कृष्ण तत्त्व

अरुण कुमार उपाध्याय (धर्मज्ञ)
वंशी-विभूषितकरात् नवनीरदाभात् पीताम्बरात् अरुणबिम्बफलाधरोष्ठात्।
पूर्णेन्दु-सुन्दरमुखात् अरविन्द-नेत्रात् कृष्णात् परं किमपि तत्त्वमहं न जाने॥ (गूढार्थदीपिका, मधुसूदन सरस्वती)
स्वयं कृष्ण तत्त्व ही बुद्धि से परे है, उससे परे तत्त्व की कल्पना नहीं हो सकती। पण्डित मधुसूदन ओझा ने गीता रहस्य में भगवान् कृष्ण के कई रूपों का वर्णन किया जिनके आधार पर उनके मुख्य शिष्य पण्डित मोतीलाल शास्त्री ने कृष्ण रहस्य पर ९ पुस्तकें लिखीं-स्वयम्भू, परमेष्ठी, चाक्षुष, ज्योतिष, प्रतिष्ठा, सत्य, ईश्वर, वैहायस, मनुष्य कृष्ण।
भगवान् कृष्ण को वेदों में पुरुष कहा है, जिसकी मुख्य स्तुति पुरुष सूक्त सभी वेदों में है। कृष्ण तत्त्व की व्याख्या के लिये श्रीमद् भागवत पुराण प्रामाणिक है। स्वयं भगवान् ने अपना वर्णन भागवत गीता में किया है।
(१) अवतार कृष्ण -वसुदेव और देवकी के पुत्र के रूप में भगवान् कृष्ण का जन्म भाद्र शुक्ल अष्टमी को मथुरा में कंस के कारागार में हुआ। यह पूर्णिमान्त मास की तिथि है, अमान्त मास में यह श्रावण कृष्ण अष्टमी है। १२५ वर्ष की आयु पूर्ण होने के बाद जब उन्होंने इस लोक का त्याग किया तो कलियुग का आरम्भ १७-२-३१०२ ई.पू. को हुआ। इसके अनुसार भगवान् कृष्ण का जन्म १९-७-३२२८ ई.पू. मथुरा मध्यरात्रि को हुआ। रोहिणी नक्षत्र तृतीय चरण में जन्म होने से महर्षि गर्ग ने उनका राशिनाम विष्वक्सेन रखा। जन्म समय की ग्रह स्थिति थी-मथुरा (२७अंश २५’ उत्तर, ७७अंश ४१’ पूर्व) में मध्यरात्रि, सूर्य १३९अंश ४८’, चन्द्र ४७अंश ४२’, मंगल ९१अंश ६’, बुध १५२अंश ४८’, गुरु १४८अंश ५४’, शुक्र १०२अंश ५४’, शनि २२४अंश ४२’, राहु १०६अंश २४’, लग्न ५० अंश । जन्माष्टमी पालन में कई मत हैं-सामान्य तिथि नियम से जिस दिन स्थानीय सूर्योदय के समय भाद्र कृष्ण अष्टमी होगी, उस दिन जन्माष्टमी होगी। उनका जन्म मथुरा में मध्य रात्रि को हुआ जब उनको गुप्त रूप से मथुरा कारागार से वृन्दावन में नन्द के पास ले गये और आगामी दिन उनका जन्मोत्सव हुआ। अतः जिस दिन मध्य रात्रि को अष्टमी होती है, वह जन्माष्टमी और आगामी दिन नन्द उत्सव मनाते हैं। अन्य मत है कि जिस मध्य रात्रि को रोहिणी नक्षत्र हो वह जन्म दिन होगा।
ब्रह्मवैवर्त्त पुराण, श्रीकृष्ण जन्म खण्ड, अध्याय ७-
एतस्मिन्नन्तरे तस्या रात्रेर्द्वौ प्रहरौ गतौ। व्याप्तं च गगनं मेघैः क्षणद्युतिसमन्वितैः॥५०॥
बभूव जलवृष्टिश्च निश्चेष्टा मथुरापुरी॥६१॥
घोरान्धकार निविडा बभूव यामिनी मुने। गते सप्तमुहूर्ते तु चाष्टमे समुपस्थिते॥६२॥
वेदातिरिक्त दुर्ज्ञेये सर्वोत्कृष्टे शुभे क्षणे। शुभग्रहे दृष्टियुक्तेऽप्यदृष्टे चाशुभग्रहे॥६३॥
अर्धरात्रे समुत्पन्ने रोहिण्यामष्टमी तिथौ। जयन्ती योग संयुक्ते चार्धचन्द्रोदये मुने॥६३॥
दृष्ट्वा दृष्ट्वा क्षणं लग्नं भीताः सूर्यादयस्तदा। गगने क्रममुल्लङ्घ्य जग्मुर्मीनं शुभावहाः॥६४॥
