जगद्बन्धु

जगद्बन्धु

भारतवर्ष में साधु-सन्तों त्यागी-तपस्वियों और अन्य अनेक प्रकार के धर्म प्रचारकों की कमी नहीं है। इतना ही क्यों, अगर हम कहें कि यहाँ पर ऐसे गृहत्यागी धर्म का ही धंधा करने वालों लोगों की संख्या इतनी अधिक है जितनी आज शेष समस्त संसार में मिल कर भी नहीं है, तो भी यह अतिशयोक्ति न होगी। बड़े नगरों और तीर्थों की बात तो छोड़ दीजिये, उनमें कोई ऐसा न होगा जहाँ ऐसे दो एक ‘बाबाजी’ स्थान या मन्दिर आदि बनाकर न टिके हुये हों। लाखों-लाख गृहस्थियों को रहने के लिए झोपड़ी भी न मिले और परिश्रम करने पर भी उनको भूखा रहना पड़ता हो, पर इन ‘महात्माओं’ के लिये भगवान कहीं न कहीं से इच्छा-भोजन भेज ही देते हैं। रहने के लिये बड़े-बड़े मन्दिर या आश्रम खाली पड़े रहते हैं। इस परिस्थिति को देखकर प्रायः रामायण की यह चौपाई याद आ जाती है- “तपसी, धनवन्त, दरिद्र गृही। कलि कौतुक तात न जात कहीं।”

ऐसी परिस्थिति में जब हम किसी साधु नामधारी को वास्तव में त्याग और तपस्या के साथ परोपकार का जीवन व्यतीत करते देखते हैं तो एक प्रकार का आन्तरिक संतोष होता है। जो व्यक्ति योग्यता और सामर्थ्य रखने पर भी उसे अपनी साँसारिक उन्नति और स्वार्थ की पूर्ति में न लगाकर अन्य लोगों के हितार्थ परिश्रम करते हैं, कष्ट सहते हैं और फिर भी किसी के ऊपर अहसान नहीं जताते, वे वास्तव में प्रशंसा के पात्र हैं।

प्रभु जगद्बन्धु (जन्म 1870) एक ऐसे ही साधु थे। बाल्यावस्था से ही उनकी रुचि वैराग्य और भगवत् भजन की तरफ थी। उनके पिता फरीदपुर (पूर्व बंगाल) के एक अच्छे पंडित थे। घर के अन्य व्यक्ति भी विद्यानुराग तथा धार्मिक स्वभाव के थे। इसलिये वे इनको भी भली प्रकार शिक्षित बनाना चाहते थे, पर संसार से जन्मजात वैराग्य होने के कारण ये स्कूल में दसवें दर्जे (मैट्रिक) से अधिक अध्ययन न कर सके। उस बीच में भी ये चाहे जब घर को छोड़कर जंगल को चल देते थे और वहाँ ध्यान में डूबे रहते थे। इसका एक कारण यह भी हुआ कि जब ये चौदह मास के थे तब इनकी माता का और सात वर्ष की अवस्था में पिता का देहान्त हो गया और इनको प्रायः एक स्थान से दूसरे स्थान में आते जाते रहना पड़ा। इससे इनकी शिक्षा अनियमित रूप से हुई और बुद्धिमान तथा उच्च मेधावृद्धि के छात्र होने पर भी वे अपनी पढ़ाई को विशेष रूप से अग्रसर न कर सके।

पर समाज सेवा और लोकोपकार की प्रवृत्ति उनमें विद्यार्थी जीवन में ही प्रस्फुटित होने लग गई थी। पन्द्रह वर्ष की आयु में ही वे अनुभव करने लगे कि उनका जीवन दूसरों की सेवा के लिये ही है। उन्होंने सबसे पहले अपने सहपाठी विद्यार्थियों के सुधार की तरफ ही ध्यान दिया। वर्तमान समय के स्कूली जीवन में छोटे-बड़े विद्यार्थियों में जो दोष उत्पन्न हो जाते हैं वे किसी से छिपे नहीं हैं। जगद्बन्धु का व्यक्तित्व और सौंदर्य ऐसा आकर्षक था कि विद्यार्थी उनको घेरे रहते थे। वे उनको मुख्यतः दो बातों का उपदेश देने लगे-ब्रह्मचर्य का पालन करो और हरिभक्त से प्रेम रखो।” वे भली प्रकार समझते थे कि ये विद्यार्थी ही कुछ समय पश्चात् समाज और देश के आधार बनेंगे। यदि वे नैतिक दृष्टि से उन्नति नहीं करेंगे, यदि उनका चरित्र उच्च नहीं बनेगा, तो भविष्य के लिये क्या आशा की जा सकती है? साथ ही इनका यह भी विश्वास था कि नैतिकता और चरित्र की नींव धर्म पर ही स्थापित की जा सकती है। वे प्रायः विद्यार्थियों से कहा करते थे-

