जगन्नाथ स्मरण

श्री अरुण उपाध्याय (धर्मज्ञ)

महाम्भोधेस्तीरे कनक रुचिरे नील शिखरे,
वसन् प्रासादान्तः सहज बलभद्रेण बलिना।
सुभद्रा मध्यस्थः सकल सुर सेवावसरदो,
जगन्नाथ स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे॥
(शङ्कराचार्य, जगन्नाथाष्टक)

श्री जगन्नाथ मूर्ति नयन-पथ-गामी हो, यह सबकी इच्छा होती है। रथयात्रा के लिए जब पुलिस अधिकारियों को ड्यूटी पर लगाया जाता है, तो सभी प्रार्थना करते हैं कि उनको मन्दिर के भीतर ही ड्यूटी मिले। पर जो बाहर झाड़ू दे रहा है, बस स्टैण्ड पर या हजार किलोमीटर दूर पर यात्रियों के लिए व्यवस्था कर रहा है, वह भी जगन्नाथ की ही सेवा कर रहा है। जहां कहीं भी देश या समाज की सेवा हो रही है, वह जगन्नाथ की ही पूजा है। जब लगता है कि जगन्नाथ का काम कर रहे हैं, तो स्वतः उसके लिए सभी शक्ति आ जाती है। इसमें भक्त शिरोमणि हनुमान् जी प्रमाण हैं। सीता जी की खोज में जब वानर निकले थे, तब हनुमान् जी को भी सन्देह था कि वह समुद्र पार जा सकते हैं कि नहीं। तब जाम्बवन्त ने उनको बताया कि उनका जन्म ही राम के काम के लिए हुए हुआ है। यह सुनते ही उनका शरीर पर्वताकार हो गया।

रामकाज लगि तव अवतारा। सुनतहिं भयउ पर्वताकारा॥
कनक भूधराकार सरीरा। समर भयङ्कर अति बल वीरा॥

परब्रह्म की ही शक्ति सबके भीतर है। उसके कार्य की भावना होने पर ही वह शक्ति जाग्रत होती है। उसके बाद तो वह भगवान् का निमित्त मात्र ही है, भगवान् स्वयं उसका काम करते हैं।

मयैवैतेः निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्। (गीता, ११/३३)
शुद्ध सङ्कल्प के बाद उसके पूरा करने के लिए परिस्थिति वैसी ही बनने लगती है।
जगन्नाथ तत्त्व अकल्पनीय है। पर उसकी व्याख्या के लिए ३ भागों की कल्पना करते हैं।

ॐ तत्सदिति निर्देशः ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः (गीता, १७/२३)
स्वयं ॐ के ३ भाग करते हैं-अ, उ, म। इसके बाद अविभक्त अनुस्वार या विन्दु रह जाता है, जिसे नित्य अर्धमात्रा कहा गया है।

सुधा त्वमक्षरे नित्ये त्रिधा मात्रात्मिका स्थिता।
अर्ध मात्रा स्थिता नित्या यानुच्चार्या विशेषतः (दुर्गा सप्तशती, १/७४)।
इसके भी क्रमशः अर्ध भाग ९ बार होते हैं, जो सृष्टि के ९ सर्गों या ९ दुर्गा के रूप हैं।
न तस्य कार्यं करणं न विद्यते, न तत् समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते।
पराऽस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते, स्वाभाविकी ज्ञान-बल-क्रिया च॥
(श्वेताश्वतर उपनिषद्, ६/८)

यह मन्त्र जगन्नाथ मन्दिर के भीतर महालक्ष्मी मण्डप की दीवाल पर है, जहां रामानुजाचार्य का चित्र भी है। वे प्राण प्रतिष्ठा केलिए आये थे। ब्रह्म का कार्य, करण नहीं दीखता या पता चलता है। प्रतीक रूप में जगन्नाथ के हाथ नहीं हैं-
बिनु पग चलै सुनै बिनु काना। कर बिनु कर्म करै विधि नाना। (रामचरितमानस, १,११७/५)
अपाणिपादो जवनो ग्रहीता, पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः (श्वेताश्वतर उपनिषद्, ३/१९)

