इल्युमिनाटी काला जादू के संस्थाओं का नियन्त्रक ?

मैलीविद्या अथवा काला जादू सभी प्रकार के गुप्त संस्थाएँ इल्युमिनाटी द्वारा नियन्त्रित हैं तथा प्रत्येक संस्था द्वारा अपने सदस्य बनाने पर उन सदस्यों को प्रारम्भि दीक्षा देने के भिन्नकृभिन्न स्तर होेते हैं। ये सभी एक पिरामिड की आकृति में होता है जैसे नीचे प्रारम्भिक दीक्षित सदस्यों की संख्या अधिक होती है तथा शनैरूशनैरू अपनी योग्यता से व्यक्ति आगे बढ़ता जाता है, किन्तु किसी भी स्तर का सदस्य अपने से उच्च स्तर के सदस्य की योग्यता से अनभिज्ञ होता है। फ्रिमेसनरी में आप तब तक सदस्यता ग्रहण नहीं कर सकते जबतक कोई दो सदस्य आपकी जिम्मेदारी नहीं ले लेेते, तथा सदस्यता ग्रहण करने वाले के बारे में पूरी जानकारी एकत्रित की जाती है कि वो कैसा है तथा उसे परिक्षण से गुजरना पड़ता है। तथा पूरी तरह से उचित सिद्ध होने के उपरान्त भी यदि परिषद् में एक सदस्य भी अपिलार्थी को सदस्यता देने से मना कर दे तो उस प्रार्थी को सदस्यता नहीं दी जाती। यदि भ्रातृत्व संगठन अपने किसी कार्यविशेष हेतु किसी को प्रयोग में लेना चाहते हैं तो उसका विशेष तरह से परीक्षण किया जाता है। इसका कदापि ये अर्थ नहीं है कि वे मात्र बुरे लोगों में से ही किसी का चुनाव करते हों।
अधिकतर गुप्त संस्थाएँ सेवासंस्थाएँ हैं ये मात्र छलावा है कि फ्रिमैसान एक ईसाई संस्था है वास्तव में वे ईसाई नहीं हैं। इन संस्थाओं में सदस्यों को ब्रह्माण्ड के कुछ ऐसे रहस्यों की जानकारी दी जाती है जो सामान्यतरू विद्यालयों ने नहीं पढ़ाया जाता। इनमें महिलाओं के भी कुछ संगठन हैं उदाहरणार्थ थ्तममउंेवदपब ष्म्ंेजमतद ैजंतष् भ्रातृत्व संगठन प्रसिद्ध लोगों को जोड़ने हेतु सदैव तत्पर रहता है, जिसमें राजनीतिज्ञ, धनिक वर्ग तथा ऐसे लोग जिनके द्वारा एक विशाल जनसमूह जुड़ा हो। इनमें से कुछ तो अत्युच्च स्तर पर पहुँच जाते हैं उनका चुनाव अत्यन्त सावधानी पूर्वक किया जाता है, वहाँ उच्च स्तर पर जाने हेतु उन्हें उनके धर्म के चिह्नों को अपमानित करने हेतु कहा जाता है यथा अपने धार्मिक चिह्न पर थूकना आदि यदि वे स्वीकार कर लेते हैं तो उनको आगे भेज दिया जाता है अन्यथा उन्हें धन्यवाद देकर वापस भेज दिया जाता है।
लेखक का मानना है कि उच्च स्तर पर पहुँचे हुये लोगों में अन्तरिक्ष मानवों से संवाद करने की क्षमता प्राप्त होती हैं किन्तु यदि उसे हम देखें तो वहाँ अन्तरिक्ष मानव की प्रासंगिकता नहीं है हाँ यहाँ हम आसुरी शक्तियों से संवाद अथवा सहायता की प्राप्ति की कल्पना कर सकते हैं। उसे ही कालाजादु अथवा मैली क्रिया कह सकते है। अधिकतर पाश्चात्यों को मानना
है कि वे अन्तरिक्ष मानव इन इल्युमिनाटी व इसके सभी अनुषांगिक संगठनों के सदस्यों को अच्छी क्षमता व सभी कुछ लौकिक सुख देेते हैं किन्तु इसके बदले में वे उनकी आत्मा से सौदा करते हैं कि मृत्यु के उपरान्त उनका इन संगठन
