कुमकुमार्चन विधि और देवी की आंचल भराई का महत्व

कुमकुमार्चन विधि और देवी की आंचल भराई का महत्व

१. कुमकुमार्चन

देवी की उपासना में कुमकुमार्चन का महत्वपूर्ण स्थान है । अनेक स्थानों पर नवरात्रि में भी विशेष रूप से यह विधि करते हैं । देवी सहस्त्रनाम में दिए देवी के एक-एक नाम का उच्चारण कर अथवा देवी का नामजप करते हुए देवी को एक-एक चुटकी भर कुमकुम अर्पण करने को `कुमकुमार्चन’ कहते हैं ।

कुमकुमार्चन करते समय सर्वप्रथम देवी का आवाहन कर पूजन करते हैं । उपरांत देवी के नाम का उच्चारण कर देवी की मूर्ति पर कुमकुम अर्पण करते हैं। देवी के चरणों से आरंभ कर और सिर तक चढाकर, उन्हें कुमकुम से आच्छादित कर देते हैं । कुमकुमार्चन पूर्ण होने पर देवी की आरती उतारते हैं । सबके कल्याण के लिए प्रार्थना करते हैं।

१ अ. कुमकुमार्चन का शास्त्रीय आधार

कुमकुम का रंग लाल होता है । मूल कार्यरत शक्तितत्त्व की निर्मिति लाल रंग के प्रकाश से हुई है । कुमकुम की विशिष्ट सुगंध होती है । इस सुगंध की तरंगें वातावरण में प्रक्षेपित होती रहती हैं। मूल शक्तितत्त्व के बीज की सुगंध कुमकुम की सुगंध के समान ही होती है । कुमकुम द्वारा प्रक्षेपित इन गंध-तरंगों की ओर ब्रह्मांड में विद्यमान शक्ति तत्त्व की तरंगें अल्प कालावधि में आकृष्ट होती हैं । इसलिए मूल शक्तितत्त्व के रंग के एवं गंध तरंगों के प्रतीकस्वरूप कुमकुम द्वारा अर्चन कर मूर्ति में देवी के सगुण तत्त्व को जागृत करते हैं । इससे पूजक को इन शक्तितत्त्व की तरंगों का लाभ होता है ।

कुंकुमार्चन में प्रयोग किया गया कुमकुम, देवी पूजन के फलस्वरूप देवी की शक्ति से संचारित हो जाता है । इसके उपयोग से लोगों को विविध अनुभूतियां होती है ।

२. देवीकी आंचल भराई

देवी पूजन अंतर्गत आंचल भराई की विधि की जाती है । आंचल भराई अर्थात् देवी को साडी, चोली-वस्त्र और नारियल अर्पण कर, देवी पूजन संपन्न करना ।

२ अ. देवी की आंचल भराई का महत्त्व

देवी को साडी एवं चोली-वस्त्र अर्पण करने का अर्थ है, अपनी आध्यात्मिक उन्नति अथवा कल्याण के लिए देवी के निर्गुण तत्त्व को, सगुण में आने के लिए आवाहन करना । देवी की आंचल भराई करते समय, प्रत्यक्ष कार्य की सफलता के लिए देवी से प्रार्थना करते हैं । इससे पूजन द्वारा कार्यरत देवी के निर्गुण तत्त्व को, साडी एवं चोली-वस्त्र के माध्यम से, मूर्त सगुण रूप में साकार होने के लिए सहायता मिलती है ।

देवी की आंचल भराई अपनी-अपनी कुल परंपरा के अनुसार अथवा प्रांतानुसार भिन्न प्रकार से होती है । उत्तर भारत में देवी मां को लाल चुनरी चढाते हैं । सामान्यत: देवी की आंचल भराई करते समय देवी को यथाशक्ति साडी और चोली-वस्त्र अथवा केवल चोली-वस्त्र अर्पण करते हैं । विशिष्ट देवी को विशिष्ट रंग की साडी एवं चोली-वस्त्र अर्पण करने से उस देवी का तत्त्व संबंधित व्यक्ति के लिए अल्पावधि में कार्यरत होता है ।