“चैतन्य बनो, नैष्ठिक बनो, धर्म में स्थिर रहो। आत्म संयम ही आत्म-रक्षा है। पवित्रता और निष्ठा का सदैव पूर्ण ध्यान रखो। निष्ठा ही आरोग्य और शक्ति है तथा अनिष्ट ही रोग और मृत्यु है। जो नैष्ठिक होगा उसके मार्ग में कोई बाधा नहीं डाल सकता। व्यर्थ की बातें मत करो। अपने को बड़ा मत समझो नहीं तो कुछ भी नहीं कर सकोगे। शरीर, मन और प्राण से धर्म की रक्षा करना उचित है। धर्म की रक्षा करते-करते कैसी भी विपत्ति आ जाय, मृत्यु का सामना भी करना पड़े तो भी कोई हानि नहीं है, क्योंकि धर्म ही भगवान है।”

जगद्बन्धु के उपदेशों का प्रभाव बालकों पर बहुत अच्छा पड़ता था और उनमें से अनेक बुरी आदतों को त्याग कर संयम और धार्मिकता का पालन करने लग गये। पर इस कारण उन लड़कों के माता-पिता तथा सम्बन्धी इनसे द्वेष करने लगे। वे समझने लगे कि इससे लड़कों का ध्यान पढ़ने-लिखने से हट जायेगा और वे संसारी बनने के बजाय बैरागी बनना पसन्द करने लगेंगे। इस कारण वे इनको धमकाने लगे और जब इन्होंने अपना कार्य जारी रखा तो उन्होंने इनको एक – दो बार अकेले में पकड़कर खूब मारा-पिटा भी। जब यह खबर उनके गाँव के पास रहने वाले एक भगवत् प्रेमी जमींदार वनमाली को लगी तो वे इनको अपने यहाँ ले गये। कुछ समय पश्चात् वे उनके साथ वृन्दावन गये और छः महीने तक कृष्णा-भक्ति में डूबे रहे। इसके पश्चात् उनका वास्तविक जीवन कार्य आरम्भ हुआ। वृन्दावन में एक भक्त ने उनके लिए निवास स्थान बनवा देने को कहा और वहाँ रहकर भजन करने का आग्रह किया। पर उन्होंने उत्तर दिया कि-सच्चे वैष्णव का धर्म पतितों की सेवा करना है, और मैंने उसी के लिए जन्म लिया है।”

वृन्दावन से लौटने के कुछ समय पश्चात् जगद्बन्धु ने कीर्तन का प्रचार करना आरम्भ किया और इसके लिये अच्छे कीर्तन करने वालों को एकत्रित करने लगे। सन् 1890 के कार्तिक मास में उन्होंने एक बड़ा कीर्तन करने की घोषणा की। इसके लिये कलकत्ता से बहुत से करताल, घण्टा, शंख, बिगुल आदि मंगाया गये। अगहन के प्रथम दिन वे एक विशाल कीर्तन-दल को लेकर फरीदपुर नगर की तरफ चले और बाजारों तथा हरिनाम का अमृत पिलाने लगे। अग्रसर होते-होते वे ‘बूना पाड़ा’ में पहुँचे जहाँ ‘बागदी’ नाम की अस्पृश्य जाति वालों की बस्ती थी। ये लोग अत्यन्त कुसंस्काराच्छत्र, मद्यपान का व्यवहार करने वाले थे। इनके स्त्री-पुरुषों का चरित्र भी अत्यन्त दूषित था। उस समय हावर्ट साहब फरीदपुर के मजिस्ट्रेट थे। उनकी सलाह से ईसाई पादरी ने इन बागों को ईसाई धर्म में दीक्षित कर लेने की योजना बनाई थी और उसकी तारीख भी नियत हो गई थी। आज जगद्बन्धु को अपने बीच में पाकर वे लोग धन्य हो गये। उनका नेता रजनी पाषा, जो तन्त्र-विद्या में बड़ा निपुण था, प्रभु के मोहक स्वरूप को देखकर मुग्ध हो गया। इस घटना के सम्बन्ध में बंगाल के सुप्रसिद्ध ‘भारतवर्ष’ मासिक पत्र में एक लेखक ने लिखा था-

“बूना पाड़ा अष्लील नाचगान, व्यभिचार और शराब पीने के लिये प्रसिद्ध था। अकस्मात् एक-दिन नीरव साधक जगद्बन्धु घृणित बूना लोगों के मोहल्ले में पहुँच गये। उस ब्रह्मचर्य के अद्भुत तेज को देखकर वे विस्मित हो गये। उस अपूर्व सौंदर्य को देखकर उनके प्राण मोहित हो गये। फरीदपुर के अनाचारी बूना शुद्धचारी होकर हरिनाम में लीन हो गये।”