के सदस्यों की आत्मा पर अधिकार होगा।
1922 में एक ट्रस्ट का निर्माण हुआ ल्यूसिफर की ट्रस्ट स्नबपमितश्े ज्तनेज बाद में ल्यूसि की ट्रस्ट के नाम से जानी गई। ये एक असरकारी संगठन था तथा संयुक्त राष्ट्र द्वारा सत्यापित थी। भारत में एक थियोसोफिकल सोसाइटी की स्थापना हुई थी ये ल्यूसिफर की ट्रस्ट उसी सोसाटी का एक अंग थी और ये भी एक गुप्त संस्था थी।इसी सोसाइटी ने हिटलर को इस
बात से प्रभावित किया कि वह एक आर्य जाति का है। यह ट्रस्ट को अमेेरीका के सुरक्षामन्त्री राबर्ट मेकनामरा विश्व बैंक के अध्यक्ष और रॉकफेलर फाउण्डेशन द्वारा पोषित थी। संयुक्त संघ की ओर से यह संगठन पूरी तरह पोषित था तथा अन्य भी कई संगठन उसे सहयोग करते थे। तथा इनका एक मन्दिर था जहाँ असुरों की उपासना की जाती थी तथा इसका मुख्य मन्दिर यू.एन केमुख्यालय न्यूयार्क में स्थिति था।
अमेरीका की स्थापना के समय यूरोपीय रहस्यवाद की समाप्ति नहीं हुई थी और उन रहस्यवादी संगठनों के चिह्न उनकी राजमुद्रा पर दिखाई देते हैं। अमेरीका का राष्ट्रीय पक्षी बाज रखा हुआ है वह वस्तुतरू प्राचीन ईजिप्ट के फोनीक्स का स्वरूप ही है। इस प्रकार ।सइमतज च्पाम ष्डवतंसे ंदक क्वहउं, ने अपनी पुस्तक में कई् तथ्य दिये हैं।
अमेरीका मे एक मैसोनिक हुआ जिसक पास इस प्रकार की शक्तियों के स्तर की दृष्टि से 130 ईकाईतक की शक्तियाँ प्राप्त थीं और वह अत्यधिक कामुक प्रकृति का था तथा वह निर्वस्त्र रहता था एक लकड़ी के बने हुये एक लिंग पर दोनों ओर टाँगे लटकाके बैठता था उस समय उसके साथ कई वेश्याओं का एक समूह होता था।
सुकरात को इल्युमिनाटस कहा गया है जिसने प्रजातन्त्र का सिद्धान्त सर्वप्रथम यूरोप को पढ़ाया था उसने ये सिद्धान्त भारतीय गणतन्त्रात्मक शासन की विधि से ग्रहण किया था। यहाँ ये समझाना आवश्यक है कि गणतन्त्र और प्रजातन्त्र में क्या भेद है। वेदों में एक मन्त्र है गणानान्त्वा गणपति ँ् हवामहे यहाँ मन्त्र गणों के पति अर्थात् स्वामी कहा है प्रजा का स्वामी नहीं कहा है। वस्तुतः कई परिवारों के समूह को गण कहा गया है इसमें ऐसा हो सकता है कि ये मात्र परिवारों का ही नहीं अपितु कई ग्रामों को समूह भी हो उसका प्रधान गणप्रमुख होता है तथा इन गणप्रमुखों का स्वामी राजा अथवा गणप्रधान होगा। ऐसे में सुकरात को ये महान् भारत में प्रचलित यह गणतन्त्रात्मक व्यवस्था अच्छी लगी तो उसने इसे ही सभी के लिये लागू करना चाहा इसीलिये उसने इस व्यवस्था को वहाँ ईजिप्ट, रोम, इटली, सिसली आदि में फैलाने की इच्छा रखी। सुकरात इस व्यवस्था के अन्तर्गत राजा को समाप्त करना चाहता था क्योंकि वहाँ की प्रजा राजा और पुरोहित दोनों के मध्य पिसती थी ऐसे में वे राजा से मुक्ति चाहते थे उसी से एक सरकार विचारधारा का सूत्रपात हुआ। यही इल्युमिनाटी की उत्पत्ति का आधार भी कहा जा सकता है।

डॉ.दिलीप कुमार नाथाणी 

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