गङ्गा के विविध रूप

श्री अरुण कुमार उपाध्याय (धर्मज्ञ)

१. आकाशगङ्गा-ब्रह्माण्डं खण्डयन्तीं हर शिरसि जटावल्लिमुल्लासयन्ती,
स्वर्लोकादापतन्ती कनकगिरिगुहागण्डशैलात्स्खलन्ती।
क्षोणीपृष्ठे लुठन्ती दुरितचयचमूर्निर्भरं भर्त्सयन्ती,
पाथोधिं पूरयन्ती सुरनगरसरित् पावनी नः पुनातु॥
(शङ्कराचार्य)
= ब्रह्माण्ड को फोड़ कर निकलनेवाली, महादेव जी की जटा-लता को उल्लसित करती हुई, स्वर्गलोक से गिरती हुई, सुमेरु की गुफा और पर्वतमाला से झरती हुई, पृथ्वी पर लोटती हुई, पापसमूह की सेना को कड़ी फटकार देती हुई, समुद्र को भरती हुई, देवपुरी की पवित्र नदी गङ्गा हमें पवित्र करे।

गङ्गा-लगातार गतिशील होने के अर्थ में गंगा नदी है-गम्लृ (गं) गतौ-धातुपाठ, १/७०९, गं धातु का २ बार प्रयोग। लिंग पुराण (१/५२/१२) में व्युत्पत्ति है-गं = अम्बर से गता या आयी। वराह पुराण, अध्याय ८२ में भी यही है-गां गता गंगेत्युच्यते। वामन पुराण (१२५/२३) के अनुसार हिमालय शिखर से मन्दाकिनी निकल कर गां = भूमि की तरफ जाती है इसलिये गंगा है-हिमवच्छिखरान् मुक्ता नाम्ना मन्दाकिनी नदी। गां गता सा भवेद् गंगा मायैषा मम कीर्तिता॥

गं = गै शब्दे (धातु पाठ, १/६५३)-गायन। शब्द आकाश का गुण है, अतः गं (गगन) = आकाश।
गां = आकाश में गतिशील आधार, पृथ्वी, वाणी, गौ। फिनलैण्ड में भी गंगा का अर्थ है चलना।

आकाश में गति का आरम्भ आकाशगंगा से होता है। पूर्ण अनन्त विश्व ब्रह्म या स्वायम्भुव मण्डल है। उसका एक अण्ड ब्रह्माण्ड है जिसके निर्माण की सामग्री को आण्ड कहा गया है। इसका निर्माण कूर्म चक्र में होता है, वह काम करता है, अतः कूर्म है। अभी यह आभा-मण्डल रूप में दीखता है, अतः इसे ब्रह्मवैवर्त्त पुराण में गोलोक कहा गया है। सबसे बड़ी रचना या ईंट होने के कारण यह परमेष्ठी मण्डल है या परम गुहा है। इसके भीतर घूमने वाला चक्र आकाशगंगा है। आकाशगंगा की सर्पाकार भुजा अहिर्बुध्न्य है जिसे पुराण में शेषनाग कहा गया है। इस भुजा में जहां सूर्य स्थित है, वहां भुजा की मोटाई के बराबर गोल महर्लोक है जिसका आकार ४३ अहर्गण अर्थात् पृथ्वी व्यास का २ घात ४० गुणा है। इसमें प्रायः १००० तारा हैं जिनको पुराण में शेष के १००० सिर कहा गया है। इनमें एक सिर हमारा सूर्य है, जिसके क्षेत्र में पृथ्वी सूक्ष्म विन्दु मात्र है।

विश्व का निर्माण अग्नि-सोम के मिलन से हुआ है। सोम = फैला हुआ पदार्थ या ऊर्जा। अग्नि = सीमाबद्ध पदार्थ या ऊर्जा। ब्रह्माण्ड के बाहरी क्षेत्र तक पवमान सोम है जो बहुत विरल है। इसके भीतर घूमने वाले चक्र में सोम का प्रवाह हो रहा है जो सोमधारा या आकाश गंगा है। आधुनिक विज्ञान में २ सर्पाकार भुजायें कहीं जाती हैं। इनके खण्डों को मिला कर आकाशगंगा की ७ धारायें कही गयीं हैं। या यह आकाश गंगा के केन्द्र से ब्रह्माण्ड सीमा तक सोमधारा की गति के ७ क्षेत्र किये गये हैं, जो ७ मरुत् हैं। इनके पुनः ७-७ विभाजन से ४९ मरुत् ब्रह्माण्ड की बाहरी सीमा तक हैं। इसी के अनुरूप पृथ्वी के भी स्वर्ग लोक हिमालय से ७ दिशाओं में ७ गंगा का वर्णन है। यह ब्रह्मणस्पति (ब्रह्माण्ड का) सोम हुआ। सौर मण्डल के भीतर सबसे बड़ा ग्रह बृहत् होने से बृहस्पति कहते हैं। इसके बृहस्पति सोम में पदार्थ अधिक मिला है अतः कम पवित्र है। यहां से पवमान आरम्भ होता है, ब्रह्माण्ड की सीमा तक पवित्र हो जाता है। पृथ्वी के गुरुत्व क्षेत्र में केवल सोम है, अतः इसमें स्थित चन्द्र भी सोम है।
हमारे लिये सूर्य कर्ता रूप विष्णु का प्रत्यक्ष रूप है, अतः इसे सविता कहते हैं। यह २ धामों के मध्य में है।

