क्या है काल का अर्थ, भेद, माप

श्री अरुण उपाध्याय (धर्मज्ञ)

१. काल की परिभाषा-भारत में विभिन्न दर्शनों में काल की परिभाषा कई प्रकार से दी गयी है। इनका संकलन श्री वासुदेव पोद्दार की पुस्तक विश्व की कालयात्रा में है (अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना, केशव कुंज, नयी दिल्ली-५५, २०००)। इनका सारांश है-
परिवर्तन का आभास काल है।
परिवर्तन क्या है-किसी स्थान पर एक वस्तु थी, वह अन्य स्थान पर चली गयी-यह गति या क्रिया है।
एक वस्तु जिस रूप में थी, वह अन्य रूप में दीखती है।
कई वस्तुओं का संग्रह एक स्थिति में था, अन्य स्थिति में दीखता है।
इनको परिणाम, पृथक् भाव या व्यवस्था क्रम कहा है-
परिणामः पृथग्भावो व्यवस्था क्रमतः सदा। भूतैष्यद्वर्त्तमानात्मा कालरूपो विभाव्यते॥
(सांख्य कारिका, मृगेन्द्रवृत्ति दीपिका, १०/१४)
इस प्रकार देश-काल-पात्र या ज्योतिष में दिक्-देश-काल परस्पर सम्बन्धित हैं।
दिक्कालावकाशादिभ्यः (कपिल सांख्य सूत्र, २/१२)
२. काल के भेद-विश्व को जितने प्रकार से देखते हैं, काल उतने ही प्रकार का है। वेद में मनुष्य, विश्व या उसकी कोई वस्तु-सभी को पुरुष कहते हैं। पुरुष वह है जो किसी पुर (नगर) अर्थात् सीमा के भीतर दिखे।
विश्व और उनके काल के प्रकार हैं-
(१) क्षर पुरुष-जिसका हमेशा क्षय होता रहता है, तथा अन्त में पूरा विनाश हो जाता है। यह एक ही दिशा में है, जो बूढ़ा है वह पुनः युवक या बच्चा नहीं हो सकता। आग से धुंआ निकलता है, वह वापस अपने स्रोत में नहीं आ सकता है। इसके काल को नित्य काल कहते हैं, जिसका एक अर्थ मृत्यु भी है। इसे आधुनिक भौतिक विज्ञान के थर्मोडाइनेमिक्स में एण्ट्रोपी हैं-कोई भी वस्तु या संहति सदा अधिक अव्यवस्था की दिशा में जाती है।तीन पुरुषगीता, अध्याय १५-द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च। क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते॥१६॥
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः। यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः॥१७॥
अजोऽपि अन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्। (गीता ४/६)
नित्य काल-कालोऽस्मिलोकक्षयकृत्प्रवृद्धो, लोकान्समाहर्तुमिहप्रवृत्तः।। (गीता१०/३२)
सूर्यसिद्धान्त (१/१०) में२प्रकारकेकालकहेगयेहैं-अन्तकृत्यानित्यकाल, कलनात्मकयाजन्य।
लोकानामन्तकृत्कालःकालोऽन्यःकलनात्मकः।सद्विधास्थूलसूक्ष्मत्वात्मूर्तश्चामूर्तउच्यते॥१०॥