सुप्रसन्ना ग्रहाः सर्वे बभूवुस्तत्र संस्थिताः। एकादशास्ते प्रीत्या च मुहूर्तं धातुराज्ञया॥६५॥
अध्याय १३-श्री गर्ग उवाच—गर्गोऽहं यदुवंशानां चिरकालं पुरोहितः॥४१॥
पुत्रोऽयं वसुदेवस्य ज्येष्ठश्च (बलराम) तस्य च ध्रुवम्॥४६॥
मनुष्य रूप में भगवान् ने अपने चरित्र और उपदेश से जगत् को शिक्षा दी, अतः वे जगद्गुरु थे-कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् (शंकराचार्य कृत कृष्णाष्टक)। जन्म से ही अपनी परम योग विभूति को प्रकट करना शुरु किया तथा कई बार विश्वरूप का दर्शन कराया। अतः वे योगेश्वर हैं-यत्र योगेश्वरः कृष्णः— एकश्लोकी गीता, अन्तिम श्लोक (गीता, १८/७८)
(२) महापुरुष कृष्ण- पुरुष का अर्थ व्यक्ति और चेतन विश्व दोनों है। वेद के पुरुष सूक्त में जिस विश्व पुरुष का वर्णन किया है, वह व्यक्ति से बड़ा होने के कारण महापुरुष है। व्यक्ति की जो क्षमता है, उनका ही महत्तम रूप महापुरुष है। यह योग दर्शन का मत है कि ५२ प्रकार की विभूतियां साधना द्वारा एक एक कर पायी जा सकती हैं। ओड़िशा के पञ्चसखा कवियों में अच्युतानन्द ने योगमार्ग से इस रूप की भक्ति की, अतः उनको भी महापुरुष कहा गया। इसका उल्लेख गीता में महाबाहु रूप में है (गीता ११/२३)। केवल जगन्नाथ को ही महाबाहु कहते हैं। जो भगवान् की जैसी भक्ति करता है, भगवान् भी उसे वैसा ही मानते हैं (गीता ४/११)। अतः अच्युतानन्द को महापुरुष, तुलसीदास को गोस्वामी (सबहिं नचावत राम गोसाईं), रामदास को समर्थ (जय जय श्री रघुवीर समर्थ), जगन्नाथ दास को अतिबडि कहा गया।
(३) परम पुरुष -भागवत पुराण में वर्णित रूप हमारी कल्पना से परे है तथा यह विश्व का मूल आधार और स्रोत है। पुराण वर्णित होने से या सृष्टि में सर्वप्रथम (पुराना) होने से वे पुराण पुरुष हैं। जगन्नाथ दास ने भागवत के अनुसार उनकी भक्ति की तथा ओड़िया भागवत लिखा। यह महापुरुष से भी अति बड़ा होने से उनको अतिबड़ि जगन्नाथ दास कहा गया।
त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणः त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्। वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप॥ (गीता ११/३८)
गीता में विश्व रूप के बाद सहस्रबाहु और चतुर्बाहु रूप भी दिखाया। उसी प्रकार पुरुष सूक्त में सहस्रशीर्ष, अक्ष, पाद से आरम्भ कर विराट् (दृश्य जगत्) चेतन पशु रूप, यज्ञ रूप तथा यज्ञ समन्वय रूप दिखाया है। गीता, अध्याय ११-पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः (सहस्रशीर्ष) ॥५॥
सहस्र सिर, अक्ष, और पाद-अनेकवक्त्रनयनं (१०) दिवि सूर्य सहस्रस्य (१२) अनेक बाहूदरवक्त्र नेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्त रूपम् (१६)।
तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते (४६) दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्य जनार्दन (५१) ।
पुरुष सूक्त (वाजसनेयि यजुर्वेद, अध्याय ३१)
अनन्त विश्वरूप- सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्। स भूमिं विश्वतो वृत्वा अत्यत्तिष्ठद्दशाङ्गुलम्॥१॥
