घाघ और भड्डरी का ऋतु विज्ञान

घाघ और भड्डरी का ऋतु विज्ञान

भारत के मौसम वैज्ञानिक घाघ और भड्डरी

आज के मौसम वैज्ञानिक आधुनिकतम यंत्रों की सहायता से मौसम की भविष्यवाणी करते हैं। फिर भी उनके अनुमान प्रायः गलत निकलते हैं। भारत में लम्बे समय से प्रकृति के संकेतों तथा पशु-पक्षियों के व्यवहार के अध्ययन से मौसम का अनुमान लगाने की परम्परा रही है। इन पारम्परिक विशेषज्ञों के आकलन सटीक निकलते थे। प्राचीन भारत का यह मौसम-विज्ञान ज्योतिष-शास्त्र का एक अंग रहा है। ग्रामीण अंचल से आज भी आगे के मौसम का अन्दाजा इन्हीं सूत्रों के आधार पर लगाया जाता है। एक उदाहरण देखिये-

तीतरवर्णी बादली विधवा काजल रेख।
वा बरसे वा घर करे इमे मीन न मेख।।
अर्थात्‌ बादलों का रंग तीतर जैसा हो जाये और विधवा स्त्री आँखों में काजल लगाये तो समझो कि बादल जरूर बरसेंगे और वह महिला घर बसायेगी।
ऐसी उक्तियों के सहारे बड़े मनोरंजक तरीके से वर्षा, गर्मी, सर्दी आदि की भविष्यवाणियॉं की जाती हैं। चीन में भी यह विज्ञान काफी विकसित हुआ। वहॉं भी बादलों का रंग, हवा का रुख तथा पशु-पक्षियों की हरकतों को देख कर मौसम की सम्भावना टटोली जाती है।

कृषि वैज्ञानिक घाघ

आधुनिक काल में ज्योतिष-शास्त्र के आधार पर मौसम का विश्लेषण करने वालों में घाघ और भड्डरी का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। ऐसी मान्यता है कि घाघ का जन्म आज से लगभग पॉंच सौ साल पहले हुआ था। घाघ का वास्तविक नाम देवकली दुबे था और छपरा (बिहार)के रहने वाले थे। कहा जाता है कि बचपन से ही घाघ को खेती-बाड़ी में काफी रुचि थी। छोटी आयु में ही खेती की समस्याओं का निदान करने में वे कुशल हो गये थे। दूर-दूर से लोग उनके पास खेती की समस्याओं के हल के लिये आते थे। युवावस्था में वे छपरा छोड़ कर कौज आ गये। कौज के पास चौधरी सराय में वे रहते थे।
भड्डरी की कथा- भड्‌डरी के सम्बन्घ में दो अलग-अलग धारणायें हैं । एक मान्यता के अनुसार भड्‌डरी वैज्ञानिक घाघ की पत्नी थी। दूसरी मान्यता यह है कि वे पुरुष थे और घाघ के समकालीन थे। प्रमाणों के अनुसार यही सिद्ध होता है कि भड्डरी घाघ की धर्मपत्नी ही थी। लोकमान्यता है कि भड्डरी उस समय नीची माने जाने वाली जाति से थी और घाघ के घर में सफाई का काम करती थी। एक दिन उसने सफाई काम अधूरा छोड़ कर घाघ से कहा- महाराज बरसात आने वाली है, छत पर अनाज रखा है, इसलिये मैं जल्दी घर जा रही हूँ।
घाघ को बड़ा आश्चर्य हुआ क्योंकि वे खुद भी इस कला के धुरंधर थे और उनको वर्षा की कोई सम्भावना नहीं दिख रही थी। लेकिन कोई घंटे भर बाद ही घनघोर बरसात शुरु हो गई।
दूसरे दिन जब भड्डरी फिर से काम करने आई तो घाघ ने पूछा-तुमने कल बरसात होने की बात कैसे जान ली?  इस पर भड्डरी ने कहा-
ब्राह्मण देवता आप जैसे विद्वान को भला मैं क्या बता सकती हूँ? लेकिन घाघ अपनी जिद पर अड़े रहे। घाघ की उत्सुकता देख भड्डरी ने कहा-महाराज इसका रहस्य भी बता दूूँगी, पर मेरी एक शर्त है, कि आप मुझसे विवाह करें।
घाघ ने शर्त मान ली और दोनों पति-पत्नी हो गये। इसके बाद दोनों ने मिल कर मौसम का मिजाज भॉंपने के सूत्रों को क्रमबद्ध किया। इनकी लोकोक्तियों पर एक पुस्तक भी प्रकाशित हुई है।

