जानिए क्या है आत्म विद्या विमर्श ?

अथर्ववेद के  मुण्डकोपनिषद् के आधार पर पराविद्या का विचार कर रहे हैं । शौनक महर्षि गृहस्थाश्रम में रहते हुए भी विधिपूर्वक अङ्गिरस् महर्षि के पास जाकर उस अनुभव को प्राप्त करने की इच्छा प्रकट करते हैं जिसके साक्षात्कार करने से सब कुछ जान लिया जाता है । उसको जान लेने के बाद कुछ भी अज्ञात नहीं रह जाता । अब अङ्गिरस् महर्षि शौनक को जवाब देते हैं –

” तस्मै स होवाच द्वे विद्ये वेदितव्ये इति ह स्म

यद् ब्रह्मविदो वदन्ति परा चैवापरा च ॥ ”

ऐसे विधिपूर्वक आये हुए महर्षि शौनक के प्रति यह प्रसिद्ध है कि अङ्गिरस् महर्षि ने यह जवाब दिया । यह जवाब देने का तरीका अन्यत्र भी श्रुतियों में आया था इसलिये प्रसिद्ध है । इस संसार में दो प्रकार के ज्ञान प्रसिद्ध हैं , जो जानने लायक हैं । अब हमारे मन में शंका होती है कि दो ही विद्या कैसे जानने लायक है ? हमारे चौथी कक्षा के बच्चे सत्रह विषयों की किताबें लेकर स्कूल जाते हैं । इसलिये दो ही विद्याएँ जानने लायक हैं , यह कैसी बात है । इसलिये कहा ” ब्रह्मविदो वदन्ति ” वे के अर्थ को जानने वाले , जो वास्तविक चीज को जानने  वाले हैं , उनका यह कहना है अर्थात् वेदज्ञान दो विषयों का ही ज्ञान है , बाकी सब लौकिक ज्ञान है । वेद के रहस्य को जानने वाले बताते हैं कि दो ही विद्याएँ हैं क्योंकि वे परमार्थदर्शी हैं । वे इस बात को जानते हैं कि जीव का वास्तविक कल्याण किसमें हैं । संसार के चक्र में फँसाने वाले ज्ञान को ज्ञान नहीं कहा जा सकता । जिस प्रकार किसी व्यक्ति के विषय में कहा जाये कि यह बड़ा भारी विद्वान् है । किस विषय में विद्वान् है ? चोरी के विषय में माहिर है । बड़ी – से – बड़ी तिजोरी तोड़ सकता है । बड़ी – से – बड़ी ए . टी . एम मशीन को उखाड़ कर ले जा सकता है । अब तक तेरह बार जेल जा चुका है और केवल 27 साल उम्र है। तो क्या यह बात गले उतरेगी कि यह व्यक्ति बड़ा विद्वान् है ? आप कहेंगे कि यह तो बड़ा अज्ञानी है । यह क्या ज्ञान हुआ ! यह तो बड़ा बुरा ज्ञान है इसलिये छोड़ो इसे । इसी प्रकार यदि किसी व्यक्ति के बारे में कहा जाये कि यह व्यक्ति बड़ा कुशल है । यह एक हजार रुपये में ही किसी का भी गर्दन काट सकता है । किसी की तरफ भी उंगली उठा दे तो काम बना देता है । तो उसको ज्ञानी मानोगे या अज्ञानी ? इसलिये ज्ञान का मतलब उस चीज को  जानना है जो कल्याण करे। उसको नहीं जानना चाहिये जो अकल्याण करे ।