(२) अक्षर पुरुष-क्षरण या क्षय के बाद भी किसी वस्तु का नाम, रूप गुण प्रायः वैसा ही बना रहता है। बूढ़े होने पर भी हमारा वही नाम और परिचय रहता है जो जन्म के समय था। इसी प्रकार कुछ परिवर्तन प्रायः एक चक्र में होते हैं। जैसे हर २४ घण्टे में किसी स्थान पर सूर्योदय हो जाता है। इससे हम दिन या उससे छोटे समय की माप करते हैं। प्रकृति के मुख्य चक्र हैं-दिन, मास, वर्ष। इसी के अनुसार हम काम तथा उत्पादन करते हैं। अतः इसे जन्य (जन्म देने वाला, उत्पादक) काल कहते हैं इसी से या इसके खण्डों या बड़े गुणकों से समय की माप होती है। इसी के अनुसार विज्ञान के सभी माप और गणित हैं। अन्य गणना से यह अधिक कठिन है। यान्त्रिकी में द्रष्टा के अनुसार गति होती है। पर प्रकाश या विद्युत् प्रभाव की गति हर द्रष्टा के लिये समान होती है। अतः भगवान् ने कलन (गणना) में सबसे कठिन इसी को कहा है। जन्यकाल-कालःकलयतामहम्। (गीता१०/३०),
(३) अव्यय पुरुष-यदि किसी पूरी व्यवस्था को देखें तो उसके एक वस्तु में जो कमी होती है, उतना अन्य में बढ़ जाता है। कुल योग उतना ही रहता है। इसके लिये भौतिक विज्ञान में ५ प्रकार के संरक्षण नियम हैं। अन्ततः यह पूरे विश्व का काल है। इस अक्षय काल को ही विश्व का स्रोत (मुख) या धारण करने वाल कहा है।
अक्षय काल-अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः (गीता १०/३३)
(४) परात्पर पुरुष-बहुत छोटे या बहुत बड़े स्तर के विश्व का अनुभवनहीं किया जा सकता। या, वह सब जगह समान होता है जिसका वर्णन नहीं हो सकता। अतः इसे परात्पर पुरुष तथा इसके काल को परात्पर काल कहते हैं।
भागवत पुराण (३/११) कैवल्यं परममहान् विशेषो निरन्तरः॥२॥
एवं कालोऽप्यनुमितः सौक्ष्म्ये स्थौल्ये च सत्तम॥ संस्थानभुक्ता भगवानव्यक्तो व्यक्तभुग्विभुः॥३॥
कालकावर्णनभागवतपुराण, स्कन्ध३, अध्याय११तथाअथर्ववेद, शौनकशाखा, काण्ड१९, सूक्त५३, ५४मेंहै।
३. काल की माप-३ प्रकार के काल का वर्णन हर भाषा में प्रचलित है।
नित्य काल-आयु बीत रही है। उसका काल (मृत्यु) आ गयी।
जन्य काल-कितना समय हुआ (किसी निश्चित विन्दु से कितना वर्ष, मास, दिन हुआ या कितना घण्टा/मिनट/सेकण्ड हुआ)।
अव्यय काल-अभी समय ठीक नहीं है।
परात्पर काल-काल की गति कौन जानता है?
इनमें प्रथम २ काल का वर्णन स्टीफेन हाकिंस ने अपनी पुस्तक ’ब्रीफ हिस्टरी ऑफ टाइम’ में किया है। इसमें कलनात्मक या जन्य काल का वर्णन पूर्ण नहीं है। हम यान्त्रिकी तथा प्रकाश के लिये एक ही काल का प्रयोग गणित सूत्रों में करते हैं, पर सिद्धान्त रूप में वे अलग हैं।
काल माप की कई प्रकार की इकाइयां हैं। इनके २ कारण हैं-
(१) बड़े-छोटे माप-आणविक स्तर की क्रियाओं में बहुत सूक्ष्म समय लगता है; उनके लिये बहुत छोटी इकाई चाहिये। मनुष्य जीवन से सम्बन्धित इकाइयां दिन-मास-वर्ष से सम्बन्धित हैं जो सूर्य चन्द्र की दृष्ट गति से सम्बन्धित प्राकृतिक चक्र हैं। दिन के छोटे अंशों घण्टा-मिनट-सेकण्ड का प्रयोग होता है। आकाश में ग्रह गति में परिवर्तन, सूर्य चन्द्र का निर्माण आदि के लिये बहुत बड़े माप की जरूरत है।