सौरमण्डल मर्त्य या कृतक धाम है जिसका केन्द्र सूर्य है। बाहरी धाम अमृत या अकृतक है जिसका एक कण मात्र सूर्य है। सूर्य के क्षेत्र में विष्णु के ३ पद हैं जिनको ताप-तेज-प्रकाश या अग्नि–वायु-रवि क्षेत्र कहते है। जहां तक सूर्य विन्दुमात्र दृश्य है वह सूर्यों का समूह ब्रह्माण्ड या विष्णु का परम पद है। उस परम पद से ही आकाश गंगा निकली है जो ब्रह्माण्ड के क (अप्) मण्डल में है।
सन्दर्भ- (क) स्वयम्भू-ब्रह्मा वै स्वयम्भूः -तपोऽतप्यत । तदैक्षत -न वै तपस्यानन्त्यमस्ति । हन्त ? भूतेष्वात्मानं जुहुवानि, भूतानि चात्मनि-इति । तत्सर्वेषु भूतेषु आत्मानं हुत्वा भूतानि चात्मनि (हुत्वा)- सर्वेषां भूतानां श्रैष्ठ्यं स्वाराज्यं आधिपत्यं पर्य्येत्। (शतपथ ब्राह्मण १३/७/१/१)
(ख) ब्रह्माण्ड और आण्ड-सोऽयंपुरुषः प्रजापतिरकामयत-भूयान्त्स्यां, प्रजायेय-इति। सोऽश्राम्यत्, स तपोऽतप्यत। स श्रान्तस्तेपानो ब्रह्मैव प्रथममसृजत-त्रयीमेव विद्याम्। सैवास्मै प्रतिष्ठाभवत्। तस्मादाहुः-ब्रह्म (स्वयम्भूः) अस्य सर्वस्य प्रतिष्ठा-इति। (शतपथ ब्राह्मण, ६१/१/८)
तस्यां प्रतिष्ठायां प्रतिष्ठितोऽतप्यत। सोऽपोऽसृजत वाच एव लोकात्। वागेवास्य साऽसृज्यत। सेदं सर्वमाप्नोत्-यदिदं किञ्च। यदाप्नोत्-तस्मादापः। यदवृणोत्, तस्माद् वाः (वारिः)। सोऽकामयत-आभ्योऽद्भ्योऽधिप्रजायेय-इति। सोऽनया त्रय्या विद्यया सह अपः प्राविशत्। तत आण्डं समवर्त्तत। तमभ्यमृशत्-अस्तु-इति। भूयोऽस्तु, इत्येव तदब्रवीत्। (शतपथ ब्राह्मण, ६/१/१/९)
(ग) कूर्म, गोलोक-तां पृथिवीं (परमेष्ठी) संक्लिश्याप्सु प्राविध्यत् तस्यै यः पराङ् रसोऽत्यक्षरत्-स कूर्मोऽभवत् । (शतपथ ब्राह्मण ६/१/१/१२)
स यत् कूर्मो नाम-एतद्वै रूपं कृत्वा प्रजापतिः प्रजा असृजत । यदसृजत-अकरोत्-तत् । यदकरोत्-तस्मात् कूर्मः। कश्यपो वै कूर्मः । तस्मादाहुः-सर्वाः प्रजाः काश्यप्यः-इति । (शतपथ ब्राह्मण ७/५/१/५)
मानेन तस्य कूर्मस्य कथयामि प्रयत्नतः।
शङ्कोः शत सहस्राणि योजनानि वपुः स्थितम् ॥ (नरपति जयचर्या, स्वरोदय, कूर्मचक्र)
ब्रह्मवैवर्तपुराण, प्रकृतिखण्ड, अध्याय३-अथाण्डं तु जले ऽतिष्ट द्याव द्वै ब्रह्मणो वयः॥१॥
तन्मध्ये शिशुरेकश्च शतकोटि रवि-प्रभः॥२॥ स्थूलात् स्थूलतमः सोऽपि नाम्ना देवो महाविराट्॥४॥
तत ऊर्ध्वे च वैकुण्ठो ब्रह्माण्डाद् बहिरेव सः॥९॥
(घ) परमगुहा, ऋत या सोम- ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे।
छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति पञ्चाग्नयो ये च त्रिणाचिकेताः ॥ (कठोपनिषद् १/३/१)
(ङ) ताप, तेज, प्रकाश क्षेत्र- शत योजने ह वा एष (आदित्यः) इतस्तपति । (कौषीतकि ब्राह्मण ८/३)
सहस्रं हैत आदित्यस्य रश्मयः। (जैमिनीय ब्राह्मण उपनिषद् १/४४/५)
भूमेर्योजन लक्षे तु सौरं मैत्रेय मण्डलम्। (विष्णु पुराण २/७/५)
(च) ३ पद, परम पद- इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम्। (ऋक् १/२२/१७)
तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः। (ऋक् १/२२/२०)
कल्पोक्त चन्द्रभगणा गुणिताः शशिकक्षया। आकाशकक्षा सा ज्ञेया करव्याप्तिस्तथा रवेः॥८१॥
ख व्योम ख-त्रय ख-सागर षट्क नाग व्योमाष्ट शून्य यम-रूप नगाष्ट चन्द्राः।
ब्रह्माण्ड सम्पुटपरिभ्रमणं समन्तादभ्यन्तरा दिनकरस्य कर प्रसाराः॥ (सूर्य सिद्धान्त १२/८१, ९०)
(छ) मर्त्य-अमृत का मध्य-आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च। हिरण्ययेन सविता रथेन देवो याति भुवनानि पश्यन्॥ (ऋक्, १/३५/२)
त्रैलोक्यमेतत् कृतकं मैत्रेय परिपठ्यते। जनस्तपस्तथा सत्यमिति चाकृतकं त्रयम्॥१९॥
कृतकाकृतकयोर्मध्ये महर्लोक इति स्मृतः। (विष्णु पुराण्, २/७/१९)
(ज) पवमान सोम के बहुत से सूक्त हैं-जैसे ऋग्वेद मण्डल ९ के सभी ११४ सूक्त।
तृतीयम् धाम महिषः सिषासन् सोमः विराजम् अनुराजति ष्टुप् (ऋक्, ९/९६/१८)-तृतीय धाम का सोम
अथो नक्षत्राणामेषामुपस्थे सोम आहितः। (ऋक्, १०/८५/२)-यह नक्षत्रों के ऊपर है। पुराणों में इस सोम को चन्द्र सोम मानने से भ्रम हुआ है।
सोमस्य धारा पवते (ऋक्, ९/८०/१)
अयम् विश्वानि तिष्थति पुनानः भुवना उपरि। सोमः देवः न सूर्य्यः। (ऋक्, ९/५४/३)
सहस्र धारा-राजा सिन्ध्य़्नां पवते दिवः ऋतस्य याति पथिभिः। (ऋक्, ९/८६/३३)
सहस्रधारः शतवाज इन्दुः (ऋक्, ९/११०/१०)
आकाश के उच्च भाग का आधार-दिवः विष्टम्भः उत्तमः (ऋक्, ९/१०८/१६)
पूर्ण लोक की माप-विमानो रजसः (ऋक्, ९/६२/१४)
प्रो स्य वह्निः पथ्याभिरस्यान् दिवो न वृष्तिः पवमानो अक्षाः।
सहस्रधारो असदन्न्यस्मे मातुरुपस्थे वन आ च सोमः॥ (ऋक्, ९/८९/१)
पवित्रं ते विततं ब्रह्मणस्पते प्रभुर्गात्राणि पर्येषि विश्वतः।
अतप्त तनूर्न तदामो अश्नुते शृतास इद्वहन्तस्तत् समाशत। (ऋक्, ९/८३/१)
तपोष्पवित्रं विततं दिवस्पते शोचन्तो अस्य तनयो व्यस्थिरन्।
अवन्त्यस्य पवीतारमुशाषवो दिवस्पृष्टमधितिष्ठन्तु चेतसा॥ (ऋक्, ९/८३/२)
सहस्रधारा के ७ भाग-सप्त प्रवत आ दिवम् (ऋक्, ९/५४/२)
२. पृथ्वी पर गंगा-आकाश की तरह पृथ्वी के स्वर्ग हिमाल से गंगा की ७ धारायें हैं, जो एशिया महादेश में सभी दिशाओं में फैली हैं।
ब्रह्माण्ड पुराण (१/२/१८)-ततो विसृज्यमानायाः स्रोतस्तत् सप्तधा गतम्। तिस्रः प्राचीमभिमुखं प्रतीचीं तिस्र एव तु॥३९॥
नद्याः स्रोतस्तु गंगायाः प्रत्यपद्यत सप्तधा। नलिनी ह्लादिनी चैव पावनी चैव प्राच्यगाः॥४०॥
सीता चक्षुश्च सिन्धुश्च प्रतीचीं दिशमास्थिताः। सप्तमी त्वन्वगात्तासां दक्षिणेन भगीरथम्॥४१॥
कूर्म पुराण, अध्याय ४६ के अनुसार-
विष्णु पादाद् विनिष्क्रान्ता प्लावयित्वेन्दु मण्डलम्। समन्ताद् ब्रह्मणः पुर्या गंगा पतति वै ततः॥२८॥
सा तत्र पतिता दिक्षु चतुर्द्धा ह्यभवद् द्विजाः। सीता चालकनन्दा च सुचक्षुर्भद्र नामिका॥२९॥
पूर्वेण शैलाच्छैलं तु सीता यात्यन्तरिक्षगा। ततश्च पूर्व वर्षेण भद्राश्वाद्याति चार्णवम्॥३०॥
तथैवालकनन्दा च दक्षिणादेत्य भारतम्। प्रयाति सागरं भित्त्वा सप्त भेदा द्विजोत्तमाः॥३१॥
सुचक्षुः पश्चिम गिरीनतीत्य सकलांस्तथा। पश्चिमं केतुमालाख्यं वर्षं गत्वेति चार्णवम्॥३२॥
भद्रा तथोत्तर गिरीनुत्तरांश्च तथा कुरून्। अतीत्य चोत्तराम्भोधिं समभ्येति महर्षयः॥३३॥
आनील-निषधायामौ माल्यवद् गन्धमादनै। तयोर्मध्यं गतो मेरुः कर्णिकाकार संस्थिता ॥३४॥