घाघ-भड्डरी और राजस्थान

मौसम विभाग के इन दोनों विशेषज्ञों की उक्तियॉंं अवधी बोली में हैं। लेकिन राजस्थान के ग्रामीण अंचल में भी इन दोनों की काफी प्रसिद्धि है और राजस्थानी में भी प्रचुर संख्या में घाघ-भड्डरी की भविष्यवाणियॉं मिलती हैं। इससे  यह अनुमान लगाना कठिन नहीं है कि स्थानीय विद्वानों ने घाघ-भड्डरी की लोकोक्तियों का अनुवाद किया होगा। इन उक्तियों की सबसे बड़ी विशेषता है कि इन्हें बड़े रोचक तरीके से लिखा गया है, ताकि किसान इन्हें याद रख सकें। हमारे किसान बन्धुओं को आज भी ये लोकोक्तियॉं जुबानी याद हैं। किसी गॉंव में आप खेतों के बीच खाट जमा कर बैठ जायें, तो खेत का स्वामी आपको एक के बाद एक लोकोक्तियॉं सुनाने लगेगा। अभी वर्षा का मौसम है, तो हमको सुनने को मिलेगा-

शुकरवारी बादली रही शनीचर छाय।
घाघ कहे,हे भड्डरी बिन बरस्यां नहीं जाय।।

अर्थात शुक्रवार को छाये बादल शनिवार को भी बने रहे तो निश्चित है अच्छी वर्षा होगी।
किसान भाई और कहेगा-

उत्तर चमके बीजली पूरब बहे जु बाव।
घाघ कहे सुण भड्डरी बरधा भीतर लाव।।

उत्तर दिशा में बिजली चमके और हवा पूर्व की हो तो घाघ कहते हैं कि भड्डरी बैल को घर के अन्दर बॉंध लो, बरसात आने वाली है।

वर्षा और वायु के सिद्धान्त

घाघ और भड्डरी की जोड़ी ने वैसे तो खेती सम्बन्धी प्रत्येक पक्ष के सिद्धान्त बताये हैं, पर वर्षा सम्बन्धी उनकी उक्तियॉं अधिक प्रचलित हैं। अच्छी वर्षा के लिये वे कहते हैं-

सावन केरे प्रथम दिन, उगत न दीखै भान।
चार महीना बरसै पानी, याको है रमान।।

यदि श्रावण के कृृष्ण पक्ष की एकम को आसमान में बादल छाये रहे और प्रातःकाल सूर्य के दर्शन न हों तो यह इस बात का प्रमाण है कि चार महीनों तक जोरदार वर्षा होगी।

अच्छी वर्षा के और लक्षण बताते हुए घाघ कहते हैं-

चैत्र मास दशमी खड़ा, जो कहुँ कोरा जाइ।
चौमासे भर बादला, भली भॉंति बरसाई।।

चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की दशमी को यदि आसमान में बादल नहीं हैं तो यह मान लेना चाहिये कि इस साल चौमासे में बरसात अच्छी होगी।
कम वर्षा के योग भड्डरी ने इस प्रकार बताये हैं-

नवै असाढ़े बादले, जो गरजे घनघोर।
कहै भड्डरी ज्योतिसी, काले पड़े चहुँ ओर।।

आषाढ़ कृष्ण नवमी के दिन यदि आकाश में घनघोर बादल गरजें तो भड्डरी ज्योतिषी कहती है कि चारों ओर अकाल पड़ेगा।

सावन पुरवाई चलै, भादौ में पछियॉंव।
कन्त डगरवा बेच के, लरिका जाइ जियाव।।

श्रावण माह में यदि पुरवा (पूर्व दिशा से हवा) बहे और भाद्रपद में पछुआ (पश्चिम दिशा की हवा) चले तो (भड्डरी घाघ से कहती है कि ) स्वामी पशुओं को बेच दो और बच्चों की चिंता करो, क्योंकि अकाल पड़ने वाला है।
पशु-पक्षियों के व्यवहार से वर्षा का अनुमान लगाने के सम्बन्ध में अनुमान लगाने के सम्बन्ध में कहा गया है-

उलटे गिरगिट ऊँचे चढ़े, बरसा होई भुई चल बढ़े।

जब गिरगिट उलटा हो कर ऊपर की ओर चढ़े तो
समझो कि अच्छी वर्षा होगी और पृथ्वी पर जल बढ़ेगा।
ढेले ऊपर चील जो बोले, गली-गली में पानी डोले।

खेत में किसी ढेले पर बैठ कर चील बोले तो तय है कि जोरदार बरसात होगी और गलियों में पानी भर जायेगा।  वायु की दिशा से वर्षा का सम्बन्ध इस प्रकार बताया गया है-

पुरवा में पछियॉंव बहै, हॅंस के नारि पुरुष से कहै।
ऊ बरसे ई करे भतार, घाघ कहें यह सगुन विचार।।

यदि पूर्वी और पश्चिमी वायु एकसाथ मिल कर बहती हों और जब कोई महिला पर पुरुष से हॅंस कर बात करती हो तो जल निश्चित बरसेगा और वह महिला कलंक लगायेगी।

कार्तिक का महीना सर्दियों के शुरू में आता है। वर्षा ऋतु इसके आठ महीने बाद आती है। लेकिन इस महीने का भी वर्षा से सम्बन्ध बताते हुए भड्डरी कहती है-

