गायत्री वेदमाता

श्रीअरुण कुमार उपाध्याय (धर्मज्ञ)
गायत्री कई अर्थों में वेदमाता है (अथर्ववेद 19/71/1)
(1) गायत्री सीखने पर मनुष्य वेद पढने योग्य होता है- वेदारम्भ संस्कार।
(2) सामान्यतः सभी छन्द 4 पाद के हैं। पर अर्थ के लिए गायत्री मन्त्र 3 पाद का ही है। सभी मन्त्रों के इसी प्रकार छन्द और पाद के अनुसार अर्थ होने चाहिए। छन्द = वाक्य, पाद = वाक्यांश।
(3) गायत्री का प्रथम पाद आधिदैविक सृष्टि, द्वितीय पाद आधिभौतिक दृश्य जगत् तथा तृतीय पाद आध्यात्मिक विश्व (शरीर के भीतर) का वर्णन करता है। इसी प्रकार वेद मन्त्रों के तीन प्रकार के अर्थ हैं।
(4) ॐ और व्याहृति (3 या 7 लोक) मिलाकर 5 पाद हैं। आकाश में सृष्टि के 5 पर्व हैं। क्रिया रूप में मन्त्रों के 5 प्रकार के अर्थ हैं (तैत्तिरीय उपनिषद्, शीक्षा वल्ली)।
(5) 3 या 7 व्याहृति का अर्थ विश्व के 3 या 7 प्रकार के विभाजन हैं। त्रिसत्य या अन्य 7 सत्य हैं। ये त्रिषप्ताः परियन्ति विश्वाः (अथर्ववेद 1/1/1)। सत्यव्रतं सत्यपरं त्रिसत्यं, सत्यस्य योनिं निहितं च सत्ये। सत्यस्य सत्यं ऋतसत्य नेत्रं, सत्यात्मकं त्वां शरणं प्रपद्ये।। (भागवत 10/2/26)।
(6) लोकों की माप गायत्री छन्द से है। गायत्री छन्द में 24 अक्षर हैं। मनुष्य की लम्बाई चौडाई के औसत को 24 बार दो गुणा करने से (1 करोड गुणा) पृथ्वी का व्यास होता है। इसी प्रकार पृथ्वी से क्रमशः 1-1 करोड गुणा बडे सौर मण्डल, ब्रह्माण्ड, पूर्ण विश्व हैं।
(7) अर्थ के लिये गायत्री मंत्र के प्रत्येक चरण में 8-8 अक्षर हैं। यह प्रकृति द्वारा निर्माण के 8 रूप (सांख्य में 8 प्रकृति), 8 वसु आदि हैं। सृष्टि वेद भी गायत्री से ही उत्पन्न हुआ है।
(8) पूर्ण ब्रह्म स्वरूप गायत्री का प्रथम पाद स्रष्टा रूप ब्रह्मा, द्वितीय पाद क्रिया या तेज रूप विष्णु, तृतीय पाद ज्ञान रूप शिव हैं। शक्ति रूप में यह महाकाली, महालक्ष्मी, महा सरस्वती हैं। केवल ब्रह्मा रूप में सृष्टि का संकल्प, लोक निर्माण, वेद हैं। शिव रूप में मूल मन जिसमें संकल्प हुआ, रुद्र-शिव (उग्र-शान्त), ज्ञान का स्रोत हैं। विष्णु रूप में सृष्टि आरम्भ, पालन, स्वतंत्र चिन्तन और अस्तित्व हैं। हनुमान रूप में वृषाकपि, मारुति, मनोजव हैं। अन्य देवों सम्बन्धी भी ऐसे ही अर्थ हैं।
(9) मनुष्य जीवन के प्रथम 24 वर्ष मानसिक और शारीरिक विकास के हैं।
(10) प्रकृति के 24 तत्त्व तथा ॐ रूप पुरुष मिलाकर सांख्य के 25 तत्त्व हैं।
(11) मूल अथर्ववेद से 3 शाखा वेद ऋक्-यजुः-साम होने के बाद मूल भी बना रहा। इसका प्रतीक पलास दण्ड ब्रह्मा का प्रतीक है जिससे 3 पत्ते निकलते हैं। यह वेदारम्भ संस्कार में व्यवहार होता है। शिव का प्रतीक वट वृक्ष गुरु शिष्य परम्परा का प्रतीक है। मूल वृक्ष से हवाई जड जमीन से लग कर वैसा ही वृक्ष बन जाता है। इसी प्रकार गुरु शिष्य को अपना ज्ञान दे कर अपने जैसा बना देता है। पीपल के सभी पत्ते स्वतन्त्र रूप से हिलते हैं। इसी प्रकार मनुष्य परस्पर सम्बन्धित होने पर भी विचार में प्रायः स्वतंत्र है। सभी पिण्डों के स्वतंत्र अस्तित्व से सृष्टि चल रही है। अतः पीपल विष्णु का प्रतीक है।

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