इन वर्णनों के आधार पर पं. मधुसूदन ओझा के जगद्गुरु वैभवम् (७/३५-३८) में इनके आधुनिक नाम दिये हैं। प्राङ्मेरु (पूर्व दिशा का मेरु) पर ब्रह्मा की मनोवती पुरी थी, जिस पर ८ लोकपालों की सभा थी (वराह पुराण, अध्याय ७५)। इसे पुष्कर (आज का बुखारा) कहा गया है जो उज्जैन से १२ अंश पश्चिम था। वेदाङ्ग ज्योतिष में यहीं के सन्दर्भ से कहा गया है कि दिन का अधिकतम मान १६ घण्टा है अर्थात् ३५ अंश उत्तर अक्षांश पर है। इसके ४ दिशाओं से ४ बड़ी नदियां निकलीं जो ७ धाराओं में विभक्त हो गयी। उत्तर दिशा में भद्रा निकली (वायु पुराण, ४२/६४ के अनुसार भद्रसोमा) जो उत्तर कुरु (ओम्स्क) के पास नील, निषध, माल्यवान्, गन्धमादन पर्वतों को घेरती हुयी उत्तर समुद्र में मिलती है। आज कल इनको ओबी, येनेसी, लीना कहते हैं। पूर्व दिशा में सीता निकलती है जिसकी ३ धारायें हैं-नलिनी, ह्लादिनी, प्लाविनी। ये ३ स्थानों पर भद्राश्व के समुद्र में मिलती हैं। अभी इनके नाम हैं-यांगसे, ह्वांगहो (महागंगा-चीन महः लोक है), माखोंग (मा गंगा, मेकांग)। पश्चिम में सिन्धु, चक्षु, सीता है। इनको ऋक् (७/१८/६) में यक्षु कहा है। इसी सूक्त में काशी राजा सुदास का पश्चिम में अभियान के प्रसंग में यक्षु, सिन्धु, यमुना, परुष्णी नदियों, मत्स्य राज्य के उल्लेख हैं। यक्षु से ऑक्सस या जम्बू से आमू दरिया हुआ है। यह पश्चिम समुद्र कैस्पियन झील में गिरती हैं। सिन्धु नदी अरब सागर में गिरती है।