कुछ देवियों के नाम एवं उनसे संबंधित रंग

१. श्री दुर्गा देवी को लाल

२. श्री महालक्ष्मी को लाल एवं केसरी

३. श्री महासरस्वती देवी को श्वेत एवं लाल

४. श्री महाकाली को जामुनी एवं लाल रंग के वस्त्र अर्पण करने चाहिए ।

इससे स्पष्ट होता है आंचल भराई अंतर्गत किस देवी को कौन से रंग का वस्त्र अर्पण करना चाहिए । इससे यह भी स्पष्ट होता हैं, कि लाल रंग में शक्ति तत्त्व आकृष्ट करने की क्षमता सर्वाधिक होती है ।

 

२ आ. देवी की आंचल भराई की उचित पद्धति

१. देवी को अर्पण करने के लिए सूती अथवा रेशमी साड़ी का चयन कीजिए । सूती एवं रेशमी धागों में देवता से प्रक्षेपित सात्त्विक तरंगें ग्रहण कर, उन्हें संजोकर रखने की क्षमता अन्य धागों की तुलना में अधिक होती है ।

२. देवी का आंचल भरने के लिए थाली में साडी रखकर उस पर चोली-वस्त्र, नारियल एवं थोडे चावल रखिए । ध्यान रहे, नारियल की शिखा देवी की ओर हो ।

३. यह सर्व सामग्री हाथों की अंजुलि में लेकर, अंजुलि सीने के सामने कर देवी समक्ष शरणागत भाव से खडे रहिए ।

४. चैतन्य प्राप्ति और आध्यात्मिक उन्नति हेतु देवी से भावपूर्ण प्रार्थना कीजिए । इससे सगुण देवी तत्त्व के जागृत होने में सहायता मिलती है ।

५. आंचल भराई की सामग्री को देवी के चरणों में अर्पित कीजिए और उस पर चावल चढाइए ।

६. अंत में देवी को नमस्कार कीजिए ।

इस प्रकार देवी की आंचल भराई करने से देवी तत्त्व का लाभ होता है । संभव हो, तो देवी के चरणों में अर्पित वस्त्र को उनके प्रसाद के रूपमें स्वीकार कर परिधान करना चाहिए तथा नारियल को प्रसाद के रूप में ग्रहण करना चाहिए । देवी तत्त्व से संचारित वस्त्र प्रसाद के रूप में परिधान करने से देवी तत्त्व का लाभ मिलता रहता है । देवी की आंचल भराई में अभी बताई गई सामग्री का उपयोग करने से सूक्ष्म स्तर पर जो प्रक्रिया होती है, वो जान लेते हैं ।

 

२ इ. देवी के आंचल भराई के सूक्ष्म-परिणाम

नारियल की शिखा की ओर देवीतत्त्व आकृष्ट होता है । इस तत्त्व को साड़ी एवं चोली-वस्त्र में संचारित करने में नारियल सहायक होता है । नारियल की सहायता से यह तत्त्व साड़ी एवं चोली-वस्त्र में संचारित होता है । साथ ही, नारियल की शिखा से प्रक्षेपित तरंगों के कारण, जीव के शरीर के चारों ओर सुरक्षा-कवच का निर्माण होता है । देवी को अर्पित वस्त्र से पृथ्वी तत्त्व की सहायता से सात्त्विक तरंगें प्रक्षेपित होती हैं । नारियल-पानी में विद्यमान आप तत्त्व की सहायता से, नारियल से आप तत्त्व युक्त तरंगे प्रक्षेपित होती हैं । इन तरंगों के कारण, देवी को अर्पित वस्त्र से प्रक्षेपित तरंगें गतिमान एवं कार्यरत होती हैं । इन तरंगों से पूजक महिला के देह के चारों ओर सुरक्षा-कवच की निर्मिति होने में सहायता मिलती है ।

इस सामग्री के समान ही चावल भी चैतन्य ग्रहण एवं प्रक्षेपित करने में अग्रणी है । इसलिए आंचल भराई में सर्व समावेशक चावल का उपयोग किया जाता है । आंचल भराई के फलस्वरूप देवी को अर्पित साडी और चोली-वस्त्र देवी तत्त्व से आवेशित हो जाते हैं । इन वस्त्रों में विद्यमान सात्त्विक तरंगों के कारण, पूजक महिला के प्राण देह एवं प्राणमय कोष की शुद्धि होने में सहायता मिलती है ।

