कैलेण्डर सुधार या विनाश अभियान

कैलेण्डर सुधार या विनाश अभियान

मैंने १९५७ में मेघनाद साहा की अध्यक्षता में गठित Calendar Reforms Committee की पूरी रिपोर्ट पढ़ी है। विक्रम संवत् को अस्वीकार करने का कोई कारण नहीँ लिखा है। पर बंगाल तथा केरल के सुधारवादियों के प्रचार से ऐसा लगता है कि वे सौर-चान्द्र मत को हीन मानते हैं तथा अंग्रेजी सौर कैलेण्डर की नकल अधिक शुद्ध मानते हैं। बंगाल की नकल में ओडिशा मे भी यह प्रवृत्ति हो गयी है तथा कहते हैं कि ओड़िआ संस्कृति में सौर वर्ष ही होता है। इसमें दो भावनाएं हैं-अपने को बाकी भारत से अलग दिखाना, अंग्रेजों की नकल कर महान् बनना। यह प्रचार बिलकुल झूठा तथा मूर्खतापूर्ण है। ओड़िशा का सबसे मुख्य पर्व है रथयात्रा जो सदा आश्विन शुक्ल द्वितीया को होता है। एक और पर्व है भाद्र शुक्ल द्वादशी जिस दिन वामन विष्णु ने इन्द्र के तीनों लोक बलि से ले लिये थे। इसी दिन से ओड़िशा के राजाओं का राजत्व काल गिना जाता है। यदि कोई फाल्गुन पूर्णिमा को राजा बना तो आगामी भाद्र शुक्ल द्वादशी को शून्य वर्ष गिना जायेगा, जैसे पेट्रोल पम्प पर शून्य से गिनती आरम्भ करते हैं। उसके बाद के वर्षों में भाद्र शुक्ल द्वादशी को क्रमशः १,२, ३— वर्ष गिने जायेंगें। इसी पर्व को केरल में ओणम कहते हैं, जिससे अंग्रेजी में वन (one) हुआ है (या उन = १ कम से)। पर यह पुराण वर्णित भाद्र शुक्ल द्वादशी के बदले सिंह मास की ५ तिथि को मनाते हैं जिसका अभी तक कोई आधार नहीँ मिला है। कुछ वर्षों (२९ या ३० वर्ष में एक बार) में सिंह मास की ५ तिथि को भाद्र शुक्ल द्वादशी सम्भव है, पर बलि से तीन लोक का राज्य लेने के दिन सिंह मास की ५ तिथि थी या नहीँ, यह कहीं नहीँ लिखा है।
समिति रिपोर्ट की भूमिका में बिना नाभ दिये न्यूगेबायर की पुस्तक (Exact Sciences of Antiquity-Otto Neugebauer) को उद्धृत किया है कि कैलेण्डर दो प्रकार के होते हैं-एक गणितीय तथा दूसरा व्यावहारिक। न्यूगेबायर ने लिखा है कि प्राचीन मिस्र में दोनों तरह के वर्ष चलते थे। पर भारत में भी ऐसा हो सकता है, यह न न्यूगेबायर की समझ में आया न उनकी नकल करने वाले मेघनाद साहा को।
दो कैलेण्डर का अर्थ इन लोगो ने समझा कि गणित के अनुसार किसी तिथि जैसे एकादशी का आरम्भ दिन-रात में कभी भी हो सकता है, पर व्यवहार में स्थानीय सूर्योदय से ही माना जाता है।
पर समस्या इससे गम्भीर है। मुस्लिम शासकों को लगान वसूली में समस्या होती थी कि ऋतु चक्र से उनका वर्ष हर तीन साल में एक वर्ष पिछड़ जाता था। अतः फसल हर वर्ष अलग-अलग महीनों में होता था। फसल के बाद ही उसके अनुसार लगान लिया जाता था। अतः उसके लिये फसली सन का व्यवहार होता था। अन्य वर्ष अमली कहलाता था।
भारत में यह समस्या नहीँ थी क्योंकि हर ३०-३१ मास के बाद १ अधिक मास जोड़ कर चान्द्र वर्ष को सौर वर्ष या ऋतु चक्र के प्रायः समतुल्य करते थे। यह सौर वर्ष के साथ चलता था, या इसके अनुसार समाज चलता था, अतः इसे सम्वत्सर (सम् + वत् + सरति = साथ चलता है) या संक्षेप में सम्वत् कहते थे।