(२) काल की विभिन्न प्राकृतिक इकाइयों में सरल सम्बन्ध नहीं है। सभी दिन बराबर नहीं हैं। सौर या चान्द्र मास में दिनों की संख्या पूर्ण अंक नहीं है और ये बदलते रहते हैं। इसी प्रकार सौर या चान्द्र वर्ष में दिन संख्या पूर्ण नहीं है।
इनके समाधान के लिये प्रकृति में ९ प्रकार के निर्माण चक्रों (पुराण में सृष्टि के सर्ग) के लिये ९ प्रकार के काल मान हैं। वर्ष से बड़ी अवधि की माप के लिये ७ प्रकार के युग हैं जो दो या अधिक कालमानों के योग से बने हैं।सूर्यसिद्धान्त (१४/१) के अनुसार ९ प्रकार के काल हैं-
ब्राह्मं पित्र्यं तथा दिव्यं प्राजापत्यं च गौरवम्। सौरं सावनं चान्द्रमार्क्षं मानानि वै नव॥
बड़े मान से आरम्भ कर इनका क्रम है-ब्राह्म, प्राजापत्य, दिव्य, गुरु, चान्द्र, सौर, सावन, नाक्षत्र।
ये सभी कलनात्मक होने के कारण जन्य काल हैं, अतः सृष्टि के ९ सर्गों के अनुसार हैं। सभी सर्गों की निर्माण अवस्था १ -१ मेघ है, अतः बाइबिल में ९ मेघ कहे गये हैं।
४. काल मान-९ प्रकार के काल मान तथा उनकी परिभाषा नीचे दी जा रही है-
(१) ब्राह्म-अव्यक्त से व्यक्त की सृष्टि को ब्रह्मा का दिन तथा उसके लय को रात्रि कहा गया है-
सहस्र युग पर्यन्तमहर्यद् ब्रह्मणो विदुः। रात्रिं युग सहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः॥१७॥
अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे। रात्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्त संज्ञके॥१८॥ (गीता, अध्याय ८)
पुराणों और सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार १२,००० दिव्य वर्षों का युग होता है। एक दिव्य वर्ष ३६० सौर वर्षों का है। अतः
ब्रह्मा का दिन या कल्प = १००० युग = १००० x ३६० x १२००० = ४३२ कोटि वर्ष।
उतने ही मान की रात्रि है। आधुनिक भौतिक विज्ञान के अनुसार दृश्य जगत् की सीमा प्रायः उतनी ही है जितनी दूर तक ब्रह्मा के अहो-रात्र में प्रकाश जा सकता है, अर्थात् ८६४ कोटि प्रकाश वर्ष त्रिज्या का क्षेत्र। ब्रह्मा के अहोरात्र मान से ३० दिनों का मास, १२ मासों का वर्ष तथा १०० वर्ष की परमायु है। अर्थात् ब्रह्मा की आयु ७२,००० कल्प है-
= ७२००० x ४३२ x १०घात७ x ३६० = प्रायः १.१२ x १०घात १७ दिन।