ब्रह्म के समान ही कोई नहीं है, उससे अधिक कहां से दीख सकता है? उसकी शक्ति हमारी कल्पना से परे है, पर कई प्रकार से सुनी जाती है। उसका स्वभाव ३ रूपों में देखते हैं-ज्ञान, बल, क्रिया।
ज्ञानघन-जगन्नाथ, बलरूप-बलभद्र, क्रिया रूप-सुभद्रा।
जगन्नाथ विष्णु के जाग्रत रूप हैं। दुर्गा सप्तशती के महाकाली चरित्र में जब तक भगवान् सोये हुए थे, उनको विष्णु कहा गया है। जब योगनिद्रा उनके शरीर से निकली, तब उनको जगन्नाथ कहा गया है।
योगनिद्रां यदा विष्णुर्जगत्येकार्णवी कृते (१/६६) निद्रां भगवतीं विष्णोरतुलां तेजसः प्रभुः। (१/७१)
उत्तस्थौ च जगन्नाथस्तया मुक्तो जनार्दनः॥९१॥

जब भगवती निद्रा रूप थीं, वे वाम थीं। निद्रा त्याग कर जगन्नाथ की क्रिया रूप में आयीं, तो दक्षिणा-काली हो गयीं। यह महाकाली चरित्र का वर्णन है। अतः जगन्नाथ को दक्षिणाकाली का रूप भी कहते हैं। इसी प्रकार शिव का ज्ञान रूप दक्षिणामूर्ति है। काली का प्रतीक नीम का पेड़ है। यह जीवाणु नाशक रूप में रक्तबीज का संहार करता है। इसी पेड़ की लकड़ी से जगन्नाथ मूर्ति बनती है।

अन्य भी कई त्रिविध विभाजन हैं-
(१) मूर्ति रूप ऋग्वेद, गति रूप यजुर्वेद, ज्ञान या महिमा रूप सामवेद। इन सबका स्थिर आधार अथर्व है (थर्व = थरथराना)

ऋग्भ्यो जातां सर्वशो मूर्त्तिमाहुः, सर्वा गतिर्याजुषी हैव शश्वत्।
सर्वं तेजं सामरूप्यं ह शश्वत्, सर्वं हेदं ब्रह्मणा हैव सृष्टम्॥ (तैत्तिरीय ब्राह्मण,३/१२/८/१)

(२) सत्-चित्-आनन्द-विश्व या ब्रह्म का मूल रूप रस था। उसके अनुभव से आनन्द होता है, अतः उसे आनन्द भी कहते हैं। चित् सूक्ष्म आकाश विन्दु मात्र है। हर विन्दु पर अनुभव-गम्य कुछ है, जो सत् है। बाकी रस अनुभव से परे है, वह असत् है।
यद्वै तत्सुकृतं रसो वै सः। रसं ह्येवायं लब्ध्वाऽऽनन्दी भवति। (तैत्तिरीय उपनिषद् २/७)
यच्चेतयमाना अपश्यंस्तस्माच्चितयः। (शतपथ ब्राह्मण ६/२/२/९)
असदेव इदं अग्र आसीत् (छान्दोग्य, उपनिषद्, ३/१९/१)

(३) सत्-श्री-अकाल-सत् = ज्ञान रूप, श्री = तेज रूप। अकाल = अव्यय पुरुष। अहमेवाक्षयो कालः धाताऽहं विश्वतोमुखः (गीता, १०/३३)

(४) शंकर-शं ब्रह्म = खं (आकाश) + कं (कर्ता, चेतन रूप) + रं (गति रूप)
ॐ खं ब्रह्म खं पुराणं वायु रं खमिति ह स्माह … (बृहदारण्यक उपनिषद्, ५/१/१)
खं मनो बुद्धिरेव च (गीता, ७/४) कस्मै देवाय हविषा विधेम (वाज. यजु. १२/१०२)
को नाम प्रजापतिः अभवत्, को वै नाम प्रजापतिः (ऐतरेय ब्राह्मण, ३/२१)

प्राणो वै रं प्राणे हीमानि सर्वाणि भूतानि रतानि (शतपथ ब्राह्मण, १४/८/१३/३, बृहदारण्यक उपनिषद्, ५/१२/१)
शं नो मित्रः शं वरुणः शं नो भवत्यर्यमा। शं न इन्द्रो बृहस्पतिः, शं नो विष्णुरुरुक्रमः॥
(ऋक्, १/९०/९, अथर्व, १९/९/६, वाज. यजु, ३६/९, तैत्तिरीय आरण्यक, ७/१/१)

