क्यों हुआ मत्स्येन्द्रनाथजी और हनुमान जी में युद्ध

श्री मत्स्येन्द्रनाथजी शनैः-शनैः देशाटन करते तथा निज भक्तों को योग क्रियाओं का उपदेश देते हुए कतिपय प्रान्तों को पारकर बंग देश में पहुँचे और यहाँ से समुद्र के समीपवर्ती प्रान्तों में भ्रमण करते हुए कुछ दिन में जगन्नाथपुरी में आये। यहाँ श्री जगन्नाथजी के दर्शन मेले करने के अनन्तर अनेक तीर्थों के दर्शन तथा स्नान करते हुए आप कतिपय वर्षों में सेतुबन्धरामेश्वर आये और गुरुजी से प्राप्त की हुई मन्त्रात्मक सावरी विद्या का कहीं प्रयोग कर उसके विषय में दृढ़ निश्चयता प्राप्त करने के लिये किसी अनुकूल उपाय का निरीक्षण करने लगे। ठीक आपके अभिमतानुकूल कार्य करने का आपको एक सुभीता भी मिल गया और वह यह था कि श्री रामभक्त हनुमान् के साथ, जो कि कुछ काल से इसी जगह पर विराजमान थे , मिलाप हो गया। बस इसी के संसर्ग से आपने अपना कार्य सम्पादित कर उसमें निश्चता प्राप्त करना स्थिर किया। उधर आपका यह अभिप्राय हनुमान्जी से भी छिपा न रहा। अतएव मत्स्येन्द्रनाथ जी चिन्तित कार्य सम्पादना में अनुकूलता उपस्थित करने के उद्देश्य से हनुमान जी  पूछ उठे कि आप कौन है और क्या कार्य करते हैं तथा कहाँ आपका स्थान है। मत्स्येन्द्रनाथजी ने उत्तर दिया कि हम योगी है। मत्स्येन्द्रनाथ यति हमारा नाम है। योगोपदेश द्वारा निज भक्तों को इस असार संसार से पार करना ही हमारा कार्य है। स्थान किसी एक जगह पर नहीं है। समग्र संसार ही हमारा स्थान है। चाहें जिधर जायें और चाहें जहाँ रहें। यह सुन हनुमान् जी  बोल उठे कि तुम यति कैसे हो यति तो मैं हूँ। सांसारिक लोग भी मुझे ही यति कहते हैं। तुमको तो कोई भी यति नहीं कहता है। बल्कि यति कहना तो दूर रहा तुमको कोई जानता भी नहीं है। मैंने भी आज ही तुम्हारा नाम सुना तथा तुमको देखा है। ऐसी दशा में तुम्हारा अपने आपको यति बतलाकर प्रसन्न होना सर्वथा अनुचित है। मत्स्येन्द्रनाथजी ने कहा कि हम सर्व देशों में विचरते हैं अतः सब लोग हम को जानते हैं। बल्कि यही नहीं सर्व सिद्ध और विद्वज्जन भी हमको अच्छी तरह जानते हैं। हनुमान् जी ने कहा कि क्यों अतथ्य वाणी बोलते हो कि हमको सर्व सिद्ध और विद्वज्जन जानते हैं। हम पूछते हैं भला कहिय तुम्हारे में ऐसी क्या शक्ति है जिस वशात् वे लोग तुमको जानें और उनमें तुम्हारी प्रसिद्धि हो। मत्स्येन्द्रनाथजी ने उत्तर दिया कि यदि हमारी शक्ति को देखने की इच्छा है तो तुम स्वयं देख सकते हो। बस क्या था आप लोगों को तो अपने गूढाभि प्राय से सांसारिक लोगों में सावर विद्या का महत्त्व स्थापित करना था। अतएव इतना सुनते ही हनुमान जी को एकदम कृत्रिम क्रोध प्रकट हो गया और वह कहने लगे कि अच्छा अब तुम्हारी शक्ति का तुम्हारे यतित्व को देखूँगा। देखें तुम यति हो कि हम। तदनन्तर मत्स्येन्द्रनाथजी ने कहा कि अच्छा-अच्छा अवश्य ऐसा ही होना चाहिये हमारा यतित्व झूठा बनाकर हमको मिथ्या भाषी प्रमाणित करो। परन्तु यह याद रखना कि अपनी समग्र शक्ति से कार्य लेकर कुछ उठा न रखना। हनुमान ने कहा कि कुछ क्षण ठहरो अभी मालूम होता है मैं तुम्हारे यतित्व की पूजा कर डालता हूँ। इस कार्य के लिये मुझे किसी अन्य सहायक की भी आवश्यकता नहीं है। क्या तुम मेरे जगत् प्रसिद्ध सामथ्र्य को नहीं जानते हो जो एकाकीने ही विस्तृत समुद्र उल्लांघ कर समग्र लंकापुरी को भस्मसात् कर डाला था। और अशोक वाटिका को नष्ट-भ्रष्ट कर बड़े-बड़े तेजस्वी प्रभावशाली राक्षसों का हनन करते हुए श्री सीताजी की खबर लाया था। तथा जब अहिरावण लक्ष्मणजी के सहित श्री रामजी को पाताल में गया था तब समग्र युद्धकुशल राक्षसों को पराजित कर उनको निज सेना में लाया था। एवं लक्ष्मणजी के शक्ति लगी तब मैंने ही उत्तराखण्डस्थ दोनागिरि नामक पर्वत को अपने बल से उठाकर लंका में ला स्थापित किया था तथा लक्ष्मणजी का प्राण बचाया था। इतना कहकर हनुमान ऊपर नीचे कूदने तथा घोर शुद्ध करने लगा। यह सुन और देख मत्स्येन्द्रनाथजी ने कहा कि अये हनुमन् तू बड़ा ही चंचल है। तेरी इस चंचलता से और किसी की नहीं तेरी ही हानि होगी। अब तो हनुमान् जी विस्तृत और भयंकर रूप धारणकर विविध स्वर से चिल्लाने लगे  तथा अधिकाधिक तुफान करते  हुए शान्त न होकर पर्वत की ओर चले । वहाँ जाते ही एक भारमय पत्थर उठाकर उन्होंने  मत्स्येन्द्रनाथजी की ओर फेंका। परन्तु उन्हों के न लगकर वह उनके समीप में गिर पड़ा। यह देख हनुमानजी  ने शीघ्रता से गदा उठाई जिससे मत्स्येन्द्रनाथजी के ऊपर प्रहार किया, दुर्भाग्य वह भी व्यर्थ हुई। और उसके हस्त से छुट कर पृथ्वी  पर गिर पड़ी। इसी अवसर पर मत्स्येन्द्रनाथजी ने कहा कि अये चंचल तू शान्त हो जाय हमारे सम्मुख तेरा प्रयत्न सफल न होगा। कारण कि हम नाथ हैं और तू दास है। अतः हमारा तेरा युद्ध भी प्रशंसनीय नहीं है। बल्कि आज पर्यन्त कहीं भी स्वामी सेवक का युद्ध नहीं देखा तथा सुना गया है।