विश्व निर्माण-पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि॥३॥
दृश्य जगत् और अधिष्ठान-ततो विराट् अजायत, विराजो अधिपूरुषः॥५॥
पशु (साधन) और यज्ञ-तस्माद् यज्ञात् सर्व हुतः — पशूंस्तांश्चक्रे–॥६॥
मनुष्य-ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीत् बाहू राजन्यः कृतः।
ऊरू तदस्य यद् वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत॥११॥
यज्ञों का सम्बन्ध-यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवाः ॥१६॥
(४) स्रष्टा और सृष्टि रूप -यह रूप दारु ब्रह्म भी कहा गया है। भगवान् सृष्टि क्रम रूप में वृक्ष का मूल, शाखा और पत्र हैं, निरपेक्ष द्रष्टा हैं, विश्व निर्माण की सामग्री हैं, सृष्टि चक्र या संकल्प-कर्म-फल का चक्र हैं, कई चक्रों के समन्वय रूप में वन तथा विश्व के आधार भी हैं।
ब्रह्म वनं ब्रह्म स वृक्ष आसीत् यतो द्यावा पृथिवी निष्टतक्षुः।
मनीषिणो मनसा विब्रवीमि वो ब्रह्माध्यतिष्ठद् भुवनानि धारयन्॥ (तैत्तिरीय ब्राह्मण, २/८/९/१६)
= ब्रह्म ही वह वन और वृक्ष है जिसे काट कर जगत् का निर्माण हुआ। मनीषी चिन्तन कर कहते हैं कि ब्रह्म ने ही भुवनों का धारण किया।
यस्मात् परं नापरमस्ति किञ्चित्, यस्मान्नाणीयो न ज्यायोऽस्ति कश्चित्।
वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येनेदं पूर्णं पुरुषेण सर्वम्॥ (श्वेताश्वतर उपनिषद्, ३/९)
= पूर्ण पुरुष वृक्ष के जैसा आकाश में स्तब्ध हो कर देख रहा है। इससे परे कुछ नहीं है, इससे सूक्ष्म नहीं है न इसके अतिरिक्त कुछ है।
ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्। छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्। (गीता १५/१)
= जिसका मूल ऊपर है तथा शाखा नीचे है वह अविनाशी अश्वत्थ है। छन्द इसके पत्ते हैं। जो इस वृक्ष को जानता है, वही वेद जान सकता है।
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः। अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके॥२॥
न रूपमस्येह तथोपलभ्यते, नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा। अश्वत्थमेनं सुविरूढ़मूलमसङ्गशस्त्रेण दृढ़ेन छित्वा॥३॥
= संकल्प, क्रिया, फल के चक्र रूपी वृक्ष का जो बन्धन है, उसे काटने पर ही मनुष्य मुक्त हो सकता है।
अदो यद्दारुः प्लवते सिन्धोः पारे अपूरुषम्। तदारभस्व दुर्हणो येन गच्छ परस्तरम्॥
(ऋक् , शाकल्य शाखा, १०/१५५/३)
= यह समुद्र (विश्व विस्तार) के पार जो अपौरुषेय दारु (काठ) तैर रहा है, उसकी शरण में जाने से ही समुद्र को पार कर सकते हैं।
द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते। तयोरन्यः पिप्पलं स्वादु अत्ति अनश्नन् अन्यो अभिचाकषीति॥
(ऋक् १/१६४/२०, अथर्व ९/१४/२०, श्वेताश्वतर उपनिषद्, ४/६, मुण्डक उपनिषद्, ३/१/१)
