गर्व से कहो हम हिन्दू हैं

गर्व से कहो हम हिन्दू हैं

वो हिन्दू जिनकी हिन्दू धर्म के प्रति श्रद्धा भी असंदिग्ध है, ज्ञान और जानकारी के अभाव मे #हिन्दू शब्द को मुसलमानी गाली समझने के कारण अपनी ही पहचान को बदलने की तथ्य परे वकालत करते हैं। मैं जानता हूँ कि ऐसा कहने वालो का तर्क यही है कि भारतीय वांगमय मे हिन्दू शब्द प्राप्त नहीं है और यह शब्द हमें मुसलमानों ने गाली के रूप मे उपहार दिया है और हिन्दू वस्तुतः आर्य है। परंतु दुर्भाग्यवश ऐसा कहने वालों मे अधिकतर वे सज्जन होते हैं जिन्होंने स्वयं न संस्कृत साहित्य का ही गूढ अदध्ययन किया और न ही व्याकरण का, ऐसे मे वेद शास्त्र दुर्धर हो जाना स्वाभाविक ही हो जाता है। . हिन्दू शब्द वास्तव मे कोई अरबी या फारसी गाली नहीं वरन वैदिक संस्कृत का व्याकरण के आधार पर ही लौकिक रूपान्तरण है और वस्तुतः वैदिक शब्द सिंधु से बना है। संस्कृत मे प्रत्येक शब्द की उत्पत्ति के पीछे एक विज्ञान है, जिसे शब्द व्युत्पत्ति कहते हैं। जैसे- “पत्नात त्रायते सा पत्नी” वैदिक व्याकरण मे शब्द उत्पत्ति का आधार ध्वनि विज्ञान (नाद विज्ञान) है, ध्वनि उत्पत्ति, उद्गम, आवृत्ति, ऊर्जा आदि के आधार पर ध्वनि परिवर्तन से समानार्थी व नए शब्दों की उत्पत्ति होती है, जैसे सरित(नदी) शब्द की उत्पत्ति हरित शब्द से हुई है। “हरितो न रह्यॉ”( अथर्ववेद 20.30.4) की व्याख्या मे निघंटु मे स्पष्ट है “सरितों हरितो भवन्ति”॥ वैदिक व्याकरण के संदर्भ में निघंटु का निर्देश (नियम) है कि “स” कई स्थानों पर “ह” ध्वनि में परिवर्तित हो जाता है। इस प्रकार अन्य स्थानों मे भी “स” को “ह” व “ह” को “स” लिखा गया है। . सरस्वती को हरस्वती- “तं ममर्तुदुच्छुना हरस्वती” (ऋग. 2।23।6), श्री को ह्री- “ह्रीश्चते लक्ष्मीश्च पत्न्यौ” आदि-आदि॥ इसी प्रकार हिन्दू शब्द वैदिक सिंधु शब्द की उत्पत्ति है क्योंकि सिंधु शब्द से हिंदुओं का सम्बोधन विदेशी आरंभ नहीं है जैसा कि इतिहास मे बताने का प्रयास होता है वरन वैदिक सम्बोधन है। “नेता सिंधूनाम” (ऋग 7.5.2), “सिन्धोर्गभोसि विद्दुताम् पुष्पम्”(अथर्व 19.44.5) फारसी मे हिन्दू शब्द का अर्थ काफिर चोर कालान्तर में किया गया है, ऐसा नहीं कि हिन्दू फारसी का मूल शब्द इसी भाव में है। फारसी में “स” के स्थान पर “ह” प्रचलन में आ गया, संभवतः संस्कृत व्याकरण के उपरोक्त नियम ने फारसी में नियमित स्थान बना लिया होगा। भाषाविज्ञान जानने वाले लोग जानते हैं कि “इंडो-यूरोपियन” परिवार की सभी भाषाओं की उत्पत्ति संस्कृत से ही मानी जाती है अथवा संस्कृत के किसी पूर्व प्रारूप से! वास्तव में फारसी में हिन्दू का भ्रष्ट अर्थ घृणा के आधार पर काफी बाद में किया गया जैसे कि यहूदियों के लिए कुरान में कई जगह काफिर, दोज़ख़ी जैसे शब्द प्रयुक्त हुए हैं। फारसी मे हिन्दू शब्द का ऐसा ही अर्थ “गयास-उल-लुगत” शब्दकोश के रचनाकार मौलाना गयासुद्दीन की देन है। इसी तरह राम और देव जैसे संस्कृत शब्दों का अन्य शब्दकोशों मे एकदम उल्टा अर्थ लिखा है। राम का अर्थ कई स्थानों पर चोर भी किया गया है। क्या हमारे लिए राम के अर्थ बादल जाएंगे? हिन्दू शब्द मुसलमानों की अपमानपूर्ण देन है कहना नितांत अनभिज्ञता है, यह शब्द मुसलमान धर्म के आने से बहुत पहले से ही सम्मानपूर्ण तरीके से हमारे लिए प्रयोग होता रहा है। मुसलमानों से काफी समय पूर्व भारत आने वाले चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपने यात्रा वृत्तान्त मे भारत के लिए हिंदुस्थान शब्द प्रयोग किया है। प्राचीन शब्दकोशों जैसे रामकोश, मेदिनीकोश, अद्भुतकोष, शब्दकल्पद्रुम मे भी हिन्दू शब्द प्राप्त होता है,- “हिन्दुहिन्दूश्च हिंदव:” (मेदिनी कोश) प्राचीन ग्रन्थ बृहस्पति आगम में हिन्दू शब्द को व्यापक अर्थ में हिमालय व इन्दु सागर (हिन्द महासागर) के परिक्षेत्र से परिभाषित किया गया है- हिमालयात् समारंभ्य यावत् इन्दु सरोवरम्। तद्देव निर्मितम् देशम् हिंदुस्थानम् प्रचक्षते॥ अर्थात, उत्तर में हिमालय से आरम्भ कर के दक्षिण में इन्दु सागर (हिन्द महासागर) तक का जो क्षेत्र है उस देव निर्मित देश को हिंदुस्थान कहते हैं। . वास्तव में आर्य शब्द हिन्दू जाति का विशेषण है (जिसका अर्थ श्रेष्ठ होता है) और वेदों पुराणों में इसी अर्थ मे प्रयुक्त हुआ है, हिन्दू वीरों वीरांगनाओं ने भी स्वयं को आर्य-पुत्र या आर्य-पत्नी कह के संबोधित किया है आर्य नहीं। क्योंकि स्वयं के लिए विशेषण या सम्मानसूचक शब्द का प्रयोग भारतीय परंपरा नहीं रही है। अतः हिन्दू शब्द ही अधिक समीचीन व संगत है। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण है कि आज आर्य या हिन्दू शब्द की बहस के अनौचित्य को समझना क्योंकि आज हमें पढ़ाया जाने वाला मैकाले सोच का भ्रष्ट इतिहास भारतीय गौरव को शर्मसार करने के लिए प्रयासरत है॥ इस संकीर्ण प्रयास के प्रतिरोध में आज यह लेख समर्पित है। आज हिन्दू शब्द ही सम्पूर्ण विश्व में हमारी पहचान है, हमारे ज्ञान गौरव प्राचीनता और हमारी अमर संस्कृति की पहचान है…, “अतः गर्व से कहो हम हिन्दू हैं” .
 डॉ. दीनदयाल मणि त्रिपाठी ( प्रबंध सम्पादक )

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