क्यों है मंत्र की आवश्यकता 

हमारे धर्मशास्त्रों में बताया गया है कि कोई भी आध्यात्मिक (धार्मिक) कार्यअथवा अनुष्ठान बिना किसी देवता को साक्षी बनाये तथा बिना किसी मंत्र काआश्रय लिए पूर्ण नहीं हो सकता है। जन्म से मृत्युपर्यन्त जितने भी कर्म-संस्कारतथा धार्मिक अनुष्ठानादि किए जाते हैं वे सभी किसी न किसी मंत्र का आश्रयलेकर ही पूर्ण हो सकते हैं क्योंकि उस मंत्र का अधिष्ठाता देव-देवी ही हमारे सकाम अथवा निष्काम कर्मों का सुफल प्रदान करते हैं। जिस प्रकार अष्टांग योग की कियाऐं (अभ्यास)  तथा औषधियों का सेवन प्रत्यक्षरूप से फलप्रद होता है उसी प्रकार मंत्र की शक्ति भी प्रत्यक्ष फलदाई होती है। शर्त यही है कि वह मंत्र किसी ग्रन्थ से नकल किया हुआ न होकर सिद्ध गुरू से प्राप्त हुआ होना चाहिए। जो व्यक्ति पुस्तकों से प्राप्त मंत्रों का जप करते हैं उन्हें कोई लाभ नहीं हो सकता है वरन् पग-पग पर शारीरिक एवं मानसिक ब्याधियों का शिकार होना पड़ता है :-

 

”पुस्तके लिखितो मंत्रो-येन सुन्दरि ! जप्यते

न तस्य जायते सिद्धि-हानिरेव पदे पदे”

(चामुन्डा तंत्र)

 

”पुस्तके लिखिता मंत्रान्-विलोक्य प्रजपन्ति ये

ब्रह्महत्या समं तेषां-पातकं परिकीर्तितम्”

 

(जो व्यक्ति पुस्तकों से प्राप्त मंत्र जपते हैं उन्हें ब्रह्महत्या के समान पाप का भागी होना पड़ता है।)

 

।।  मंत्र का अभिप्राय ।।

 

विभन्न मंत्रशास्त्रों में मंत्र को अनेक प्रकार परिभाषित किया गया है :-

”मननाद् विश्वविज्ञानं-त्रांणसंसार बन्धनात्

त्रायते सतंत चैव तस्मांन्मत्र इतीरित%”

 

(जिसका मनन करने से समस्त ब्रह्मान्ड का ज्ञान हो जाता है, साधक सांसारिक बन्धन से छूट जाता है तथा जो रोग-शोक, भय, दु:ख एवं मृत्यु से सदैव रक्षा करता है उसको ही मंत्र कहते हैं।)

”मनना प्राणनां चैव-मद्रूपस्याव बोधनात्

त्रायते सर्वभयत:-तस्मान्मंत्र इतीरित।।”

 

(जो साधक की सभी भयों से रक्षा करता है तथा जिसका चिन्तन-मनन करने सेआत्मतत्व-शिवरूप का बोध हो जाता है उसी को मंत्र कहते हैं।)

भगवान शंकर मॉं पार्वती को बताते हैं कि मंत्र तथा मंत्रार्थ को समझने वालासाधक समस्त सिद्धियों का स्वामी ही नहीं वरन् ईश्वरत्व प्राप्त करके जीवन्मुक्त होजाता है। अत: साधक को सदैव मंत्र-जप में तत्पर रहना चाहिए।

बीज तथा मंत्र की महिमा का यशोगान करते हुए भगवान शंकर मॉं पार्वती सेकहते हैं:-

 

”सर्वेषामेव देवांना-मंत्र माद्य शरीरकम्

 

ध्यानेन दर्शनं दत्वा-पुनर्मंत्रेषु  लीयते”

 

¿बीज तथा मंत्र ही देवता का प्रथमरूप (आदिशरीर) है। बीज-मंत्र के जप सेसम्बन्धित देवता प्रकट होकर साधक को दर्शन देते हैं और पुन: उसी बीज-मंत्र मेंसमा जाते हैं।

 

।। मंत्रों के विभिन्न दोष तथा उनका संस्कार (शुद्धिकरण) ।।

 

प्रमुंख आगम-ग्रन्थ ‘प्राणतोषिणी तंत्र’ में मंत्रो के विभिन्न दोषों तथा उन दोषों से मंत्र को शुद्ध (दोषमुक्त) करने के उपायों (संस्कारों) का विस्तार से विवरण दिया गया है। दोषयुक्त मंत्र उसे कहते हैं जो –

”बहुकूटाक्षरो मुग्धो-बद्ध: क्रुद्धश्च भेदित:

निस्नेहो विकल: स्तब्धो-निर्जीव: खन्डतारिक: ”

 