२ उ. देवी की आंचल भराई करने की सामग्री
अंजुलि में लेकरविशिष्ट मुद्रामें खडे रहनेके परिणाम

देवी की आंचल भराई करते हुए, हाथों की जो मुद्रा बनती है, उससे पूजक महिला के देह में विद्यमान कुंडलिनी की तीन प्रधान नाडियों में से चंद्रनाड़ी कार्यरत होती है । महिला के मनोमय कोष में सत्त्व कणों की वृद्धि होने में सहायता होती है । देवता से प्रक्षेपित सात्त्विक तरंगें हाथोंकी उंगलियोंद्वारा महिलाके देहमें संचारित होती हैं । इससे उसके देहमें विद्यमान कुंडलिनी के चक्रों में से अनाहत चक्र कार्यरत होता है । फलस्वरूप महिला के मन में देवी के प्रति भाव जागृत होता है । इससे महिला के स्थूल एवं सूक्ष्म देहों की शुद्धि होने में सहायता मिलती है ।

इस मुद्राके कारण पूजक महिला देवताके समक्ष अधिकाधिक विनम्र हो जाती हैं । महिलाकी चंद्रनाडी कार्यरत होनेसे उसका मन शांत होता है । देवीके प्रति भाव जितना अधिक होता है, उतने अधिक कालतक पूजाविधिसे प्राप्त सात्त्विकता बनी रहती है ।

देवी को अर्पित की जाने वाली साडी पर अन्य सर्व सामग्री रखी जाती है । कुछ स्थानों पर यह साडी छह गज की होती है, तो कुछ स्थानों पर नौ गज की । पूजक में देवता के प्रति भाव के अनुसार वह देवी को किसी भी प्रकार की साड़ी अर्पित करे, उसके भाव के कारण उसे अपेक्षित लाभ होता ही है; परंतु प्रत्येक व्यक्ति में देवता के प्रति भाव नहीं होता । इसलिए सामान्य जनों के लिए प्रत्येक कृति शास्त्र के अनुसार करना अधिक लाभदायक है । देवी को अर्पित की जाने वाली साडी शास्त्र के अनुसार किस प्रकार की होनी चाहिए, यह समझ लेना आवश्यक है ।

देवी को नौ गजकी साडी अर्पण करना अधिक उचित होने का अध्यात्म शास्त्रीय कारण मूल निर्गुण शक्ति अर्थात श्री दुर्गा देवी में शक्ति तत्त्व के सर्व नौ रूप समाए हुए हैं । `९’का आंकड़ा श्री दुर्गा देवी के कार्य करने वाले नौ प्रमुख रूपों का प्रतिनिधित्व करता है । नौ गज की साडी के नौ स्तर देवी के कार्य करने वाले नौ रूप दर्शाते  हैं । देवी को नौ गज की साडी अर्पित करना अर्थात देवी को उनके नौ अंगों सहित प्रकट होकर कार्य करने के लिए आवाहन करना ।

इस दृष्टी से देवी को छह गज की साडी की अपेक्षा, नौ गज की साडी अर्पित करना अधिक योग्य है । परंतु किसी कारण वश नौ गज की साडी अर्पित करना संभव न हो, तो छह गज की साडी अर्पित कर सकते हैं ।

देवी को नौ गज की साडी अर्पित करने के समान ही विशिष्ट आकार का चोली-वस्त्र भी अर्पित करते है । देवी को त्रिकोणीय आकार में चोली-वस्त्र अर्पित करने का कारण त्रिकोण आकार ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश इनमें से ब्रह्मा की इच्छा शक्ति से संबंधित है । ब्रह्मांड की इच्छा-तरंगों का भ्रमण दार्इ से बार्इ ओर त्रिकोण आकार में होता है । देवी को चोली-वस्त्र अर्पण करते समय त्रिकोण आकार बनाकर अर्पित करने का अर्थ है, अपनी आध्यात्मिक उन्नति के लिए आदि शक्ति श्री दुर्गा देवी की इच्छा शक्ति की तरंगें प्रबल कर उनकी कृपा प्राप्त करना । यही कारण है कि, देवी को चोली-वस्त्र त्रिकोण आकार में अर्पित करते हैं ।

संदर्भ : सनातन-निर्मित ग्रंथ ‘देवीपूजनसे संबंधित कृतियों का शास्त्र’

 

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