पाठक ध्यान रखिये दोनों महानुभावों का युद्ध कोई द्वेष मूलक नहीं किन्तु संसार में सावर विद्या का महत्त्व प्रकट करने के प्रयोजन से ही था। तथापि यह देखने में आता है कहीं-कहीं बातों का बताकड़ा भी बन जाया करता है। अतएव बातों-बातों में मत्स्येन्द्रनाथजी के मुख से निकल जाने वाले कटु वाक्यों को सुनकर कुछ सच्चे क्रोध का आश्रय लेते  हुए हनुमान् जी  आग्नेयास्त्र का सन्धान कर उसका प्रयोग करने के लिये उद्यत हुए । जिसके उठाने मात्र से ही चारो तरफ अग्नि प्रकट हो गई। अग्नि के प्रज्वलित होने से अनेक पशु-पक्षी व्याकुल हो उठे। यह देख मत्स्येन्द्रनाथ जी ने अपनी झोली से एक चुकटी विभूति निकाल कर उसे वार्षिक मन्त्र के साथ प्रक्षिप्त किया। जिसके अमोघ स्वभाव से जल धारा पड़ने लगी। जिससे तत्काल ही आग्नेयास्त्र का तेज हत हो गया। और सभी पशु-पक्षी फिर आनन्दालाप करने लगे। इससे हनुमान् जी अतीव निराश हुए आभ्यन्तरिक रीति से बड़ा ही विस्मित हुए । अन्ततः सचेत हो कर अनेक वृक्ष पत्थर उखाड-उखाड मत्स्येन्द्रनाथजी के ऊपर फैंकता हुए  मौलिनामक पर्वत के समीप पहुँचे  तथा उसको उठाकर मत्स्येन्द्रनाथजी के ऊपर छोड़ना ही चाहते थे | ठीक उसी समय उन्होंने ऊपर को दृष्टि करी। तथा एक हस्त ऊपर को उठाकर कहा कि बस वहीं ठहर जाय। तब तो वह वहीं रूक गया और उसमें से फूट-फूट कर पत्थर नीचे गिरने लगे।