अब विचार करिये , संसार के जितने ज्ञान हैं ये बार – बार जन्म – मरण के चक्र में फँसाते हैं । इसलिये ये तो नुकसान करते हैं । ठीक है , इस ज्ञान से कुछ समय के लिये धन आ जाता है , लेकिन यह धन – दौलत कोई परमार्थ करने वाला नहीं है , कयोंकि यह बार – बार जन्म – मरण के चक्र में डालता है । विचार करिये कि आप किस वकील को श्रेष्ठ मानते हैं ? जो तुम्हारी सही वकालत करे अथवा जो तुम्हारे झूठा मुकदमा लड़े उसे । गाँधी जी दक्षिणी अफ्रीका वकालत करने गये थे । लेकिन वे कहते थे, मैं झूठा मुकदमा नहीं लड़ूँगा, इसलिये उनको वहाँ से वापस आना पड़ा । वे वकालत में सफल नहीं हो पाये भले ही राजनीति में सफल हो गये । इसलिये वकालत का जो विद्यालय है वह क्या किसी परमार्थ को सिखाने वाला है , या वह अपरमार्थ के लिए है ? किसी के लड़के की भर्ती चार्टर्ड एकाउंटेंसी में हो जाये तो वह बड़ा प्रसन्न होकर कहता है ” हमारा लड़का चार्टर्ड एकाउंटेन्सी में भर्ती हो गया है । उसमें पाँच हजार बच्चों में दो ही चुने जाते हैं । हमारा बच्चा चुन लिया गया है । लेकिन वह लोगों को  झूठे हिसाब – किताब बताने के लिए ही तो चुना गया है । क्योंकि आगे उत्तीर्ण होकर जन्म भर लोगों को चोरी और ठगना ही तो है । यदि वह कहे कि मैं ठीक हिसाब – किताब लिखूँगा तो उसको कौन रखेगा । इसलिये जो परमार्थी हैं वे सब इसको विद्या नहीं मानते । दो ही विद्याएँ है जो मनुष्य का कल्याण करती है । कौन – कौन सी हैं वे विद्याएँ – ” परा चैवापरा च । ”

परमात्मा को जानने वाली विद्या पराविद्या कही जाती है । अपराविद्या वह है जो तुम्हें धर्म और अधर्म , कर्तव्य और अकर्तव्य को बतावे । कर्म के साधनों को बताये , धर्म के विषय में बताये । अपराविद्या वह है जो तुभको कर्तव्य अकर्तव्य बतलाती है , क्या करना चाहिये और क्या नहीं करना चाहिये । जो करना चाहिये उसका तरीका क्या है और उसका फल क्या है । इन सब को बताने वाली को अपराविद्या कहते हैं । क्या कर्तव्य है और क्या ज्ञातव्य है , बस इन्हें बताने वाली दो ही विद्याएँ हैं । मनुष्य क्या है ? ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति वाला है । ज्ञानशक्ति षे जानते हैं और क्रियाशक्ति के द्वारा करते हैं। जब तक जान है तब तक कुछ जान रहे हो अथवा क्रिया कर रहे हो । कोई भी क्षण ऐसा नहीं  जब कोई न कोई काम न कर रहे हो या कुछ जान न रहे हो । परन्तु क्या करना चाहिये और क्या जानना चाहिये , यह नहीं जानते । इसलिये हमेशा अपना ही नुकसान करते हैं । हम उन चीजों को जानते हैं जो नुकसान करें।

वेद ही ऐसी विद्या है जो क्या करना चाहिये यह बतलाता है । अङ्गिस् महर्षि ने शौनक से कहा कि केवल दो विद्याएँ जानने लायक हैं । यह सुनकर शौनक के मन में संदेह होना सहज ही था । उन्होंने सोचा मैंने पूछा था कि किसको जानने से सब कुछ जान लिया जाता है , लेकिन ये जवाब दूसरा दे रहे हैं । जो बात पूछी नहीं है उसको बोलने लगे । यह बात ठीक नहीं । इसके पीछे रहस्य है । क्या जानने से सब नहीं जाना जाता , यह कहना जरा ठीक है , यह कहने से पहले कि क्या जानने से सब कुछ जाना जाता है ।

” तत्रापरा ऋग्वेदो यजुर्वेद सामवेदोऽथर्ववेदः शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिषमिति । ”

दो विद्याएँ ही जानने लायक हैं । उसमें अपराविद्या क्या है ? ऋग्वेद , यजुर्वेद , सामवेद , अथर्ववेद और चारों वेदों के अर्थ लगाने के जो साधन शिक्षा आदि । शिक्षा अर्थात् वेद के उच्चारण का ढ़ंग । एक ही शब्द दो प्रकार के उच्चारण से दो  प्रकार का अर्थ देता है। इसलिये वेद को जानने के लिए जरूरी है कि यह जाना जाये कि उच्चारण कैसे होना चाहिये । एक ही शब्द है इन्द्रशत्रु । इसे आद्युदात्त बोलें तो अन्य अर्थ होता है और अन्त्योदात्त बोले तो अन्य ही अर्थ हो जाता है । यद्यपि संसार की सभी भाषाओं में उच्चारणभेद होता है । परन्तु वेद में यह जानना बहुत जरूरी है । अन्यथा वेद को समझ नहीं पाओगे । अन्य भाषाओं में सांसारिक बातों को बताया जाता है इसलिये यदि उसको नहीं समझोगे तो केवल सांसारिक हानि ही होगी । परन्तु वेद धर्म के भाव को बताता है इसलिए यदि इसको समझने से चूक गये तो भारी नुकसान उठाओगे । जितना भी धार्मिक कर्म पूजा , हवन आदि है सब को करने का तरीका जिन ग्रन्तों में बताया गया है वे ” कल्पसूत्र ” हैं । व्याकरण वेद के पदों को कैसे समझा जाये यह बताता है । निरुक्त शब्दों के अर्थ लगाने का तरीका है । वैदिक मंत्रों में अक्षरविन्यास के नियम छन्दःशास्त्र से जाने जाते हैं । कर्म के लिये उचित समय को निर्धारित करने के लिए ज्योतिष का प्रयोग है । ये जो छह हैं ये वेदों का अर्थ लगाने के लिए जरूरी हैं । चारों वेद धर्म और अधर्म को बतलाने वाले हैं ।  अब ये सारे के सारे अपराविद्या में गिने गये ।