यहाँ सम्वत् तथा शक दो प्रकार के वर्ष चलते थे। प्रति दिन की गणना द्वारा सौर मास तथा वर्ष की गणना शक है जैसे रोमन कैलेण्डर। इससे दिन गणना तथा किसी समय विन्दु (शक वर्ष आरम्भ) से बीते दिनों की गणना तथा उससे ग्रह गति की गणना सहज है। पर पूजा मानसिक क्रिया है तथा मन का नियन्त्रक चन्द्रमा है-चन्द्रमा मनसो जातः (पुरुष सूक्त)। अतः चान्द्र तिथि के अनुसार ही पर्व होते हैं। इसमें गणना की कठिनाई होती है। ५ तिथि के बाद किसी स्थान पर ५, ६ या ७ तिथि भी हो सकती है। अतः कब ५ तिथि होगी इसकी गणना के लिये शक वर्ष आवश्यक है। शक का अर्थ है १-१ कर दिनों का समुच्चय। इसे अहर्गण (day count) भी कहते हैं। केवल सम्वत् से काम नहीं चलता। पूछना पड़ता है कि निर्जला एकादशी १३ जून को होगी या १४ को। उलटा नहीँ पूछते कि १३ जून कब पड़ेगा-एकादशी या द्वादशी को? तिथि गणना के लिये सम्वत् तथा क्रमागत दिनों की गणना के लिए शक है।
भारत में जितनी गणना की पुस्तकें हैं उनमें शालिवाहन शक का प्रयोग हुआ है तथा पर्व निर्णय के लिये विक्रम सम्वत् का। वराहमिहिर तथा ब्रह्मगुप्त के समय शालिवाहन शक आरम्भ नहीं हुआ था, अतः उस समय ६१२ ईपू के चाप या चपहानि शक का प्रयोग होता था (बृहत् संहिता, १३/३) जब दिल्ली के चाहमान राजा ने असीरिया की राजधानी निनेवे को ध्वस्त कर दिया था (बाइबिल में ५ स्थानों पर उल्लेख)। उससे पहले युधिष्ठिर शक का प्रयोग प्रचलित था।
जितने भी राजाओं ने अपने वर्ष चलाये उनको शक-कारक कहा गया है। उन सभी से अंग्रेजों की शत्रुता है क्योंकि मनमाना तिथि देने में कठिनाई होती थी। सबसे अधिक विक्रमादित्य से शत्रुता है क्योंकि आजषभी उसी के अनुसार पर्व का पालन हो रहा है। उसके अतिरिक्त उन्होंने जूलियस सीजर को भी बन्दी बनाया था। अति घृणा के कारण अंग्रेज या उनके अनुचर विक्रमादित्य का नाम भी नहीँ लेते और इसको हटाने की योजना १८९० से चल रही थी। १८९०, १९३० तथा उसके बाद १९५७ की पञ्चाङ्ग सुधार समितियों का एक मात्र उद्देश्य था विक्रम संवत् को समाप्त करना। सुधार की भावना कभी नहीं थी। पिछले १३० वर्षों में किसी भी सुधारक को यह पता नहीं चला है कि विक्रम संवत् में भूल या अशुद्धि क्या है? जब भूल का पता नही है तो किस सुधार के लिये ये बेचैन थे?
शालिवाहन शक को राष्ट्रीय शक के नाम से प्रचलित करने का आग्रह इस लिये था क्योंकि इनके अनुसार यह विदेशी शक राजा कनिष्क का था। यह कई प्रकार से झूठ है-(१) यह शक विक्रमादित्य के पौत्र शालिवाहन का था जो ७८ ईसवी में आरम्भ हुआ। राजतरंगिणी के अनुसार कनिष्क का समय उससे १३०० वर्ष पूर्व १२९२-१२७२ ईपू था।
(२) कनिष्क शक राजा नहीँ था। वह कश्मीर के गोनन्द वंश का ४३वां राजा था।
(३) अलबरूनी की पुस्तक प्राचीन देशों की काल गणना (Chronology of Ancient Nations) में स्पष्ट लिखा है कि किसी भी शक राजा ने अपना कैलेण्डर नहीँ चलाया। वे ईरान या सुमेरियन कैलेण्डर का पालन करते थे।
(४) शक राजाओं का प्रभाव प्रायः १०० वर्ष के लिये पश्चिम उत्तर भारत में था। उनका यदि कैलेण्डर होता तो उसका प्रयोग पूर्व और दक्षिण भारत, कम्बोडिया तथा फिलीपीन (लुगुना शिलालेख) में नहीँ होता। इन स्थानों पर इनके प्रयोग से स्पष्ट है कि विक्रमादित्य का प्रत्यक्ष शासन हो या नहो, उनका प्रभाव वहाँ तक अवश्य था।
श्री अरुण उपाध्याय (धर्म शास्त्र विशेषज्ञ)

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