(बहुत कूटाक्षर वाला, मुग्ध, बद्ध, क्रुद्ध, भेदित, कुमार, युवा, बृद्ध गर्वित,स्तम्भितः, मूर्छित, खन्डित, बधिर, अन्ध, अचेतन, क्षुघित, दुष्ट, पीडि़त, निस्नेह,विकल, स्तब्ध, निर्जीव तथा खण्डतारिक मंत्र दोषपूर्ण होता है।)

 

मंत्र के अन्य दोष इस प्रकार है :-

 

”सुप्त: तिरस्कृतो लीढ,-मलिनश्च दुरासद:

जड़ो रिपु उदासीनो-लज्जितो मोहित प्रिये”

 

(भगवान शिव कहते हैं कि जो मंत्र सुप्त, तिरस्कृत, लीढ, मलिन, दुरासद, निसत्व, निर्दयी, दुग्ध, भयंकर, शप्त, रूक्ष, जड़, शत्रु, उदासीन, लज्जित तथा मोहित होते हैं वे भी दोषपूर्ण होते हैं)

भगवान शिव द्वारा उपरोक्त प्रकार बताए गए दोषपूर्ण मंत्रोको जप आरम्भ करनेसे पहले शुद्ध करना आवश्यक होता है। इसी मंत्र-शुद्धिकरण को ही मंत्रो कासंस्कार कहते हैं। दोषयुक्त मंत्र का करोड़ों संख्या में जप करने से भी मंत्र-सिद्धिनहीं हो सकती है। तंत्र-शास्त्रों में मंत्र-शुद्धिकरण के लिए 10-संस्कारों काउल्लेख मिलता है। यथा –

”जनंन जीवनं पश्चात्-ताड़ंन बोधनं तथा

 

तर्पणं दीपंन गुप्ति-संस्कारा कुल नायिके”

 

(दोषयुक्त मंत्र को शुद्ध करने के लिए जो 10संस्कार किए जाते हैं उनके नाम हैंजनन, जीवन, ताड़न, बोधन, अभिषेक, विमलीकरण, आप्यायन, तर्पण, दीपन,गुप्ति।)

शास्त्र बताते हैं कि जिस प्रकार अस्त्र-शस्त्रों पर धार लगाकर उन्हें तेज तथाधारदार बनाया जाता है उसी प्रकार मंत्र के 10संस्कार करके उसे भीप्रभावशाली, सिद्धिप्रद तथा चैतन्य बना दिया जाता है। प्रसिद्ध तंत्र ग्रन्थ ‘मंत्रमहोदधि’ तथा ‘शारदा तिलक तंत्र’ में मंत्र के 10-संस्कारों को सम्पादित करने केलिए जप की विधियां बताई गई है। सामान्य रूप से मंत्र संस्कारों की प्रचलितविधियों का संक्षिप्त विवरण दिया जा रहा है।

 

(1) जनन :- केशर, चन्दन अथवा भस्म से बनाए गए मातृकायंत्र से मंत्र-वर्णों का पर्याय क्रम से उद्धार करना।

 

(2) जीवन :- सभी मंत्र वर्णों को पंक्तिक्रम से प्रणव से सम्पुटित करके 100 बार जपना ।

 

(3) ताडन :- मंत्र के वर्णों को भोजपत्र पर लिखकर प्रत्येक वर्ण को चन्दन, जल तथा वायुबीज से 100-बार ताडि़त करना।

 

(4) बोधन :- उक्तानुसार मंत्र वर्णों को लिखकर मंत्र के वर्ण संख्या के बराबर कनेर पुष्पों से अग्निबीज से हनन करना।

 

(5) अभिषेक :- कुशमूल से भोजपत्र पर मंत्र को लिखकर मंत्र वर्णों की संख्या के बराबर पीपल के पत्तों से सिंचन करना।

 

(6) विमलीकरण :- सुषुम्ना के मूल तथा मध्य में मंत्र का ध्यान करके ज्योतिमंत्र से जलाना।

 

(7) आप्यायन :- भोजपत्र पर लिखे मंत्र को ज्योतिमंत्र का 108-जप करके अभिमंत्रित करना।

 

(8) तर्पण :- उक्तानुसार मंत्र लिखकर मंत्र की वर्ण संख्या में ज्योतिमंत्र से मधु से तर्पण करना।

 

(9) दीपन :- अपने मूलमंत्र को प्रणव माया तथा लक्ष्मी बीज से सम्पुटित करके 108 बार जपना।

 

(10) गोपन :- अपने मंत्र को गुप्त रखना तथा मंत्र जपते हुए अपने मन तथा प्राण का सुषुम्ना में लय करना।

 

जिस प्रकार सद्गुरू से प्राप्त मंत्र अत्यन्त गोपनीय होता है उसी प्रकार मंत्र के 10-संस्कारों को भी गोपनीय तथा केवल गुरूमुख से ज्ञातव्य रखा गया है।

डॉ. दीनदयाल मणि त्रिपाठी 

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