(ग) ब्रह्मा का कमण्डल-भारत विश्व का हृदय है और हृदय का चिह्न भी दक्षिणी भारत के त्रिकोण पर हिमालय का अर्ध चन्द्र लगाने से बनता है। उत्तरी गोलार्ध में हिमयुग के चक्रों से भारत हिमालय के कारण बचा रह अतः यहां सनातन सभ्यता बनी रही। इस अर्थ में इसे अज-नाभ वर्ष कहते थे। भारत अज (अजन्मा) या अजर-अमर सनातन है। अज = विष्णु भी होता है। उसका नाभि कमल मणिपुर है, शरीर में नाभि के पास मणिपूर चक्र है। विष्णु के नाभि कमल से ब्रह्मा की उत्पत्ति हुई। सूर्य रूपी विष्णु सौर मण्डल का केन्द्र या नाभि है। उसमें पृथ्वी को ही पद्म कहा है। इस पर मनुष्य या मर्त्य ब्रह्मा हुए। ब्रह्माण्ड महा विष्णु है, इस की नाभि के आकर्षण में पूरा ब्रह्माण्ड कमल की तरह विकसित है। पृथ्वी पर मणिपुर से सटा ब्रह्म देश है जिसे अब म्याम्मार (महा-अमर) कहते हैं। ब्रह्म देश तथा भारत के बीच गंगा सागर (अभी बंगाल की खाड़ी) ही ब्रह्मा का कमण्डल है जिसमें गंगा मिलती है। क-मण्डल को ही कर-मण्डल (भारत का पूर्व तट) भी कहते हैं।