(५) ब्रह्म-जीव-माया-आगे राम लखन बने पाछे। तापस वेश विराजत काछे॥
उभय बीच सिय सोहति कैसी। ब्रह्म जीव बिच माया जैसी॥ (रामचरितमानस, २/१२२/१)
माया रूप सुभद्रा कृष्ण की बहन हैं। जगन्नाथ को अपना पति मानने से वह ननद लगती हैं जो भाई को अपनी पत्नी के अधिक निकट देख कर प्रसन्न नहीं होती (न नन्दति-ननन्दः = ननद)। अतः काशी-मिथिला के लोकगीतों में जगन्नाथ को पति तथा माया को ननद रूप में गाया जाता है। जगन्नाथ सदा एक जैसे हैं, मनुष्य की तरह बच्चे से बड़े नहीं होते। अतः उनको बालक पति कहा है, जैसे विद्यापति के प्रसिद्ध गीत में-पिया मोरे बालक हम तरुणी गे। —दैरज धए तहु मिलत मुरारी॥
जगन्नाथ पुरी में क्यों-भारत उत्तर से देखने पर इन्दु (Inde, India) है, हिमालय अर्ध चन्द्राकार है, चन्द्र की तरह शीतल है तथा विश्व को प्रकाश देता है जैसे भारत ज्ञान का प्रकाश देता है (भा+रत)। यह हुएनसांग के यात्रा वर्णन, अध्याय १ में है। दक्षिण से देखने पर त्रिकोणाकार है। अधोमुख त्रिकोण शक्ति रूप है, भारत वर्ष के ९ खण्डों का यह मूल होने से शक्ति का मूल रूप कुमारिका खण्ड है। भारत विश्व का हृदय है (विश्व का भरण पोषण), अतः अधोमुख त्रिकोण के ऊपर अर्ध चन्द्र मिलाने से हृदय चिह्न बनता है, जो भारत के नक्शे का रूप है। भारतवर्ष अरब से वियतनाम तक था। उत्तर-दक्षिण (आसेतु-हिमाचल) तथा पूर्व पश्चिम दिशा दोनों में केन्द्र स्थान पर पुरी है, अतः पुरी में ही जगन्नाथ का निवास है।
ईश्वरः सर्व भूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति (गीता, १८/६१)
जगन्नाथ मूर्ति उद्धार करने वाले राजा इन्द्रद्युम्न को भी मध्य भारत का राजा कहा गया है।
जगन्नाथ पूजा का इतिहास-(१) १६,००० ईपू-नरसिंह अवतार के समय। यह वराह अवतार की परम्परा में थाजिनके सहायकों को शबर कहा गया। शबर लोगों ने जगन्नाथ मूर्ति का बाद में उद्धार किया।
स्कन्द पुराण-वैष्णव उत्कल खण्ड, अध्याय, २८-
आद्या मूर्तिर्भगवतो नारसिंहाकृतिर्नृप। नारायणेन प्रथितामदनुग्रहतस्त्वयि।३८॥
प्रत्यक्षं पश्य भो पुत्र नारसिंह तनुं पराम्। आवाहनमतः कुर्य्यादारुब्रह्मणि तत्त्ववित्॥ (नीलाद्रि महोदय६/६७)

शबर से साबल हुआ है जिससे भूमि खोदते हैं।

उस काल के कई पर्व आज भी ओड़िशा में प्रचलित हैं-१९ वर्षीय युग ऋक् ज्योतिष के अनुसार है (प्रभाकर होले व्याख्या)। इसमें ५ वर्ष संवत्सर हैं, बाकी १४ वर्ष अन्य प्रकार के हैं-परि-, इदा-, अनु-, इद्-वत्सर। जगन्नाथ का नव कलेवर प्रति १९ वर्ष में होता है (वर्तमान कैलेण्डर से अधिक आषाढ़ मास में)। सम्भवामि युगे युगे (गीता, ४/८) महाभारत, वन पर्व (२३०/८-१०) के अनुसार वेदांग ज्योतिष का धनिष्ठा से वर्ष आरम्भ कार्तिकेय द्वारा हुआ। उस समय उत्तर ध्रुव अभिजित् से दूर हट रहा था (१५,८०० ई.पू)

