाल धागे में पिरो कर, गले या बांह में धारण(पुरूष दांये,स्त्री बांयें बांह में) कर लें। यन्त्र को मोड़ने में सावधानी वरतें,ताकि टूटे नहीं। इस कवच के प्रभाव से आप संकट से पूर्णतः रक्षित होंगे।

वस्तुतः होता ये है कि कुदृष्टि,बुरीदृष्टि का स्तम्भन हो जाता है।

परहेज- प्रसूति भवन,श्मशान,अशौच आदि में उतार कर रख दें,और पुनः धागा बदल कर,धूपित करके ही धारण करें।

नोट- धारण करने वाला मदिरा-मांस का प्रयोग नहीं करता है यदि तो इस एक बार के बने यन्त्र का प्रभाव पांच-सात वर्षों तक बना रहता है। नियम पालन नहीं करने की स्थिति में कितना कारगर होगा देवी जाने। और यह कुतर्क नहीं चलेगा कि देवी को तो बली दी जाती है,फिर यह वर्जना क्यों।
आप यदि स्वयं पर इस प्रयोग को करना चाहते हैं तो सारी प्रक्रिया वैसी ही होगी,जैसा पूर्व में कहा जा चुका है। अन्तर सिर्फ प्रयोग का है। इसमें ताबीज रुप में धारण नहीं करना है,बल्कि मन्त्रजप की एक और आवृत्ति कर लेनी है। यानी नौ हजार स्वयं प्रयोग के लिए। एक बार सिद्ध कर लेने के बाद प्रत्येक नवरात्रि में ऊर्जा को पुनर्जागृत करते रहें। ताकि आपका सुरक्षाकवच कमजोर न हो। इस कवच का प्रयोग किसी भी विकट परिस्थिति में किया जा सकता है,या सामान्य रुप से भी नियमित प्रयोग करने में कोई हर्ज नहीं है। घर से बाहर निकलते समय थोड़ी देर के लिए चित्त एकाग्र करें। उत्तर या पूर्व मुख खड़े हो जायें,और दिये गये चित्र के अनुसार सात,नौ,या ग्यारह घेरे अपने चारों ओर बनायें- उक्त साधित मन्त्र का मानसिक जप करते हुए,और फिर अपने नथुनों की परीक्षा करें-कि किस नासापुट से स्वांस जारी है। जो स्वर चल रहा हो,वही पैर पहले घर से बाहर निकालें- बिलकुल मौन होकर निकलें। आँखें अधखुली रहें- इतना ही जितने में रास्ता देखने में कठिनाई न हो। यह सहस्रानुभूत प्रयोग है।अस्तु।

डॉ.दीनदयाल मणि त्रिपाठी
( प्रबंध सम्पादक )

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