(घ) अन्य स्थानों की गङ्गा-पातालगंगा बिजनौर, ओड़िशा के नवापाडा, श्रीशैलम, महाराष्ट्र में मथेरन के निकट, उत्तराखण्ड में जोशीमठ के निकट हैं। वेन गंगा पाकिस्तान में सरहिन्द तथा सिन्ध के बीच है। एक अन्य वेन गंगा मध्य प्रदेश के सिवनी में महादेव पर्वत से निकलती है। गंगा स्रोत के निकट धौलीगंगा है, तथा गंगा के पर्यायवाची नाम की मन्दाकिनी, अलकनन्दा आदि हैं। नील गंगा उत्तराखण्ड के चमोली में है।

श्रीलंका में भी ४ नदियों का नाम गंगा है-कालू गंगा, वादवे गंगा, माणिक गंगा, महावेलि गंगा।
शकद्वीप की गङ्गा-मत्स्य पुराण, अध्याय १२२-
शाको नाम महावृक्षः प्रजास्तस्य महानुगाः॥२७॥
तेषु नद्यश्च सप्तैव प्रतिवर्षं समुद्रगाः। द्विनाम्ना चैव ताः सर्वा गङ्गाः सप्तविधः स्मृताः॥२९॥

कुश जैसे स्तम्भ आकार के महावृक्ष को शक कहते हैं जैसे उत्तर भारत में साल (शक = सखुआ), दक्षिण भारत में शकवन (सागवान)। आस्ट्रेलिया में ३०० प्रकार के युकलिप्टस स्तम्भ जैसे हैं, अतः यह शक द्वीप कहा जाता था। भारत के दक्षिण पूर्व (अग्नि कोण) में होने से इसे अग्नि द्वीप भी कहते थे (वायु पुराण, ४८/१४)। यहां के ७ वर्षों की ७ समुद्रगामिनी नदियों को भी गङ्गा कहते थे।
उत्तर अमेरिका में भी ७ मुख्य नदियों को गङ्गा कहते थे तथा इनको भी भारत जैसा पवित्र मानते थे। यह क्रौञ्च द्वीप था, जिसका मुख्य क्रौञ्च पर्वत भी उड़ते पक्षी के आकार का है। यह घृतोदक (उत्तर महासागर का हिमयुक्त जल) को घेरे है। यहां की ७ गंगा में मिसीसिपी, मिसौरी, कोलोरडो, हडसन आदि हो सकती हैं।

मत्स्य पुराण, अध्याय १२२-
घृतोदकः समुद्रो वै क्रौञ्चद्वीपेन संवृतः। चक्रनेमि प्रमाणेन वृतो वृत्तेन सर्वशः॥७९॥
गोविन्दात् परतश्चापि क्रौञ्चस्तु प्रथमो गिरिः॥८१॥ श्रुतास्तत्रैव नद्यस्तु प्रतिवर्ष गताः शुभाः॥८७॥
गौरी कुमुद्वती चैव सन्ध्या रात्रिर्मनोजवा। ख्यातिश्च पुण्डरीका च गङ्गा सप्तविधा स्मृता॥८८॥