अदितिर्जातमदितिर्जनित्वम् (ऋग्वेद, १/८९/१०, अथर्व, ७/६/१, वाजसनेयिसं. २५/२३, मैत्रायणीसं. ४/२४/४)। अदिति के नक्षत्र पुनर्वसु से वामन के समय वर्ष आरम्भ होता था। पुनर्वसु नक्षत्रमें विषुव संक्रान्ति १७,५०० ई.पू. में होती थी। आज भी रथ-यात्रा या उलटा रथ सूर्य के पुनर्वसु नक्षत्र में रहने पर ही होता है। यह पुराने वर्ष समाप्त होने तथा नये के आरम्भ का पर्व था।
माघ सप्तमी की रथ यात्रा-कोणार्क में स्कन्द के क्रौञ्च द्वीप विजय उपलक्ष्य में होती है। उस समय माघ मास से वर्षा तथा वर्ष का आरम्भ होता था।
शिव पार्वती विवाह-ये कार्तिकेय के माता पिता थे। इनका विवाह पश्चिमी ओड़िशा के सम्बलपुर में ज्येष्ठ शुक्ल षष्ठी को होता है। उस समय सबसे अधिक गर्मी होती है। पर इसे शीतल षष्ठी कहते हैं, क्योंकि कार्तिकेय के समय उस समय शित ऋतु होती थी।
(२) वैवस्वत यम-इनके काल में जल प्रलय हुआ था (१०५००-१०००० ईपू)। अतः इन्द्रनीलमणि की मूर्ति को बालू में छिपा दिया जिससे वह नष्ट नहीं हो।

ब्रह्म पुराण, अध्याय, ४३-इन्द्रनीलमयी श्रेष्ठा प्रतिमा सार्वकामिकी॥७१॥
यम तां गोपयिष्यामि सिकताभिः समन्ततः॥७४॥ लुप्तायां प्रतिमायां तु इन्द्रनीलस्य भो द्विजाः॥७७॥
स्कन्द पुराण, वैष्णव, उत्कल खण्ड, अध्याय, २-

दंष्ट्रोद्धृत क्षितिभृते त्रयी मूर्तिमते नमः। नमो यज्ञ वराहाय चन्द्र-सूर्या-ग्नि-चक्षुषे ॥२३॥
नरसिंहाय दंष्ट्रोग्र मूर्ति द्रावित शत्रवे। यदपाङ्ग विलासैक सृष्टि स्थित्युपसंहृतिः॥२४॥
तममुं नील मेघाभं नीलाश्म मणि विग्रहम्॥२५॥

(३) इन्द्रद्युम्न (९,५०० ईपू)-यह सूर्यवंश के ५ वें राजा थे-वैवस्वत मनु (१३९०२ ईपू) तथा इक्ष्वाकु (८५७६ ईपू) के बीच। जल प्रलय के बाद विद्यापति शबर की सहायता से जगन्नाथ मूर्ति का उद्धार किया तथा तब से दारु मूर्ति बनने लगी। ओड़िशा में कटक-पारादीप मार्ग पर कटक से २० किमी दूर बिस्फी गांव है। मिथिला के विद्यापति के गांव का नाम भी बिस्फी था। यह नाम विद्यापति से सम्बन्धित हो सकता है।

स्कन्दपुराण, वैष्णव, उत्कल खण्ड, अध्याय ७-
आसीत्कृतयुगेविप्रा इन्द्रद्युम्नो महा नृपः। सूर्य वंशे स धर्मात्मा स्रष्टुः पञ्चम पुरुषः॥६॥

(४) इक्ष्वाकु (८५७६ ईपू-एनी बेसण्ट द्वारा तंजाउर बृहदेश्वर मन्दिर लेख से उद्धृत)। इनके कुलगुरु जगन्नाथ थे। भगवान राम ने अपने प्रयाण के समय विभीषण को इसकी पूजा का भार दिया। अतः विभीषण के भाई रावण तन्त्र को उड्डीश तन्त्र (ओड़िया) कहते हैं।

