क्या हैं ब्रह्मगायत्री से लाभ

संसार में मानव अपने बाह्य शत्रुओं से उतना कष्ट नहीं पाता है जितना कष्ट उसे अपनी कुकल्पनाओं से मिलता है । जैसे कुछ लोग अपने शत्रुओं की ही कल्पना में लगे रहते हैं । हमारे शत्रु इस प्रकार प्रबल हैं । न जाने सुरक्षा कम होने पर कैसे मुझे आफ़त में डाल देंगे । मार देंगे–इत्यादि ।

साधक भी कभी कभी विघ्नों का चिन्तन करते हुए उन्हें अपनी कल्पनाओं से बड़ा बनाता जाता है । हम इतना कवचपाठ या मन्त्र जप नहीं करेंगे तो हमारी अमुक हानि हो जायेगी –ऐसी कुकल्पनायें साधक को उसके मुख्य लक्ष्य से भटकाकर
व्यथित करती रहती हैं ।
झोलाछाप ज्योतिषी, वैद्य/डॉक्टर और तान्त्रिकों के पास कभी न जायें । ये सब किसी का भी ग्रह अरिष्ट बताकर उसे आपत्ति में डाल देते हैं । झोलाछाप डॉक्टर डेग्नास्टिक सेन्टरों से सम्बन्ध बनाकर ग़लत रिपोर्ट और दवाओं के माध्यम
से ठगते हैं । झोलाछाप तान्त्रिक न जाने कितने भूत प्रेत की बात आपके मन में बिठाकर पैसा ऐंठने की करामात दिखाते रहेंगे । अतः इनसे अवश्य बचें ।
विशेषकर सन्ध्या और ब्रह्मगायत्री से सम्बन्ध रखने वाले तान्त्रिकों के चक्र से दूर ही रहें । ब्रह्मगायत्री से बडी न श्मशान काली है न कोई महाविद्या । ब्रह्मगायत्री जापक के ऊपर न कोई प्रयोग चल सकता है न ही कोई चेटकविद्या । इसलिए धूर्त तान्त्रिकों से दूर ही रहना चाहिए । तान्त्रिक प्रयोग ब्रह्मगायत्री के भी हैं । लगना हो तो उसी में लगें ।

जो साधक १००० ब्रह्मगायत्री जपेगा उस पर कोई भी प्रयोग नहीं चल सकता । यह महान् साधकों का अनुभव है ।
ऐसे साधक पर ग्रह भी अपना दुष्प्रभाव नहीं डाल सकते । रोग भी दूर ही रहते हैं । अतः द्विजों को भगवती गायत्री
की ही शरण सर्वोपरि है ।
अन्य साधनायें करते रहने पर भी यदि ब्रह्मगायत्री से कुछ दूर हुए अर्थात् ३माला से कम जप किये तो कोई दुष्प्रभाव
हम पर पड़ सकता है । एक साधक ने बतलाया कि उन्हें रात्रि १बजे साधनाकाल में अकस्मात् काम का प्रकोप दिखाई पड़ा तो उन्होंने आत्मनिरीक्षण करने पर पाया कि गायत्रीजप कुछ दिनों से न के बराबर हो गया है । उन्होंने दूसरे दिन प्रातःकाल गायत्री का ३माला जप किया तो वह प्रकोप शान्त हो गया ।
एक साधक को प्रेरणा हुई कि अमुक बालक को गायत्री जप के लिए कहें । किन्तु कई कारणों से वे उसे बता न पाये । परिणाम यह कि सायंकाल छात्र एक्सीडेन्ट का शिकार हो गया । उसी छात्र ने जब गायत्रीजप पहले आरम्भ किया था । तब उसे सायंकालिक गायत्री का ध्यान नहीं बतलाया गया था और जप भी शाम को ही वह करता था ।

उसने जप में देखा कि एक कृष्णकाय पुरुष उसे मारने दौड़ा आ रहा है कि तुरन्त उसके ऊपर छात्र की ओर से एक त्रिशूल चला और वह पुरुष मार डाला गया । यह सायंकालिक ध्यान के देवी का अस्त्र है । उसके बाद उसका मन जप में लगने लगा । और शान्ति का अनुभव आश्चर्यजनक हुआ ।
इसलिए नित्य कर्म में ब्रह्मगायत्री का जप बढ़ाना चाहिए । और प्रतिदिन हो सके तो एक कवच का पाठ अवश्य करें ।

डॉ. मदन मोहन पाठक ( धर्म शास्त्र विशेषज्ञ )

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