कातिक सुदी एकादशी बादल बिजली होय।
कहे भड्डरी असाढ़ में, बरखा चोखी होय।।

अर्थात यदि कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवउठनी ग्यारस) को आकाश में बादल हों और बिजली चमके तो आषाढ़ में उत्तम वर्षा होगी।
वर्षा का अनुमान लगाने के बारे में भड्डरी संकेत देती है कि,

जो बदरी बादरमॉं खमसे, कहे भड्डरी पानी बरसे।
अर्थात्‌ यदि बादलों के ढेर में बादल समाते हों तो भड्डरी का कहना है कि पानी बरसेगा।

अतरे खोतरे डंड करे

घाघ केवल मौसम के ही विशेषज्ञ नहीं थे बल्कि खेती के सभी पक्षों में निष्णात थे। बीज कब बोने चाहिये, जमीन को कब और कैसे जोतना चाहिये, निराई-गुड़ाई कब हो, खाद कैसे तैयार करनी चाहिये, बैलों की पहिचान आदि सभी पक्षों के सिद्धान्त उन्होंने बताये हैं। इसके अतिरिक्त उनकी नीति सम्बन्धी उक्तियॉं भी हैं। एक उदाहरण देखिये-

अतरे खोतरे डंड करै, ताल नहाय ओसमॉं परै।
कहे भड्डरी ऐसे नर को, देव न मारे आपुई मरै।।

जो कभी-कभी या अनियमिति रूप से कसरत करता है, तालाब में (बिना गइराई जाने) स्नान करता है और ओस में सोता है, उसे ईश्वर नहीं मारते, वह खुद अपनी मौत बुलाता है।
लोकोक्तियॉं बहुत प्रभाव छोड़ने वाली होती है और ग्रामीण अंचल की लोकोक्तियॉं तो किसानों का मार्गदर्शन करने का काम करती हैं। घाघ की उक्तियॉं ऐसी ही प्रभावी लोकोक्तियॉं हैं। वे कहते हैं-

गया पेड़ जब बगुला बैठा, गया गेह जब मुड़िया पैठा।
गया राज जहॅं राजा लोभी, गया खेत जहॅं जामी गोभी।।

जिस पेड़ पर बगुला बैठने लगता है, वह सूख जाता है, जिस घर में कापालिकों-तांत्रिकों का प्रवेश हो जाता है वह घर नष्ट हो जाता है। वह राज्य नष्ट हो जाता है जिसका राजा लोभी  हो और वह खेत नष्ट हो जाता है जिसमें गोभी पैदा की जाती है।

पथ्य-कुपथ्य

अपने यहॉं ऋतुचर्या अर्थात्‌ मौसम के अनुसार खाने-पीने का बड़ा महत्व है। घाघ-भड्डरी ने भी सभी ऋतुओं के पथ्य-कुपथ्य बताये हैं। वर्ष के बारह महीनों में क्या नहीं खाना चाहिये, इस बारे में कहा गया है-

चैते गुड़ बैसाखे तेल, जेठे पन्थ अस़ाढे बेल।
सावन साग न भादो दही, क्वार करेला न कातिक मही।
अगहन जीरा पूसे धना, माघ मिश्री फागुन चना।
ई बारह जो देय बचाय, वाहि घर बैद कबौं न जाय।।

याने चैत्र में गुड़, वैशाख में तेल, ज्येष्ठ माह में धूप में धूमना, आषाढ़ में बील, श्रावण में हरी सब्जी, भादों में दही, क्वार में करेला और कार्तिक में छाछ, मार्गशीर्ष में जीरा, पौष में धनिया, माघ में मिश्री तथा फागुन में चने का प्रयोग नहीं करना चाहिये। जो इसका ध्यान रखते हैं उनके घर वैद्य-डाक्टर कभी नहीं आते। ये तो निषेध हैं, फिर खाना क्या चाहिये?

घाघ कहते हैं-
सावन हर्रे भादों चीत, क्वार मास गुड़ खायउ मीत।
कार्तिक मूली, अगहन तेल, पूस में करें दूध से मेल।
माघ मास घिउ खिचड़ी खाय, फागुन उठि के प्रात नहाय।
चैत मास में नीम बेसहती, वैसाखे में खाय जड़हथी।
जेठ मास जो दिन में सोवै, ओकर ज्वर असाढ़ मे रोवै।।

सावन में हरड़, भादों में चीता (एक झाड़ी जिसके पत्ते बड़े गुणकारी होते हैं), क्वार में गुड़, कार्तिक में मूली, मार्गशीर्ष में तेल, पूस में दूध , माघ महीने में घी-खिचड़ी, फागुन में प्रातः काल स्नान, चैत्र में नीम की पत्तियॉं और वैसाख में भात जो खाता है तथा जेठ के महीने में दोपहर में सोने (विश्राम करने) वाला आषा़ढ़ माह में होने वाली बीमारियों एवं बुखार से दूर रहता है।

डॉ. दीनदयाल मणि त्रिपाठी ( प्रबन्ध सम्पादक )

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