शंका होती है कि वेद है तो ब्रह्म को बतलाने वाला । यदि वेद ने जो बताया वह सब अपराविद्या है तो क्या ज्ञान वेद से विपरीत नहीं ? स्मृतियों में बतलाया है कि वेद से बहिर्भूत जो चीज होती है वह नुकसान का कारण होती है । यह भी तो वेद के अन्तर्गत ही है । उपनिषद् आदि भी वेद आदि से बाहर नहीं हैं । यदि इन सबको अपराविद्या कह दिया तो बचा क्या ? पराविद्या किसको कहेंगे? परन्तु पराविद्या उसको कहते हैं जिससे परमेश्वर की प्राप्ति हो अर्थात् साक्षात्कार होता है ।

” अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते । ”

शब्द वेदों के ही हैं । उपनिषद् के पढ़ने में जो ज्ञान है वह अपराविद्या है । इससे साक्षात्कार नहीं होता है । उसी में बताये हुए का साक्षात्कार जिससे होता है , उसको पराविद्या कहते है । धर्म अपराविद्या है और साक्षात्कार को परविद्या कहते हैं । शब्दज्ञान को अपराविद्या और ब्रह्मसाक्षात्कार को पराविद्या कहते हैं। यह समझना जरूरी है । क्योंकि प्रायः लोग यह समझते हैं कि शब्द का ज्ञान हो गया तो विषय जान लिया । लेकिन इसके द्वारा लोग ज्ञानी नहीं होते । जो शास्त्र पढ़ता  है समझता भी है , लेकिन किसलिये ? भोगों की प्राप्ति के लिये , वह पराविद्या वाला नहीं है । शिल्पिवत् भाव से लोग शास्त्र का अध्ययन करते हैं । जैसे एक कारीगर बड़ी सुन्दर मूर्ति बनाता है, जिससे उसको बेचने से अर्थ की प्राप्ति होती है । इसी प्रकार से मकान बनाने वाला बढ़िया मकान बनाता है , लेकिन रहने के लिये नहीं , बल्कि उससे अर्थ प्राप्त होता है । इसी प्रकार लोग शास्त्र को पढ़ते हैं , समझते हैं , लेकिन शिल्पी की तरह ; जीवन में उसको लाने के लिये नहीं । ऐसे लोगों को ब्रह्म की प्राप्ति कभी नहीं हो सकती । वेदादि शास्त्रों को बहुत लोग पढ़ते हैं लेकिन उसको जीवन में उतारने के लिए नहीं । ऐसे लोगों में कर्मस्पन्दों में ज्ञान फलित हुआ नहीं दीखता । मोटी भाषा में समझने के लिए – आपने कथा सुनी । वही कहा गया कि सबके अन्दर रहने वाला एक आत्मा है । आपने कहा ” हाँ जी महाराजजी ! ” कथा सुनकर उतरे , उस पर विचार भी कर रहे हैं । वापस आने के लिये रिक्सा – टैम्पो किया । उससे उतरे । रिक्शेवाले ने कहा बीस रुपये हुए । अब आप रोज आते हैं और रोज बीस रुपये देते भी हैं । लेकिन रोज रिक्शे वाला पच्चीस रुपये माँगता था उसे बीस  रुपये देते थे । आज रिक्से वाले ने बीस रुपये कहा , फिर भी हम कहते हैं कि ” अरे तुम तो ज्यादा मांग रहे हो भाई , पन्द्रह रुपये ले लो । ” अब अगर कोई धीरे से पूछे ” यदि ऐसा ही व्यवहार तुमसे किया जाये तो । ” हम दूसरों के साथ वह व्यवहार कर रहे हैं जो अपने साथ नहीं करवाना चाहते ।