= वृक्ष (सृष्टि क्रम, या संवित् कमल = ज्ञान वृक्ष) में दो पक्षी मित्र भाव से हैं। इनमें एक (जीव = ईव) पिप्पल (जिस फल में पीने की आसक्ति हो) को स्वाद से खाता है, अन्य (आत्मा = आदम) बिना खाये देखभाल करता है।
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् । ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना॥ (गीता, ४/२४)
= ब्रह्म ही अर्पण, हवि, अग्नि, हवन क्रिया है, कर्म तथा उसकी परिणति भी ब्रह्म ही है।
(५) रास क्रिया -विश्व के २ प्रकार के नृत्य हैं-एक दूसरे से सम्बन्धित क्रिया लास्य हैं तथा इस प्रकार का नृत्य रास है। इससे सृष्टि होती है। इसके विपरीत बिना किसी क्रम या सम्बन्ध के क्रिया ताण्डव है जिससे प्रलय होता है। मनुष्यों के रास नृत्य में एक व्यक्ति केन्द्र में होता है जो कृष्ण है। उसके चारों तरफ घूमने वाली गोपी हैं। कृष्ण सबका आकर्षण और नियन्त्रण करता है। इस नियन्त्रण के कारण ही सृष्टि का क्रम चलता रहता है-ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति। भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढ़ानि मायया॥ (गीता १८/६१)
नियन्त्रक रूप ईश्वर है, उसका नियन्त्रण केन्द्र हृदय है जिसके ३ भाग हैं-हृ = ग्रहण करने वाला, द = देने वाला, य = चक्रीय क्रम में नियमन करने वाला। (बृहदारण्यक उपनिषद्, ५/३/१)
विश्व में हर स्तर पर इसी प्रकार निर्माण चल रहा है। सूक्ष्मतम रूप में परमाणु के कण भी उसकी नाभि का चक्कर लगा रहा हैं। मूर्त विश्व में भी ९ प्रकार के सृष्टि सर्ग हैं। इनके निर्माण के चक्र ९ प्रकार के काल मान हैं-
ब्राह्मं पित्र्यं तथा दिव्यं प्राजापत्यं च गौरवम् । सौरं सावनं चान्द्रमार्क्षं मानानि वै नव ॥ (सूर्य सिद्धान्त, १४/१)
ब्रह्मा का दिन सृष्टि-प्रलय का चक्र है। उससे बड़े विष्णु, शिव, शक्ति के कालचक्र हैं।
आकाश में पृथ्वी अक्ष की २६,००० वर्षों में शंकु आकार में परिक्रमा को राधा-कृष्ण का रास कहा गया है जो कृत्तिका नक्षत्र से आरम्भ हो कर वहीं पूर्ण होता है। अतः कार्त्तिक-पूर्णिमा को रास-पूर्णिमा कहते हैं जिस दिन चन्द्र कृत्तिका नक्षत्र में होता है।
कार्त्तिक्यां पूर्णिमायां तु राधायाः सुमहोत्सवः॥४७॥ कृष्णः सम्पूज्य तं राधामुवास रासमण्डले।
कृष्णेन पूजितां तां तु सम्पूज्य हृष्टमानसाः॥४८॥ (देवीभागवत पुराण, ९/१२)
तन्नो देवासो अनुजानन्तु कामम् …. दूरमस्मच्छत्रवो यन्तु भीताः।
तदिन्द्राग्नी कृणुतां तद् विशाखे, तन्नो देवा अनुमदन्तु यज्ञम्।
नक्षत्राणां अधिपत्नी विशाखे, श्रेष्ठाविन्द्राग्नीभुवनस्य गोपौ॥११॥
पूर्णा पश्चादुत पूर्णा पुरस्तात्, उन्मध्यतः पौर्णमासी जिगाय।
तस्यां देवा अधिसंवसन्तः, उत्तमे नाक इह मादयन्ताम्॥१२॥
(तैत्तिरीय ब्राह्मण ३/१/१)
= देवता इन्द्राग्नि (कृत्तिका) से विशाखा तक परिक्रमा कर हमारी कामना पूरी करते हैं। उस समय वे पूर्ण होते हैं जिसे पौर्णमासी कहते हैं। तब गति उलटी होती है। यह परिक्रमा नाक (पृथ्वी कक्षा का उच्च विन्दु या ध्रुव) के चारो तरफ है। नाक से पृथ्वी अक्ष का २२.५ से २४.५ अंश तक झुकाव में परिवर्तन का चक्र ४१,००० वर्षों में है, जो च्युति (nutation) है।