इसके कुछ समय बाद वे देश भ्रमण को गये और अनेक स्थानों में दीन जनों पर कृपा करते हुये कलकत्ते की डोम बस्ती (राम बागान) में आकर ठहर गये। ‘बागदी’ जाति की तरह यह भी एक अस्पृश्य जाति थी और जब प्रभु जगदबन्धु उनकी बस्ती में रहने लगे तो वह स्थान एक-तीर्थ बन गया। बड़े-बड़े प्रतिष्ठित व्यक्ति राजा, जमींदार और शिक्षित लोग वहाँ पहुँचकर धूल में बैठे। और भी सैकड़ों स्त्री पुरुष दर्शनों के लिये वहाँ आया करते थे। प्रभु का उद्देश्य डोम लोगों का सुधार करना था और इसकी पूर्ति के लिये उन्होंने इन लोगों में हरि-कीर्तन का प्रचार आरम्भ किया। ये लोग पहले से ही मृदंग बजाने में सिद्धहस्त थे। अब प्रभु जगद्बन्धु की प्रेरणा से वे ऐसे ऊँचे दर्जे के कीर्तनकार बन गये कि देश में उनकी तुलना के अन्य कीर्तन करने वाले कठिन थे। उनका सरदार हरिदास था, जिसके लिये प्रभु प्रायः कहा करते थे-जिस नाम संकीर्तन में हरिदास न हो वह वृथा है, वह नाम कीर्तन ही नहीं।” से डोमों की स्त्रियों की तुलना ब्रज की गोपियों से करते थे। जिन साधकों को वे किसी के घर का भोजन ग्रहण न करके अपने हाथ से बनाकर खाने का आदेश दे चुके थे उनको भी डोम स्त्रियों के हाथ की मधुकरी माँगकर खाने की आज्ञा दे दी। वे स्वयं भी उनके दिये भोजन को निस्संकोच ग्रहण करते थे। इस प्रकार उन्होंने समाज में डोमों की स्थिति को पूर्वापेक्षा बहुत सुधार दिया और हरि कीर्तन के कारण उच्च जाति के ब्राह्मण भी उनको आदर की दृष्टि से देखने लगे। इसी समय के आस-पास (सन् 1898) कलकत्ते में प्लेग का प्रकोप हुआ जिससे शहर की दशा बड़ी भयंकर हो गई और अधिकांश लोग वहाँ से भागने लगे। तब इनकी प्रेरणा से एक विशाल हरिनाम संकीर्तन का आयोजन किया गया, जिसका नेतृत्व इन डोम लोगों ने ही किया।

इस प्रकार जिस समय बंगाल के उच्चवर्ग के लोगों में से हिन्दू धर्म की निष्ठा का ह्रास हो रहा था और वे ब्रह्मसमाज अथवा ईसाई बनते जाते थे, जब आधुनिक शिक्षा प्राप्त व्यक्तियों में विदेशियों की नकल करने का भाव बड़े वेग से बढ़ रहा था, जब वर्णाश्रम धर्म का झण्डा लेकर चलने वाले सनातनी पंडित जात-पाँत सम्बन्धी रूढ़ियों में फँसे थे, उस समय सच्चे ब्राह्मण प्रभु जगदबन्धु ने डोम और बूना जैसी अस्पृश्य और पतित जातियों के बीच में जाकर यह सिद्ध कर दिखाया कि सत्संग और भगवत् भजन से पतित और घृणित जन भी श्रेष्ठ बन सकते हैं।

श्री जगद्बन्धु में दूसरों को प्रभावित कर सकने की शक्ति प्रकृतिगत थी। कहा जाता है कि उनकी देह से एक प्रकार का प्रकाश निकलता दिखाई देता था। इस लिये वे यथा संभव सदैव अपने शरीर को वस्त्रों से ढँका रखते थे। जिस समय वे वृन्दावन में रहते थे उस समय वे अपने मुँह को भी प्रायः ढक लेते थे, जिससे यहाँ की सामान्य जनता में उनका नाम “घूँघटवाली” प्रसिद्ध हो गया था। ऐसे ही वेश के कारण एक बार हुगली की पुलिस ने उनको कोई भागा हुआ अपराधी समझकर पकड़ लिया था। जब कोई आवश्यक कार्य होता तभी आप अपना दर्शन किसी को अच्छी तरह करने देते थे। आगे चलकर जब यह तेज इतना अधिक बढ़ गया कि उसको देखकर लोग मूर्छित होने लग गये तो प्रभु जगद्बन्धु ने अपने लिए एक कुटी बनवाली और मौन धारण करके सत्रह वर्ष तक उसके भीतर बन्द रहे। सन् 1918 में वे कुटी से बाहर आये और सितम्बर 1921 तक आस-पास के स्थानों में भ्रमण करके लोगों को मानव धर्म पर चलकर संसार में सुख-शांति की स्थापना का उपदेश करते रहे। कभी-कभी वे अकस्मात् गर्जकर कहने लगते “समाज को नहीं रहने देंगे-समाज को नहीं रहने देंगे -समाज को तोड़ देंगे।” कहना नहीं होगा कि उनका उद्देश्य हिन्दू-जाति में फैली हुई ऊँच नीच की महा विषम अवस्था और निर्बलों के प्रति होने वाले सामाजिक अन्यायों से ही था। अपने जीवन के अन्तिम क्षण तक वे इसी के लिये सचेष्ट रहे और आज भी उनके लगाये मानवता के वृक्ष के नीचे लाखों पतित समझे जाने वाले मनुष्य सुख शांति का अनुभव कर रहे हैं।

मीनाक्षी सिंह ( सहसंपादक )

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