ज्योतिष में कल्प तक की ही गणना की जाती है। केवल वटेश्वर सिद्धान्त में मन्दोच्च गति की गणना ब्रह्मा के १०० वर्षों में की है। ब्रह्मा की आयु में १ परार्ध दिन होते हैं, अतः उसे या उसके आधे भाग को परार्ध कहते हैं। अभी ब्रह्मा का परार्ध या ५० वर्ष पूर्ण हो चुके है, ५१वें वर्ष का प्रथम कल्प श्वेतवराह चल रहा है, जिसमें ६ मन्वन्तर बीत चुके हैं, ७वें में २७ युग बीत चुके हैं, २८ वें का कलियुग १७-२-३१०२ ई.पू. में आरम्भ हुआ। ब्रह्मा से बड़े काल-मान विष्णु, शिव तथा पराशक्ति के हैं-
विष्णु पुराण, अध्याय (१/३)-काष्ठा पञ्चदशाख्याता निमेषा मुनिसत्तम। काष्ठास्त्रिंशत् कला त्रिंशत् कला मौहूर्तिको विधिः॥८॥
तावत् संख्यैरहोरात्रं मुहूर्त्तैर्मानुषं स्मृतम्। अहोरात्राणि तावन्ति मासः पक्ष द्वयात्मकः॥९॥
तैः षड्भिरयनं वर्षं द्वेऽयने दक्षिणोत्तरे। अयनं दक्षिणं रात्रिर्देवानामुत्तरं दिनम्॥।१०॥
दिव्यैर्वर्ष सहस्रैस्तु कृत त्रेतादि संज्ञितम्। चतुर्युगं द्वादशभिस्तद्विभागं निबोध मे॥११॥
प्रोच्यते तत्सहस्रं च ब्रह्मणो दिवसं मुने॥१५॥ ब्रह्मणो दिवसे ब्रह्मन् मनवस्तु चतुर्दश॥१६॥
ब्राह्मो नैमित्तिको नामतस्यान्ते प्रतिसञ्चरः॥२२॥
अध्याय (६/५) द्विपरार्धात्मकः कालः कथितो यो मया तव। तदहस्तस्य मैत्रेय विष्णोरीशस्य कथ्यते॥४७॥
व्यक्ते च प्रकृतौ लीने प्रकृत्या पुरुषे तथा। तत्र स्थिते निशा चास्य तत्प्रमाणा महामुने॥४८॥
(२) प्राजापत्य-ब्रह्म का क्रियात्मक रूप प्रजापति कहते हैं। मनुष्य रूप में प्रजा का पालन करने वाला राजा भी प्रजापति है। आकाश में यज्ञ या निर्माण कार्य ब्रह्माण्ड के निर्माण से हुआ। उसका चक्र-भ्रमण ही ब्रह्माण्ड का प्रथम यज्ञ है। अतः यह प्राजापत्य काल हुआ। ब्रह्माण्ड विराट् मन की सबसे बड़ी प्रतिमा है, अतः इसे मनु तत्त्व कहते हैं। इसका अक्ष-भ्रमण मन्वन्तर है। ब्रह्माण्ड मन की प्रतिमा हमारा मन है, जिसके कण (कोषिका) की संख्या उतनी ही (१० घात ११) है, जितनी ब्रह्माण्ड के कण (तारा)। व्यक्ति में भी वही मनु तत्त्व होने के कारण उसे मनुष्य कहते हैं। यह गणना शतपथ ब्राह्मण में है।
पुराणों के अनुसार ब्रह्मा के दिन में १४ मन्वन्तर हैं। अतः
१मन्वन्तर = १०००युग/१४ = ७१.४३युग।
गणना में हम १ मन्वन्तर = ७१ युग लेते हैं। ६ युग बचते हैं, जिनको हम १५ सन्ध्या में बांट देते हैं, जो दो मनु के बीच का सन्धि-काल हैं, तथा मन्वन्तर के आरम्भ और अन्त में भी आते हैं।
प्रत्येक सन्धि काल = ६/१५ = ४/१० युग। युग के १० भाग करने पर उसके ४ खण्ड सत्य, त्रेता, द्वापर, कलि क्रमशः४, ३, २, १ भाग हैं। अतः प्रत्येक सत्य युग = ४/१० युग, जो मन्वन्तरों के बीच की सन्ध्या हैं। अतः
१ मन्वन्तर = ७१ युग = ७१ x ४३२०००० = ३१,६८,००,००० वर्ष।