३. भागीरथी गङ्गा-आजकल गंगोत्री या गौमुख को गङ्गा का स्रोत मानते हैं, पर पुराणों में कैलास पर्वत के निकट विन्दु सरोवर को इसका स्रोत कहा गया है।
ब्रह्माण्ड पुराण (१/२/१८)
मध्ये हिमवतः पृष्ठे कैलासो नाम पर्वतः। तस्मिन्निवसति श्रीमान्कुबेरः सह राक्षसैः॥१॥
अप्सरो ऽनुचरो राजा मोदते ह्यलकाधिपः। कैलास पादात् सम्भूतं पुण्यं शीत जलं शुभम्॥२॥
मदं नाम्ना कुमुद्वत्त्तत्सरस्तूदधि सन्निभम्। तस्माद्दिव्यात् प्रभवति नदी मन्दाकिनी शुभा॥३॥
दिव्यं च नन्दनवनं तस्यास्तीरे महद्वनम्। प्रागुत्तरेण कैलासाद्दिव्यं सर्वौषधिं गिरिम्॥४॥
पुण्या मन्दाकिनी चैव नदी स्वच्छोदका च या॥८॥
मही मण्डल मध्येन प्रविष्टे ते महोदधिम्। कैलासाद्दक्षिणे प्राच्यां शिवसत्त्वौषधिं गिरिम्॥।९॥
तस्य पादात् प्रभवति शैलोदं नाम तत्सरः॥२१॥
तस्मात् प्रभवते पुण्या शिलोदा नाम निम्नगा। सा चक्षुः सीतयोर्मध्ये प्रविष्टा लवणोदधिम्॥२२॥
तस्य पादे महद्दिव्यं शुभ्रं काञ्चन वालुकम्। रम्यं बिन्दुसरो नाम यत्र राजा भगीरथः॥२५॥
गङ्गा निमित्तं राजर्षिरुवास बहुलाः समाः। दिवं यास्यन्ति ते पूर्वे गङ्गा तोय परिप्लुताः॥२६॥
मदीया इति निश्चित्य समाहित मनाः शिवे। तत्र त्रिपथगा देवी प्रथमं तु प्रतिष्ठिता।
सोम पादात् प्रसूता सा सप्तधा प्रतिपद्यते॥२७॥

मत्स्य पुराण (१२१/२-२८)
मध्ये हिमवतः पृष्ठे कैलासो नाम पर्वतः। तस्मिन् निवसति श्रीमान् कुबेरः सह गुह्यकैः॥२॥
अप्सरो ऽनुगतो राजा मोदते ह्यलकाधिपः। कैलास पाद सम्भूतं पुण्यं शीत जलं शुभम्॥३॥
मन्दोदकं नाम सरः पयस्तु दधिसन्निभम्। तस्मात् प्रवहते दिव्या नदी मन्दाकिनी शुभा॥४॥
दिव्यं च नन्दनं तत्र तस्यास्तीरे महद्वनम्। प्रागुत्तरेण कैलासाद् दिव्यं सौगन्धिकं गिरिम्॥५॥
सर्वधातुमयं दिव्यं सुवेलं पर्वतं प्रति। चन्द्रप्रभो नाम गिरिः यः शुभ्रो रत्नसन्निभः॥६॥
तत्समीपे सरो दिव्यमच्छोदं नाम विश्रुतम्। तस्मात् प्रभवते दिव्या नदी ह्यच्छोदिका शुभा॥७॥
पुण्या मन्दाकिनी नाम नदी ह्यच्छोदिका शुभा॥९॥
तस्य पादात् प्रभवति शैलोदं नाम तत्सरः॥२२॥
तस्मात् प्रभवते पुण्या नदी शैलोदका शुभा। सा चक्षु-सीतयोर्मध्ये प्रविष्टा पश्चिमोदधिम्॥२३॥
अस्त्युत्तरेण कैलासाच्छिवः सर्वोषधो गिरिः। गौरं तु पर्वतश्रेष्ठं हरितालमयं प्रति॥
हिरण्यशृङ्गः सुमहान् दिव्यौषधिमयो गिरिः। तस्य पादे महद् दिव्यं सरः काञ्चन वालुकम्॥२५॥
रम्यं विन्दुसरो नाम यत्र राजा भगीरथः। गङ्गार्थे स तु राजर्षिरुवास बहुलाः समाः॥२६॥
दिवं यास्यन्तु मे पूर्वे गङ्गा तोयाप्लुतास्थिकाः। तत्र त्रिपथगा देवी प्रथमं तु प्रतिष्ठिता॥२७॥
सोमपादात् प्रसूता सा सप्तधा प्रविभज्यते। यूपा मणिमयास्तत्र विमानाश्च हिरण्मयाः॥२८॥