सूर्य चाक्षुष कृष्ण है जिसके चारों तरफ ग्रह गोपी रूप में परिक्रमा कर रहे हैं। सृष्ठि का आधार (पद) पृथ्वी है, आधार रूप में राधा है।
चन्द्र को भी कृष्ण कहा है (रामचन्द्र, कृष्णचन्द्र)। चन्द्र मण्डल में सूर्य से निकले तेज (अंगिरा) तथा ब्रह्माण्ड के आकर्षित पदार्थ (भृगु) का मिलन होने से इसके केन्द्र में जीवन सृष्टि होती है।
अथ नयन समुत्थं ज्योतिरतेरिवद्यौः, सुरसरिदिव तेजो वह्नि निष्ठ्यूतमैशम्।
नरपतिकुल भूत्यै गर्भमाधत्त राज्ञी….(रघुवंश २/७५)
चन्द्रमा वै ब्रह्मा कृष्णः (यजु, २३/१३, शतपथ ब्राह्मण १३/२१/७/७)
सूर्य तेज की तीव्रता और गुणों के आधार पर उसके ५ भेद किये गये हैं जिनको ५ पशुओं का नाम दिया गया है-(१) अश्व = चलाने वाली शक्ति, (२) गौ-निर्माण का स्थान, गति तथा पदार्थ, (३) अवि (भेड़)-किरण की रैखिक गति, (४) अज (अव्यय पुरुष, निर्माण क्रम), (५) वैश्वानर-विश्व रूप में नर, चेतन शक्ति। वर्ष के विभिन्न भागों में किये गये कार्य पशु-बन्ध हैं। ऋतु अनुसार कार्य सूर्य की संक्रान्ति से आरम्भ होते हैं।
(६) विश्व रूप-विश्व ३ प्रकार के ७ से व्याप्त है। आकाश, पृथ्वी और मनुष्य शरीर में ७-७ लोक हैं। अन्य भी १४ अर्थ हैं। इनको ३ गुणा ७ समिधा (विश्व निर्माण सामग्री) या ३ गुणा ७ अस्तित्त्व (त्रिसत्य) और ७ अन्य सत्य भी कहा है।
ये त्रिषप्ताः परियन्ति विश्वा रूपाणि बिभ्रतः। वाचस्पतिर्बला तेषां तन्वो अद्य दधातु मे॥१॥ (अथर्व, शौनक संहिता, १/१/१)
सप्तास्यासन् परिधयस्त्रिः सप्त समिधः कृताः। देवा यद्यज्ञं तन्वाना अबध्नन् पुरुषं पशुम्। (पुरुष सूक्त, यजुर्वेद, ३१/१५)
सत्यव्रतं सत्यपरं त्रिसत्यं सत्यस्य योनिं निहितं च सत्ये। सत्यस्य सत्यम् ऋतसत्यनेत्रं सत्यात्मकं त्वां शरणं प्रपन्नाः॥ (भागवत पुराण, १०/२/२६)
विश्व का मूल रूप अज्ञात या अचिन्त्य रूप में कृष्ण है। कार्त्स्न्य (पूर्णता) रूप में भी कृष्ण है।
ब्रह्माण्ड की स्थिति (लोक = रजः) का कारण इसका आकर्षण केन्द्र है, जो प्रकाश को भी आकर्षित करने के कारण अदृश्य है। आधुनिक अनुमान के अनुसार यह १० लाख से १ कोटि सूर्य के बराबर मात्रा का कृष्ण विवर (ब्लैक होल) है।
आकृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन् अमृतं मर्त्यं च्।
हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन्॥
(ऋक् १/३५/२, वाज यजु ३३/४३, ३४/३१, तैत्तिरीय संहिता ३/४/११/२)
इस दृष्टि से सूर्य केन्द्र में है। ब्रह्माण्ड के अदृश्य कृष्ण की अपने रथ (सौरमण्डल) सहित परिक्रमा कर रहा है। स्वयं अपने क्षेत्र में वह ग्रह कक्षा के केन्द्र रूप में जीवन को उत्पन्न कर रहा है।
(७) जन्माद्यस्य यतः-ब्रह्मसूत्र के आरम्भ में यह ब्रह्म की परिभाषा है कि जिससे इस (जगत्) का जन्म आदि (वृद्धि, क्षय, मृत्यु, लीन) आदि होते हैं। ब्रह्मसूत्र की व्याख्या के लिए भागवत पुराण भी इस सूत्र की व्याख्या से आरम्भ होता है-जन्माद्यस्य यतोऽन्वयादितरतश्चार्थेष्वभिज्ञः स्वराट्,