अन्त में वह मौलिनामक पर्वत हनुमान् जी के हस्तों से छुटकर सिर पर आ गया। ऐसा होने के साथ-साथ ही मत्स्येन्द्रनाथजी के मन्त्र वशात् हनुमान् जी  की सब शक्ति जाती रही। अतएव वह चलने पकडने, हिलने, आगे और पीछे पैर उठाने में असमर्थ हुए  एवं विचार करने लगे कि अब क्या करना चाहिये। मेरे तो पर्वत के भार से प्राण पक्षी हुए जा रहे हैं। यदि यह दुःख शीघ्र निवारित न हुआ तो मेरी अवश्य भयंकर दशा होगी, (अस्तु) उधर इतने ही कृत्य से मत्स्येन्द्रनाथजी सन्तुष्ट न हुए थे। उन्होंने इस अवसर पर स्वयं भी आग्नेयास्त्र का प्रयोग कर दिया जिससे पर्वत अत्यन्त तप्त हो उठा। तब तो अग्नि से दंदह्यमान हनुमान् जी ने बड़ी शीघ्रता के साथ अपने पिता वायु को स्मरण किया। तत्काल ही वायु ने ध्यान धर देखा कि आज अकस्मात् यह क्या हुआ। मेरा पुत्र हनुमान् कोई साधारण व्यक्ति नहीं है जो सहज ही किसी से तिरस्कृत हो जाय अथवा जो भी कुछ हो उस के समीप जा कर ही देखना उचित है। तदनु वायुदेव शीघ्र ही प्रकट हुए। उनका हनुमान् तथा मत्स्येन्द्रनाथजी के ऊपर दृष्टिपात हुआ।

 