रामायण, उत्तर काण्ड, अध्याय, १०८-आराधय जगन्नाथमिक्ष्वाकु-कुल-दैवतम्॥२८॥
तथेति प्रतिजग्राह रामवाक्यं विभीषणः। राजा राक्षस मुख्यानां राघवाज्ञामनुस्मरन्॥२९॥
पद्मपुराण के रामाश्वमेध यज्ञ में जगन्नाथ का स्थान गंगा-सागर (जिस सागर में गंगा मिलती है) कहा गया है।

(५) शंकराचार्य (५०९-४७७ ईपू)-इन्होंने ४ पीठ स्थापित किये। नेपाल राजा वृषदेव वर्मन, भारत के चाहमान वंशी राजा सुधन्वा, तथा शंकराचार्य के बीच समझौता हुआ कि केवल पुरी तथा नेपाल राजा राजा या प्रधान सेवक रूप में जगन्नाथ की पूजा करेंगे तथा गोवर्धन पीठ के शंकराचार्य आचार्य रूप में। अतः पुरी राजा तथा नेपाल राजा को जगन्नाथ स्वरूप कहते हैं। नेपाल राजा वह पट्टा ले कर जगन्नाथ पूजा के लिए प्रति वर्ष आते थे। पर कम्युनिष्ट षड्यन्त्रके कारण नेपाल राज वंश समाप्त हो गया। अभी केवल पुरी राजा को चलन्ती जगन्नाथ कहते हैं। मेवाड़ के महाराणा को भी भगवान् के सेवक रूप में एकलिंग-दीवान कहते हैं।

(६) हर्षवर्धन (६०५-६४७ ई.)-वह ओड़िशा का भी राजा होने के कारण रथयात्रा मनाता था। हुएनसांग ने उसकी ६४२ ई की रथ यात्रा का वर्णन किया है जो कई वर्ष बाद हुआ था। केवल नव कलेवर ही ऐसा पर्व है जो हर वर्ष नहीं होता। ६४२ ई. में अधिक आषाढ़ वर्ष था तथा नव कलेवर हुआ था। इसमें जगन्नाथ अवतार रूप में बुद्ध प्रतिमा थी। इन्द्र पूर्व दिशा के लोकपाल थे। अतः असम के राजा भास्करवर्मन (महाभारतकालीन भगदत्त की ६०वीं पीढ़ी) इन्द्र रूप में शामिल थे।

(७) अनंग भीमदेव प्रायः १२०० ई. में अनंग भूईमदेव ने वर्तमान जगन्नाथ मन्दिर बनवाया। पुराना मन्दिर नीची भूमि पर था, जिसका एक भाग अभी भी दबा हुआ है। किन्तु रामानुजाचार्य (१०००-११३० ई.) ने इसकी प्राण प्रतिष्ठा की थी अतः इसका समय कुछ पहले होना चाहिए-सम्भवतः गंग राजा द्वारा।

दारु ब्रह्म-जगन्नाथ को ६ अर्थों में दारु ब्रह्म कहा गया है-
स्कन्द पुराण-वैष्णव उत्कल खण्ड,अध्याय ४-
देवासुर मनुष्याणां गन्धर्वोरगरक्षसाम्। तिरश्चामपि भो विप्रास्तस्मिन्दारुमये हरौ॥७१।
सर्वात्मभूते वसति चित्तं सर्वसुखावहे। उपजीवन्त्यस्य सुखं यस्याऽनन्य स्वरूपिणः॥७२॥
ब्रह्मणः श्रुतिवागाहेत्येदत्राऽनुभूयते। द्यति संसार दुःखानि ददाति सुखमव्ययम्॥७३॥
तस्माद्दारुमयं ब्रह्म वेदान्तेषु प्रगीयते। नहि काष्ठमयी मोक्षं ददाति प्रतिमा क्वचित्॥७४॥
अध्याय २८-आद्यामूर्तिर्भगवतो नारसिंहाकृतिर्नृप। नारायणेन प्रथिता मदनुग्रहतस्त्वयि।३८॥
दारवी मूर्तिरेषेति प्रतिमाबुद्धिरत्र वै। मा भूत्ते नृपशार्दूल परब्रह्माकृतिस्त्वियम्॥३९॥
खण्डनात् सर्व दुःखानां अखण्डानन्द दानतः। स्वभावाद्दारुरेषो हि परं ब्रह्माभिधीयते॥४०॥
इत्थं दारुमयो देवश्चतुर्वेदानुस्रतः। स्रष्टा स जागतां तस्मादात्मानञ्चापिसृष्टवान्॥४१॥

