चारो वर्ण और वेदाध्ययन

चारो वर्ण और वेदाध्ययन

महर्षि भरद्वाजके पूछने पर महर्षि भृगु कहते हैं

 

न विशेषोऽस्ति वर्णानां सर्वं ब्रह्ममिदं जगत् ।

ब्रह्मणा पूर्वसृष्टं हि कर्मभिवर्णतां गतम् ।। (महाभारत शांतिपर्व १८८/१०)

 

भृगु जी कहते हैं -‘मुने ! पहले वर्णों में कोई अन्तर नहीं था ,ब्रह्माजी से उत्पन्न होने के कारण यह सारा जगत् ब्राह्मण ही था । पीछे विभिन्न कर्मोंके कारण उनमें वर्णभेद हो गया ।’

 

कामभोगप्रियास्तीक्ष्णा:  क्रोधना:  प्रियसाहसा: ।

त्यक्तस्वधर्मा रक्ताङ्गास्ते द्विजा: क्षत्रतां गता: ।। (म०शांतिपर्व०१८८/११)

 

अर्थात् -‘जो अपने ब्राह्मणोचित धर्मका परित्याग करके विषय भोगके प्रेमी ,तीखे स्वभाववाले ,क्रोधी और साहसका पसन्द करने वाले हो गये और इन्हीं कारणों से (युद्ध आदि वीरतापूर्ण कर्म करनेमें रक्त बहाने वाले रक्त वर्ण कहे गए )   वे ब्राह्मण रक्त वर्ण के क्षत्रिय भाव को प्राप्त हुए -क्षत्रिय कहलाने लगे ।’

 

गोभ्यो वृत्तिं समास्थाय पीता: कृष्युपजीविन: ।

स्वधर्मान् नानुतिष्ठन्ति ते द्विजा वैश्यतां गता: ।। (म०शान्तिपर्व १८८/१२)

 

अर्थात् -‘जिन्होंने गौओं से तथा कृषि कर्म के द्वारा जीविका चलाने की वृत्ति अपना ली और राजा को कर देने (स्वर्ण को कर के रूप में देने वाले पीत वर्ण ) के कारण पीत वर्ण हो गए तथा जो ब्राह्मणोचित धर्म को छोड़ बैठे ,वे ही ब्राह्मण वैश्यभावको प्राप्त हुए ।’

 

हिंसानृतप्रिया लुब्धा:  सर्वकर्मोपजीविन: ।

कृष्णा: शौचपरिभ्रष्टास्ते द्विजा: शूद्रातां गता: ।।(म०शान्तिपर्व १८८/१३)

अर्थात् -‘जो शौच और सदाचारसे भ्रष्ट होकर हिंसा असत्यके प्रेमी हो गये ,लोभवश व्याधोंके समान सभी तरह के निन्द्य कर्म करके जीविका चलाने लगे और इसीलिये वे ( वेद के अदर्शन से अन्धकरामय होने से कृष्ण वर्ण )  कृष्ण वर्ण ब्राह्मण शूद्रभाव को प्राप्त हो गये । ‘

 

इत्येतै: कर्मभिर्व्यस्ता द्विजा वर्णान्तरं गता: ।

धर्मो यज्ञक्रिया तेषां नित्यं न प्रतिषिध्यते ।।(म०शान्तिपर्व १८८/१४)

 

अर्थात् -‘ इन्ही कर्मो के कारण ब्राह्मणत्वसे अलग होकर वे सभी ब्राह्मण दूसरे-दूसरे वर्ण के हो गये ,किन्तु उनके लिये नित्यधर्मानुष्ठान और यज्ञकर्मका कभी निषेध नहीं किया गया है अर्थात् किसी भी वर्ण को धर्म और अनुष्ठान के किसी भी कार्य को करने में मना नहीं है ।’

 

इत्येते चतुरो वर्णा येषां ब्राह्मी सरस्वती ।

विहिता ब्रह्मणा पूर्वं लोभात् त्वज्ञानतां गता: ।। (म०शांतिपर्व १८८/१५)

अर्थात् – ‘इस प्रकार ब्राह्मण ,क्षत्रिय ,वैश्य और शूद्र आदि चारों वर्ण हुए ,इन्हीं चारों वर्णों के लिये ब्रह्माजी ने पहले ब्राह्मी सरस्वती (वेदवाणी ) प्रकट की अर्थात् चारो वर्णों के लिये वेद का ज्ञान ब्रह्माजी ने प्रदान किया । परन्तु लोभविशेषके कारण जिन्होंने वेदाध्ययन नहीं किया वे अज्ञानको प्राप्त हो गये ।’

 

उपरोक्त महाभारत शान्तिपर्व के प्रकरण से चारो वर्णों के लिये वेद का ज्ञान विहित है ,ऐसा स्पष्ट होता है । जिन द्विज बालकों का संस्कार नहीं हुआ वे शूद्र कहे गए ,लेकिन धर्मसूत्र में उन शूद्रके बालकों के भी उपनयन ,वेदाध्ययन और अग्निहोत्र करने का निर्देश मिलता है ।

 

शुक्लयजुर्वेदीय पारास्करगृह्यसूत्र २/५/४३ सूत्रके भाष्य में आचार्य गदाधरने आपसम्बधर्मसूत्रके “शूद्राणामदुष्टकर्मणामुपायनं वेदाध्ययन मग्न्याधेयं फलवन्ति च कर्माणि” १/१/६  सूत्रको उद्धृत करके लिखा है -‘शूद्राणामदुष्टकर्मणामुपनयनम् । इदं च रथकारस्योपनयनम् । तस्य च मातामहीद्वारकं शूद्रत्वम् । अदुष्टकर्मणां मद्यपानादिरहिता नामिति ।।(शुक्लयजुर्वेदीय पारास्करगृह्यसूत्र २/५/४३ गदाधर भाष्य )  आचार्य गदाधर ने लिखा है , अदुष्ट अर्थात् जो शराब नहीं पी…

डॉ. दीनदयाल मणि त्रिपाठी ( प्रबंध सम्पादक )

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