तेने ब्रह्महृदा य आदि कवये मुह्यन्ति यत् सूरयः।
तेजोवारिमृदां यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गो मृषा,
धाम्ना स्वेन सदा निरस्तकुहकं सत्यं परं धीमहि॥१॥
= ब्रह्म से इस (जगत्) का जन्म आदि (विकास, क्षय, मृत्यु) होता है, पर वह इससे निरपेक्ष है, सर्वज्ञ है, स्वयं प्रकाशित है। उस आदि कवि (स्रष्टा) ने ब्रह्मा के हृदय में वेद ज्ञान दिया जिसमें ज्ञानी भी मोहित हो जाते हैं। तेज, वारि, भूमि आदि का एक दूसरे से निर्माण होता है। निराकार ब्रह्म में स्थित मिथ्या विश्व भी ३ गुणों के कारण सत्य दीखता है (सत्य = मूल सत्य, सत्यस्य सत्य, उससे निर्मित जगत् अपेक्षाकृत् मिथ्या या कम सत्य है)। अपने धाम में स्थित उसके ध्यान से माया का आवरण दूर कर परम सत्य का अनुभव करते हैं।
यही परिभाषा कई उपनिषदों में भी है-गणेश पूर्वतापिनी (१/३), गणेश उत्तरतापिनी (४/८), तैत्तिरीय (३/१), भस्मजाबाल (२/५)-यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति। यत् प्रयन्त्यभिसंवसन्ति। तद् विजिज्ञासस्व। तद् ब्रह्मेति (तैत्तिरीय, ३/१/१)
यही श्लोक गायत्री मन्त्र की भी व्याख्या है।
गायत्री मन्त्र—- भागवत प्रथम श्लोक
तत् सवितुः देवस्य — जन्माद्यस्य यतः।
धियो यो नः प्रचोदयात् — स्वराट्, आदि कवये, सूरयः
धीमहि (ध्यायेम) — धीमहि।
भर्गो देवः — तेजो वारि मृदा विनिमयः, त्रिसर्ग।
ब्रह्म सूत्र —- भागवत प्रथम श्लोक
अथातो ब्रह्म जिज्ञासा (१/१/१)–निरस्त कुहकं सत्यं परं धीमहि।
जन्माद्यस्य यतः (१/१/२) — वही।
शास्त्रयोनित्वात् (१/१/३) –तेने ब्रह्म।
तत्तु स्मन्वयात् (१/१/४) –(अर्थेषु) अन्वयात्।
ईक्षतेर्नाशब्दम् (१/१/५) — अर्थेष्वभिज्ञः।
एतेन सर्वे व्याख्याता (१/४/२९) — समन्वय अध्याय-मुह्यन्ति यत् सूरयः।
तदनन्यत्वमारम्भण शब्दादिभ्यः (२/१/१४)–अविरोध अध्याय-तेजो वारिमृदा यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गोऽमृषा।
जन्म मृत्यु का चक्र मनुष्य का है, सृष्टि का भी है। भगवान् का मुंह स्रोत है, अन्त पैर है। इनको सूर्य-यम कहा है-
पूषन् एकर्षे यम-सूर्य प्राजापत्य व्यूहरश्मीन् समूह (ईशावास्योपनिषद्, वाज. सं. ४०/१६)
जगत् में परिवर्तन होता रहता है। मनुष्य भी बाल रूप में जन्म ले कर युवा, वृद्ध होता है। पर भगवान् कृष्ण में कोई परिवर्तन नहीं होता। वे सदा बालक ही हैं। सृष्टि के लय रूप में अपना पैर मुंह में लिए हैं। निर्माण चक्र का प्रतीक वट वृक्ष है जिसकी शाखा भूमि से लग कर इसी प्रकार नया वृक्ष बनाती है। इस रूप में मार्कण्डेय मुनि ने भगवान् का दर्शन किया-
करारविन्देन पदारविन्दं, मुखारविन्दे विनिवेशयन्तम्।
वटस्य पत्रस्य पुटे शयानं, बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि॥
(बालमुकुन्दाष्टक, भागवत अध्याय १२/९ के अनुसार)

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