(१) विश्व का आधार-

किं स्विदासीदधिष्ठानमारम्भणं कतमत्स्वित् कथासीत्।
यतो भूमि जनयन् विश्वकर्मा वि द्यामौर्णोन् मह्ना विश्वचक्षाः॥ (ऋक् १०/८१/२, तैत्तिरीय संहिता ४/६/२/११)

(२) विश्व की निर्माण सामग्री-

ब्रह्म वनं ब्रह्म स वृक्ष आसीत् यतो द्यावा पृथिवी निष्टतक्षुः।
मनीषिणो मनसा विब्रवीमि वो ब्रह्माध्यतिष्ठद् भुवनानि धारयन्॥ (तैत्तिरीय ब्राह्मण २/८/९/१६)

(३) संसार समुद्र में तैरते विश्व पिण्ड-

अदो यद्दारुः प्लवते सिन्धोः पारे अपूरुषम्।
तदारभस्व दुर्हणो येन गच्छ परस्तरम्॥ (ऋक् , शाकल्य शाखा १०/१५५/३)

(३) निरपेक्ष द्रष्टा-यस्मात् परं नापरमस्ति किञ्चित्, यस्मान्नाणीयो न ज्यायोऽस्ति कश्चित्।
वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येनेदं पूर्णं पुरुषेण सर्वम्॥ (श्वेताश्वतर उपनिषद् ३/९)

(४) मूल-क्रिया फल का अनन्त क्रम-ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्। (गीता, १५/१)

(५) संकल्प-क्रिया-फल का चक्र-

वासना वशतः प्राणस्पन्दस्तेन च वासना। क्रियते चित्तबीजस्य तेन बीजाङ्कुरक्रमः॥२६॥
द्वे बीजे चित्तवृक्षस्य प्राणस्पन्दनवासने। एकस्मिँश्च तयोः क्षीणे क्षिप्रं द्वे अपि नश्यतः॥२७॥
द्वे बीजे चित्तवृक्षस्य वृत्तिव्रततिधारिणः। एक प्राण परिस्पन्दो द्वितीयं दृढ़भावना॥४८॥ (मुक्तिकोपनिषद्, अध्याय २)
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः। अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके॥२॥
न रूपमस्येह तथोपलभ्यते, नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा। अश्वत्थमेनं सुविरूढ़मूलमसङ्गशस्त्रेण दृढ़ेन छित्वा॥३॥ (गीता, अध्याय १५)

जगन्नाथ-चक्र-

विश्व के प्राकृतिक चक्रों के अनुसार ही मनुष्य के यज्ञ होते है। संवत्सर रूपी यज्ञ के आरम्भ का यह आयोजन था। मनुष्य के जन्म-मरण का भी चक्र है। मनुष्य का पार्थिव शरीर माता के गर्भ में १० दिन (चन्द्र की १० परिक्रमा = २७३ दिन) रहता है। प्रेत शरीर चान्द्र मण्डल का भाग है (विधूर्ध्व भागे पितरो वसन्ति)। वह पृथ्वी के १० अक्ष भ्रमण या १० दिन में बनता है, जिसे दशाह कहते हैं। अतः जगन्नाथ का उन्मेष आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा को होता है। ९ दिन यात्रा होती है, जो सृष्टि निर्माण के ९ सर्ग या चक्र हैं। दशमी को जब जगन्नाथ अपने मन्दिर लौटते हैं, तो चक्र पूरा होता है।

अथ यद्दशरात्रमुपयन्ति। विश्वामेव देवां देवतां यजन्ते। (शतपथ ब्राह्मण, १२/१/३/१७)
प्रजापतिर्वै दशहोता (तैत्तिरीय ब्राह्मण, २/२/१/१)
यज्ञो वै दशहोता (तैत्तिरीय ब्राह्मण, २/२/११/६)
विराड् वा एषा समृद्धा यद्दशाहानि (ताण्ड्य महाब्राह्मण, ४/८/६)

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