यह देखते ही उन्होंने अपने हनुमान जी  से कहा कि अये पुत्र तूने अति अज्ञान का कार्य किया है। क्या तू नहीं जानता था कि ये मत्स्येन्द्रनाथजी पूर्ण पुरुष कवि नारायण के अवतारी है। यह सुनकर भी हनुमान् जी तो न बोले पर फिर वायुदेव ने मत्स्येन्द्रनाथजी के समीप आकर कुछ सत्कारमय वाक्यों द्वारा उनको सन्तुष्ट बनाने का प्रयत्न किया। तथा कहा कि मैं आपकी शक्तिशालिता को अच्छी तरह जानता हूँ। हनुमान् उससे अनभिज्ञ थे  जिसने आपके साथ द्वेषता जैसा व्यवहार किया। अतएव अब आप कृपया दास पर क्षमा प्रदान करें। उसकी इस विनम्र अभ्यर्थना के साथ-साथ विनम्र हुए मत्स्येन्द्रनाथजी ने फिर अपनी झोली से भस्मी निकाली और उसे प्रावृषेण्य मन्त्र के साथ मौलि पर्वत की ओर फैंक दिया। जिससे प्रज्वलित हुआ पर्वत शीघ्र शीतल हो गया और हनुमान् जी के सिर से उतर कर जहाँ पहले था वहीं जा स्थिर हुआ। इसके बाद कुछ विभूति और भी निकालकर मत्स्येन्द्रनाथजी ने उसको शक्ति संचारक मन्त्र के सहित प्रक्षिप्त किया जिससे हनुमान जी  पूर्ववत् शक्तिमान हो गये । यह देख कुछ मुस्कराते  हुए  हनुमान जी  मत्स्येन्द्रनाथजी के समीप आये  और विविध प्रकार से उनकी स्तुति करते  हुआ बार-बार धन्यवाद देने लगे । तथा अज्ञानता से निकल जाने वाले अनुचित वाक्यों के विषय में क्षमा प्रार्थना करने लगे । इस पर मत्स्येन्द्रनाथजी ने कृतज्ञता प्रकट की और कहा कि अये हनुमन् मुझे विश्वास है जो अपना अभिप्राय है उससे तुम विचलित न हुए होंगे। यह सुन मुस्कराकर हनुमान जी ने  नहीं-नहीं कहा। तदनु फिर वायु ने हनुमान जी  की और इशारा करते हुए कहा हे हनुमन तुम ऐसे महात्मा से फिर कभी विरोध नहीं करना। इन की जितनी शक्ति और विद्या इन्द्र को भी प्राप्त नहीं है। फिर हमारी तुम्हारी तो बात ही क्या है, ये चाहें तो सबको वश में कर सकते हैं। परं स्वयं किसी के वश में नहीं हो सकते हैं। हां नम्रतायुक्त पुरुष भक्ति से अवश्य इनको भी वश में कर सकता है अन्यथा नहीं। यह सुनकर हनुमान जी ने कहा कि अच्छा जो हुआ सो तो हो गया। जो फिर वापिस नहीं आता है परं इस निमित्त एक पूर्ण शक्ति कवि नारायण के दर्शन तो हुए यह भी ईश्वर की महती कृपा ही समझनी चाहिये। मत्स्येन्द्रनाथजी अब आप पूर्ण शान्त हो जायें। और मेरा यह शक्ति अस्त्र जिसको मैं आपके समर्पण करना चाहता हूँ ग्रहण कर लें। मत्येन्द्रनाथजी ने कहा कि मन्त्रात्मक एक सावरी विद्यारूप अस्त्र मेरे समीप इतना शक्तिशाली है जिसके सम्मुख अन्य किसी भी अस्त्र- शस्त्र की कुछ पेश नहीं जाती है। फिर तुम्हारे शक्ति शस्त्र से हमारा कौन कार्य साध्य हो सकता है।

हनुमान् जी ने कहा कि यह ठीक है आपका जो महत्त्व है वह अब छिपा नहीं रहा है उसको हम अच्छी तरह समझ गये हैं। बल्कि इसी हेतु से हम अपने कृत्य पर खेद प्रकट करते हुए एक उपहार स्वरूप से यह शक्ति शस्त्रप्रदान करते हैं।

इत्यादि प्रकार से होने वाले उसके विशेष आग्रहानुरोध से मत्स्येन्द्रनाथजी ने शक्ति को अपना लिया। और देशान्तर पर्यटन के लिये वहाँ से प्रस्थान किया।

 

चेतना त्यागी ( सहसंपादक )

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