आधुनिक मान से भी ब्रह्माण्ड का अक्ष-भ्रमण काल प्रायः इतना ही ३२ कोटि वर्ष होना चाहिये। केन्द्र से २/३ त्रिज्या दूरी पर सूर्य ब्रह्माण्ड केन्द्र की परिक्रमा प्रायः २०-२५ कोटि वर्ष में करता है, बाहरी भाग का परिभ्रमण धीमा होगा तथा प्रायः ३२ कोटि वर्ष होना चाहिये।
आर्यभट ने स्वायम्भुव मनु की परम्परा में कल्प तथा युग दोनों के समान विभाग माने हैं। इसमें युग वही है ४३,२०,००० वर्ष पर उसके ४ समान विभाग हैं-सत्य, त्रेता, द्वापर, कलि-प्रत्येक का मान १०,८०,००० वर्ष है। प्रति मन्वन्तर भी ७१.४३ के बदले पूर्ण ७२ युग का लिया है, अतः १ कल्प = ७२ x १४ = १००८ युग। वटेश्वर ने भी यही मन्वन्तर तथा कल्प माना है।
(३) दिव्य मान-सूर्य के उत्तरायण-दक्षिणायन गति चक्र या वर्ष (ऋतु वर्ष) को दिव्य दिन कहते हैं। ऐसे ६० दिव्य दिन अर्थात् ३६० सौर वर्ष का दिव्य वर्ष होगा। यह ३ प्रकार से परिभाषित है-
वायु पुराण के २८ व्यासों की सूची में इसे परिवर्त युग कहा गया है, अर्थात् यह ऐतिहासिक परिवर्तन का चक्र है। १०० कोटि योजन के लोकालोक भाग (सूर्य के चारों तरफ ग्रह कक्षा का क्षेत्र)की सीमा पर यदि कोई काल्पनिक ग्रह हो तो उसका परिभ्रमण काल भी प्रायः ३६० वर्ष होगा। केप्लर सिद्धान्त के अनुसार इसकी त्रिज्या = (३६०) घात २/३ = ५०.६०६ ज्योतिषीय इकाई , अर्थात् ११८.६१ कोटि योजन व्यास होगा। इस नियम के अनुसार परिभ्रमण काल का वर्ग, ग्रह की दूरी (बृहद् अक्ष) के घन के अनुपात में होता है। तीसरा अर्थ है कि सूर्य की उत्तर-दक्षिण गति को ही दिव्य दिन कहते हैं, जैसे उदय-अस्त का चक्र दिन कहलाता है। पुराण तथा ज्योतिष ग्रन्थों में उत्तरायण को देवों का दिन तथा असुरों की रात्रि कही गयी है (उद्धरण ब्राह्म मान में हैं), अतः ३६० दिनों के सावन वर्ष की तरह ३६० दिव्य दिनों का दिव्य वर्ष होगा।
(४) गुरु मान-गुरु ग्रह १२ वर्ष में सूर्य की १ परिक्रमा करता है। मध्यम गुरु १ राशि जितने समय में पार करता है, वह ३६०.०४८६ दिन (सूर्य सिद्धान्त, अध्याय १४) का गुरु वर्ष कहा जाता है। दक्षिण भारत में पैतामह सिद्धान्त के अनुसार सौर वर्ष को ही गुरु वर्ष कहा गया है। रामदीन पण्डित द्वारा संग्रहीत-बृहद्दैवज्ञरञ्जनम्, अध्याय ४ में इनका संग्रह है।
(५) सौर मान-सूर्य की १ अंश गति १ दिन, ३० अंश (१ राशि) गति १ मास तथा ३६० अंश गति (पूर्ण भगण या चक्र) १ सौर वर्ष होता है। इस प्रकार केवल सौर वर्ष तथा सौर मास की गणना होती है। सौर मास के अनुसार ही ऋतु की गणना होती है। यह ऋतु वर्ष है, जो नाक्षत्र सौर वर्ष से थोड़ा कम होता है, क्योंकि पृथ्वी का अक्ष शंकु अकार में २६,००० वर्षों में विपरीत गति से घूम रहा है। इस चक्र को ब्रह्माण्ड पुराण में मन्वन्तर कहा गया है। ऋतु वर्ष के ही भागों को ऋतु कहा गया है, जो दीर्घकालिक अन्तर को छोड़ देने पर सौर संक्रान्ति (राशि परिवर्तन) से निर्धारित होता है। २-२ सौर मास की १ ऋतु, ३ ऋतु या ६ मास का १ अयन है। इन सौर मासों के नाम हैं-