रामायण तथ अन्य कई पुराणों में राजा सगर से भगीरथ तक ५ पीढ़ियों द्वारा गङ्गा को पृथ्वी पर लाने का वर्णन है। राजा सगर के अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा इन्द्र ने चुरा लिया था। राजा सगर के ६०,००० पुत्रों ने घोड़े को पूरी पृथ्वी में खोजा। अन्त में पूर्वोत्तर दिशा में कपिल मुनि के पास वह घोड़ा दीखा। उन्होंने कपिल मुनि को ही चोर समझ कर तिरस्कार किया जिनके क्रोध से वे जल गये।यही कपिल मुनि सांख्य दर्शन के प्रणेता थे। सगर के पुत्र असमञ्जस के पुत्र अंशुमान् घोड़े को खोजने निकले। सगर पुत्रों द्वारा खोदे गये समुद्र के किनारे चलते हुए उनके भस्म के पास ही घोड़े को देखा। वहां बैठे हुए कपिल मुनि की स्तुति की। उन्होंने कहा कि सगर पुत्रोख् का उद्धार केवल गंगा जल से ही हो सकता है। राजा सगर ने अश्वमेध यज्!ज पूरा करने के बाद तपस्या की। उनके पौत्र अंशुमान् तथा अंशुमान् के पुत्र दिलीप ने भी तप किया पर वे गङ्गा को नहीं ला सके। अन्त में दिलीप के पुत्र भगीरथ की तपस्या से गंगा पृथ्वी पर आयी। गंगा के समुद्र तक प्रवाह के लिये उन्होंने मार्ग बनाया।

भागवत पुराण, स्कन्ध ९-अध्याय ८-
सगरश्चक्रवर्त्यासीत् सागरो यत्सुतैः कृतः॥५॥ सोऽश्वमेधैरयजत सर्ववेदसुरात्मकम्॥७॥
तस्योत्सृष्टं पशुं यज्ञे जहाराश्वं पुरन्दरः॥८॥
सुमत्यास्तनया दृप्ताः पितुरादेशकारिणः। हयमन्वेषमाणास्ते समन्तान्न्यखनन् महीम्॥९॥
प्रागुदीच्यां दिशि हयं ददृशुः कपिलान्तिके। एष वाजिहरश्चौर आस्ते मीलितलोचनः॥१०॥
हन्यतां हन्यतां पाप इति षष्टिसहस्रिणः। उदायुधा अभिययुरुन्मिमेष तदा मुनिः॥११॥
स्वशरीराग्निना तावन्महेन्द्रहृतचेतसः। महद् व्यतिक्रमहता भस्मसादभवन् क्षणात्॥१२॥
योऽसमञ्जस इत्युक्तः स केशिन्या नृपात्मजः। तस्य पुत्रोंऽशुमान् नाम पितामहहिते रतः॥१५॥
अंशुमांश्चोदितो राज्ञा तुरङ्गान्वेषणे ययौ। पितृव्य खातानुपथं भस्माब्ति ददृशे हयम्॥२०॥
तत्रासीनं मुनिं वीक्ष्य कपिलाख्यमधोक्षजम्। अस्तौत् समाहितमनाः प्राञ्जलिः प्रणतो महान्॥२१॥
(कपिल ने कहा)-अश्वोऽयं नीयतां वत्स पितामहपशुस्तव। इमे चपितरो दग्धा गङ्गाम्भोऽर्हन्ति नेतरत्॥२९॥
राज्यमंशुमतिन्यस्त निःस्पृहो मुक्तबन्धनः। और्वोपदिष्ट मार्गेण लेभे गतिमनुत्तमम्॥३१॥
अध्याय ९-अंशुमांश्च तपस्तेपे गङ्गानयनकाम्यया। कालं महान्तं नाशक्नोत् ततः कालेन संस्थितः॥१॥
दिलीपस्तत्सुतस्तद्वदशक्तः कालमेयिवान्। भगीरथस्तस्य पुत्रस्तेपे स सुमहत् तपः॥२॥
दर्शयामास तं देवी (गङ्गा) प्रसन्ना वरदास्मि ते। इत्युक्तः स्वमभिप्रायं शशंसावनतो नृपः॥३॥
भगीरथः स राजर्षिर्निन्ये भुवनपावनीम्। यत्र स्वपितृणां देहा भस्मीभूताः स्म शेरते॥१०॥

