गीता दर्शन

गीता दर्शन

प्रपन्नपारिजाताय तोत्रवेत्रैकपाणये। ज्ञानमुद्राय कृष्णाय गीतामृतदुहे नमः।।

सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनन्दनः।

पार्थो वत्सः सुधीर्भोक्ता दुग्धं गीतामृतं महत्।।

गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रविस्तरैः।

या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिःसृता।।

भगवान श्रीकृष्ण करुणावरुणालय हैं। जब उनके हृदय से करुणा की धारा प्रवाहित हुई, जीवों का कल्याण करने के लिए, तब उसने सबसे पहला पात्र चुना धृतराष्ट्र नामक एक अन्धे व्यक्ति को, जिनके पास स्वयं देखने का, युद्ध-भूमि में जाने का, गीता सुनने का कोई साधन नहीं था और जो गीता के उपदेश-स्थल से बहुत दूर बैठे हुए थे। भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हीं के हृदय में प्रेरणा प्रदान की कि वे उनकी वाणी के सम्बन्ध में प्रश्न करें। यद्यपि भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं तो अर्जुन को गीता सुनायी, परन्तु अर्जन के अतिरिक्त यदि किसी को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ तो संजय और धृतराष्ट्र ही। इसलिए गीता के तीन पात्र हैं-अर्जुन, संजय और धृतराष्ट्र।

अतः सबसे पहले भगवान श्रीकृष्ण का ही स्मरण करना चाहिए, जिन्होंने जगन्मंगमल के लिए धृतराष्ट्र के हृदय में गीता-विषयक जिज्ञासा उत्पन्न की। धृतराष्ट्र को युद्ध के समाचार पहले ही से मालूम थे। दस दिन युद्ध हो चुका था। भीष्म-पितामह शरशय्यापार जा चुके थे, तब इस प्रश्न को कि- किमकुर्वत संजय: कौरवों और पाण्डवों ने धर्मक्षेत्र-कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में इकट्ठे होकर क्या किया, केवल यह तात्पर्य नहीं हो सकता कि जिन्होंने युद्ध किया या नहीं किया? उस प्रश्न का तो तात्पर्य यह है कि वहाँ कौन-सी विशेष घटना घटित हुई थी?

गीता महाभारत के भीष्म पर्व में आती है और वह उसका सारभूत ज्ञान है। यह बात बार-बार ध्यान देने योग्य है कि जिनके पास कोई सामथ्र्य नहीं, कोई साधन नहीं, कोई दृष्टि नहीं उनके हृदय में भी गीता-विषयक प्रश्न उठाकर भगवान अपना आदेश-सन्देश उनतक पहुँचाते हैं।

अब दूसरी बात संजय की लेते हैं। संजय ने समग्र गीता भगवान के श्रीमुख से ही श्रवण की, परन्तु वह व्यास-प्रसाद भी है। स्वयं संजय का कहना है कि मैंने गीता का गुह्य ज्ञान तो भगवान के श्रीमुख से ही प्राप्त किया; किन्तु उसमें केवल भगवान का ही प्रश्न नहीं, व्यास का प्रसाद भी है- *व्याससप्रसादात् श्रुतवान् एतद् गुह्यमहं परमं।(गीता 18.75)*

इससे निष्कर्ष यह निकला कि धृतराष्ट्र पर संजय की, संजय पर महापुरुष व्यास की और अर्जुन पर साक्षात भगवान की कृपा है। संजय ने समग्र गीता का श्रवण करके अपना एक निश्चय बताया और छह बातों पर ध्यान आकृष्ट किया। संजय का कहना है कि हम लोग जो कुछ भी करते हैं, उसमें ईश्वर का हाथ सन्निविष्ट है और अतएव हम लोगों को ज्ञात रहनी चाहिए। ईश्वर का हाथ होना इतना महत्वपूर्ण नहीं, जितना महत्वपूर्ण उसका ज्ञात रहना है। *अतिदितो देवो नैनं भुनक्ति।*

पूर्वाचार्यों का कहना है कि ईश्वर तो सब जगह है, परन्तु वह रक्षा तब करता है जब मालूम पड़े कि ईश्वर रक्षा करता है- *हरिस्मृतिः सर्वविपद्विमोक्षणम्।*

भगवान की स्मृति से कष्ट का निवारण होता है। वस्तुतः भगवान स्वयं विपत्ति से नहीं छुड़ाते, भगवान को स्मृति विपत्ति से छुड़ाती है। भगवान तो विपत्ति के आने में कर्म का फल देते हैं। परन्तु जो अपने हृदय में भगवान की स्मृति रखता है, उसको विपत्ति का अनुभव नहीं होता। अपने द्वारा किये हुए भगवत्स्मरण में यह सामर्थ्य है कि वह विपत्ति को मिटा दे। हृदय में भगवान का विद्यमान होना एक बात है और भगवान का स्मरण होना दूसरी बात है। भगवान की स्मृति ही सब दुःखों को दूर करती है। भगवत्स्मृति हमारे हाथ में हैं। अतः हमें चाहिए कि हम उस निरन्तर बनाये रखें।

मीनाक्षी सिंह ( सहसंपादक )

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