मधुश्च माधवश्च, शुक्रश्च शुचिश्च, नभश्च, नभस्यश्च, ईषश्चोर्जश्च, सहश्च सहस्यश्च, तपश्च तपस्यश्चोपयाम गृहीतोऽसि संसर्पोऽस्यहंस्पत्यायत्वा॥ (तैत्तिरीय संहिता, १/४/१४)
मधुश्च माधवश्च वासन्तिकावृतू। शुक्रश्च शुचिश्च ग्रैष्मावृतू। नभश्च, नभस्यश्च वार्षिकावृतू। ईषश्चोर्जश्च शारदावृतू। सहश्च सहस्यश्च हैमन्तिकावृतू। तपश्च तपस्यश्च शैशिरावृतू॥ (तैत्तिरीय संहिता, ४/४/११)
वर्ष में ५ या ३ ऋतुओं के विभाजन भी सौर मास के ही आधार पर हैं-
द्वादश मासाः पञ्चर्तवो हेमन्त शिशिरयोः समासेन। (ऐतरेय ब्राह्मण, १/१)
(६) चान्द्र मान-सूर्य की तुलना में चन्द्र गति अर्थात् चन्द्रमा की कला (प्रकाशित भाग) का चक्र प्रायः २९.५ दिन का होता है, जो चान्द्र मास कहा जाता है। अमावास्या (एक साथ वास) में सूर्य-चन्द्र एक ही दिशा में होते हैं, उसके बाद चन्द्र आगे बढ़ने पर वह दीखना शुरु होता है, जिसे दर्श कहते हैं। दर्श से पूर्णिमा तक शुक्ल पक्ष में १५ तिथि (प्रायः १५ दिन) तथा उसके बाद पूर्णिमा से दर्श तक कृष्ण पक्ष में १५ तिथियां होतीं हैं। इस चक्र के अनुसार प्रायः सभी यज्ञ-चक्रों को वेद में दर्शपूर्ण-मास यज्ञ कहा गया है। १२ चान्द्र-मास में प्रायः ३५४ दिन होते हैं, जबकि सौर वर्ष में ३६५.२५ दिन होते हैं, अतः प्रायः ३१ मास के बाद वर्ष में १ अधिक मास जोड़ कर उसे सौर मास या ऋतु-चक्र के समतुल्य करते हैं। अधिक मास में सूर्य उसी राशि में रह जाता है, जिसमें वह पूर्व मास में था।
चन्द्रोदय से आगामी चन्द्रोदय को भी तिथि कहा जाता था-
यां पर्यस्तमयादभ्युदयादिति सा तिथिः। (ऐतरेय ब्राह्मण, ३२/१०)
(७) पितर मान- चन्द्र के ऊपरी (विपरीत भाग जो नहीं दीखता है) में पितर रहते हैं। अतः चान्द्र-मास को पितरों का दिन कहा गया है। विपरीत भाग (पृथ्वी से दूर) में रहने के कारण कृष्ण पक्ष पितरों का दिन तथा शुक्ल पक्ष पितरों की रात्रि होती है। ३० चान्द्र मास का पितर मास तथा ३० चान्द्र वर्ष का पितर वर्ष होता है।
(८) सावन मान-सूर्योदय से आगामी सूर्योदय का सावन दिन, ३० दिन का मास तथा १२ मास का वर्ष होता है। इसे सौर मास के समतुल्य करने के लिये इसमें ५ दिन जोड़ते हैं (पाञ्चरात्र) या ४ वर्षों के अन्तर पर ६ दिन (षडाह) जोड़ते हैं।
(९) नाक्षत्र मान-स्थिर नक्षत्रों की तुलना में पृथ्वी का अक्ष-भ्रमण काल २३ घण्टा ५६ मिनट) नाक्षत्र दिन है। उसके हिसाब से ३० दिनों का मास, ३६० दिनों का वर्ष होता है।

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