भारत-ज्ञान संस्था के श्री डी.के. हरि तथा उनकी पत्नी हेमा जी ने इस पर शोध किया है जिसका सारांश इस वेब पर है।
https://bharathgyanblog.files.wordpress.com/2019/08/ganga.pdf
इसके अनुसार वर्तमान गङ्गा क्षेत्र में जल की कमी थी तथा यह गर्मी में सूख जाती थी। पूर्व की नदी गण्डक में ही पूरे वर्ष पानी रहता थ, जिसे सदानीरा कहते थे। अतः सगर से पांच पीढ़ियों ने कैलास पर्वत से हरिद्वार तक हिमनदों को लाने का मार्ग बनाया। ये राजा थे-सगर, असमञ्जस + ६०००० सगर पुत्र, अंशुमान्, दिलीप, भगीरथ।
हिमनदों को लाने में ३ खण्ड थे-(१) तिब्बत में कैलास क्षेत्र से विन्दु सरोवर, (२) विन्दु सरोवर से हरिद्वार, (३) हरिद्वार से राजमहल तथा वहां से समुद्र तक।
राजमहल में ज्वालामुखी पर्वत था, खुदाई से पर्वत फट पड़ा जिससे सगर के ६०,००० पुत्र (या पुत्र तथा उनके साथ के इंजीनियर) जल कर मर गये।

१८१७ में कैप्टन हर्बर्ट ने हिमालय के सर्वेक्षण में देखा कि गंगोत्री के ऊपर धौली में पर्वतों को काटने के चिह्न तथा बड़े बड़े कटे हुए पत्थर देखे थे। उसके बाद श्रीकण्ठ तथा बन्दरपूंछ के बीच नाली की गहरी खुदाई के चिह्न देखे।
बाद में सर्वेयर जेनरल विलियम विलकौक्स ने लिखा-
(१) प्राचीन इंजीनियरिंग कार्यों को दैवी कार्य रूप में लिखा गया है।
(२) गंगा के निकट उत्तर से दक्षिण जितनी छोटी बड़ी नदियां हैं, वे मूलतः मनुष्य निर्मित नहर थीं।
(३) इन नहरों के बीच की दूरी उतनी ही थी जितनी दूरी पर नहर बनना चाहिए।
४. आध्यात्मिक अर्थ-मस्तिष्क के वाम-दक्षिण २ भागों के बीच जितना सम्बन्ध सूत्र हो, मनुष्य उतना ही बुद्धिमान् होता है। उनके केन्द्र आज्ञा चक्र में सुषुम्ना की ३ धारायें या नाड़ियां मिलती हैं-इड़ा, पिङ्गला, सुषुम्ना। इनको ही गङ्गा-यमुना-सरस्वती भी कहा गया है। आज्ञा चक्र के ऊपर जहां ३ नाड़ी मिलती हैं वह त्रिकूट या कैलास पर्वत है। वहां पर मस्तिष्क के २ भागों का सम्बन्ध ही शिव-पार्वती संवाद है, जो ज्ञान का स्रोत है। यह आध्यात्मिक वर्णन है। आधिभौतिक, तथा आधिदैविक वर्णन भी ठीक हैं।
समुन्मीलत् संवित् कमल-मकरन्दैक रसिकं, बजे हंस-द्वन्द्वं किमपि महतां मानस-चरम्।
यदालापा-दष्टादश गुणित विद्या परिणतिः, यदादत्ते दोषाद् गुण-मखिल-मद्भ्यः पय इव॥
(शङ्कराचार्य, सौन्दर्य लहरी, ३८)
= हृद्देश में विकसित संवित् कमल से निकलने वाले मकरन्द के एकमात्र रसिक उस हंसों के ओड़े का मैं भजन करता हूँ, जो महान् पुरुषों के मन रूपी मान-सरोवर में विहार करता है, जिसके वार्तालाप का परिणाम १८ विद्याओं की व्याख्या है, और जो दोषों से समस्त गुण उसी प्रकार निकाल लेता है, जैसे जल-मिश्रित दूध से दूध को हंस निकाल लेता है। (कोई हंस ऐसा नहीं कर सकता है, यह मस्तिष्क के हंस रूपी भागों का लाक्षणिक वर्णन है)
वेद के द्वा-सुपर्ण सूक्त का भी आध्यात्मिक अर्थ यही है।
द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया, समानं वृक्षं परिषस्वजाते। तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्ति, अनश्नन्नन्यो अभिचाकषीति॥
(मुण्डक उपनिषद्, ३/१/१, श्वेताश्वतर उपनिषद्, ४/६, ऋक्, १/१६४/२०, अथर्व, ९/१४/२०)
=एक साथ रहने वाले २ मित्र पक्षी एक ही वृक्ष पर हैं। उनमें एक पिप्पल खाता है, अन्य बिना खाये केवल देखता रहता है।
सुषुम्ना केन्द्र में गंगा-यमुना रूपी नाड़ियों के बीच प्राण रूप चलने वाले मत्स्य का भक्षण करने से साधना होती है-
गंगा यमुनयोर्मध्ये मत्स्यो द्वौ चरतः सदा, तौ मत्स्यौ भक्ष्येद्यस्तु स भवेन्मत्स्य साधकः।

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