गुरुपूर्णिमा...गुरु के प्रति कृतज्ञता का दिन

गुरुपूर्णिमा…गुरु के प्रति कृतज्ञता का दिन

इस वर्ष आषाढ शुक्ल पूर्णिमा, अर्थात गुरुपूर्णिमा 16 जुलाई 2019 को है। गुरुपूर्णिमा के दिन गुरुतत्त्व १ सहस्त्र गुना कार्यरत होने के कारण साधक एवं शिष्य अधिकाधिक लाभ ग्रहण कर पाते हैं । इस दिन ग्रहण किए गए लाभ को स्थायी रखने के लिए केवल एक दिन ही नहीं, बल्कि सदैव प्रयत्नरत रहना अत्यावश्यक है । गुरु ईश्वर के सगुण रूप होते हैं । उन्हें तन, मन, बुद्धि तथा धन समर्पित करने से उनकी कृपा अखंड रूप से कार्यरत रहती है । वास्तवत में गुरु को हमसे कोई भी अपेक्षा नहीं होती; परंतु गुरु के लिए त्याग करने से हमें आध्यात्मिक लाभ मिलता हैं ।
गुरु के प्रति त्याग का महत्त्व
किसी विषयवस्तु का त्याग करने से उसके प्रति व्यक्ति की आसक्ति घट जाती है । तन के त्याग से देहभान भी क्षीण होता है एवं देह ईश्वरीय चैतन्य ग्रहण कर पाता है । मन के त्याग से मनोलय होता है तथा विश्वमन से एकरूपता साध्य होती है । बुद्धि के त्याग से व्यक्ति की बुद्धि विश्वबुद्धि से एकरूप होती है तथा वह ईश्वरीय विचार ग्रहण कर पाता है । त्याग के माध्यम से गुरु व्यक्ति के लेन-देन को घटाते हैं । तन, मन एवं बुद्धि की तुलना में धन का त्याग करना साधक तथा शिष्य के लिए सहज सुलभ होता है ।
त्याग के संबंध में कहा जाए, तो गुरु को कितना धन अर्पण किया है इसकी अपेक्षा अपने पास कितना धन शेष रखा है, यही महत्त्वपूर्ण होता है । जैसे कोई व्यक्ति एक लाख रुपयों में से दस हजार रुपए अर्पण करे एवं दूसरा व्यक्ति पचास रुपयों में से सारे पचास रुपए गुरु को अर्पण करे, तो इसमें पूरे पचास रुपए अर्पण करने का महत्त्व अधिक है । अंत में गुरु के चरणों में शिष्य को अपना सर्वस्व अर्पण करना होता है । ऐसा करने की सिद्धता होनी चाहिए । सत्सेवा करने से तन का त्याग होता है, नामजप करने से मन का त्याग होता है, तथा बुद्धि का उपयोग कर गुरुकार्य भावपूर्ण एवं परिपूर्ण करने से बुद्धि का त्याग होता है । आप भी किसी संत, गुरु अथवा आध्यात्मिक संस्था द्वारा आयोजित गुरुपूर्णिमा महोत्सवमें सहभागी होकर तन, मन, बुद्धि एवं धन का यथासंभव त्याग कीजिए तथा गुरुतत्त्व का पूरा लाभ ग्रहण कीजिए ।
३. गुरुपूर्णिमा का अधिकाधिक लाभ ग्रहण करने के लिए आवश्यक प्रयास
१. गुरुमंत्र का अथवा कुलदेवता का अधिकाधिक नामजप करना
२. गुरुपूर्णिमा महोत्सव में सम्मिलित होकर अधिकाधिक सत्सेवा करना
३. सेवाके अंतर्गत प्रत्येक कृत्य भावपूर्ण एवं परिपूर्ण होने के लिए प्रार्थना तथा कृतज्ञता व्यक्त करना
४. गुरुकृपा पाने के लिए आवश्यक गुण तीव्र मुमुक्षुत्व अर्थात गुरुप्राप्ति के लिए तीव्र उत्कंठा, आज्ञापालन, श्रद्धा एवं लगन बढाने का दृढ संकल्प करना
५. गुरुकार्य के लिए धन अर्पण करना
६. गुरु को अपना सर्वस्व अर्पण कर देना ही खरी गुरुदक्षिणा है, यह ध्यान में रखना तथा वैसे कृत्य करने के लिए प्रयास करना
७. गुरुपूर्णिमा महोत्सव में सम्मिलित होने के लिए अन्य व्यक्तियों को प्रेरित करना
संदर्भ : सनातन-निर्मित ग्रंथ ‘त्यौहार, धार्मिक उत्सव एवं व्रत’
– कृतिका खत्री , प्रवक्ता , सनातन संस्था ,दिल्ली

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