इसी प्रकार किसी वैश्य के यहाँ पण्डित जी आये । तुमने कहा पण्डित जी भोजन कर लो। पण्डित जी कहते हैं ” नहीं मैं आपके हाथ का बना हुआ भोजन नहीं करूँगा । ” तुम कहते हो ” इसमें क्या है पण्डित जी . हम तो शुद्ध ढंग से भोजन बना कर दे रहे हैं । पूरी सफाई रखते हैं । हभारे में क्या कमी है ? ” अन्त में पण्डित जी कह देते हैं ” नहीं . रहने दो , हमें आज भूख नहीं है । ” अब विचार करो , तुम यह नहीं चाहते कि ब्राह्मण तुम्हें यह कहे कि मैं तुम्हारे हाथ का बना नहीं खाता । अब यदि कोई चमार कह दे ” मेरे यहाँ खा लो हमने बड़ी सफाई से बनाया है । ” तो तुम नहीं खाते । यदि तुम नहीं चाहते कि ब्राह्मण तुम्हें कहे कि मैं तुम्हारे हाथ का बनाया हुआ खाना नहीं खाऊँगा तो यदि चमार ने कहा है तो कौन – सा गलत कह दिया ।

एक आत्मा है इस बात को जो जानने  वाले हैं उन्हें यदि कोई कहे मुझे मत छूओ तो यह कहना बुरा लगता है तो दूसरों को वे ऐसा कहेंगे तो उनको भी बुरा लगेगा। पर इसका उन्हें ख्याल नहीं । इस प्रकार सारे व्यवहार में दिन में कितनी बार कर्मस्पन्दन होता है एक आत्मा का ? इस प्रकार देवरानी और जेठानी भी अपने बच्चों में यही सोचती है कि मैं अपने की चिन्ता करूँ वह अपने की करे । कथा सुनी , यह सुना कि आत्मा एक है , मन में जँचा कि आत्मा एक है लेकिन कर्मस्पन्दनों में नहीं है । देवरानी सोचती है मैं अपने की चिन्ता करूँ , जेठानी अपने की करेगी । इसी प्रकार सब बातें हैं । हम पाठ करते हैं गीता का । भगवान् ने क्रोध को महान् वैरी बताया है । लेकिन हमें छोटी से छोटी बात पर क्रोध आता है , तो कर्मस्पन्दन कहाँ हुआ ? इसीलिये कहा कि कर्मस्यन्दनों में जिसका ज्ञान फलीभूत नहीं होता , व्यसन आदि भोग्य पदार्थों की उपलब्धि से सन्तुष्ट हो जाये , वह ज्ञानबन्धु कहा जाता है । ज्ञानबन्धु अपराविद्या को प्राप्त कर सकता है परन्तु पराविद्या को नहीं । आचार्यपाद् शङ्कर स्वामी जी कहते है – मनुष्य बढ़िया से बढ़िया वीणा बजाना , गान करना भी जाता है तो उसको देखकर राजा उपहार दे  देगा , परन्तु अपना राज्य तो नहीं दे देगा । इस प्रकार जो परमात्मा को जीवन में नहीं लाता उसको मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती ।

एक बार देवताओं में एक प्रतियोगिता हुई । उन्होंने कहा हम एक यज्ञ करेंगे जिसमें सभी को कार्य करना पड़ेगा । यज्ञ समाप्त होने पर जो नहीं थकेगा वही श्रेष्ठ होगा । इस प्रकार यह यज्ञ समाप्त हुआ और अन्त में भगवान् श्रीविष्णु ही नहीं थके । अग्धि ने शार्ङ्ग नामक धनुष दिया और कहा कि इसका प्रयोग जिस पर करोगे , निश्चित रूप से यह उसे मार देगा । श्रीविष्णु थके हुए थे, धनुष पाने पर उन्होंने सोचा पहले देवताओं को ही मार कर देखा जाये । वे देवताओं को मारने चले । देवता लोग भागे । वे भगवान् शङ्कर की शरण में गये। भगवान् शङ्कर ने कहा थोड़े समय तक छिपे रहो । भगवान् ढूँढते हुए दक्षिण भारत पहुँचें । वे थके हुए थे ही । भगवान् शङ्कर ने उन पर तिरोधान शक्ति नामक शक्ति का प्रयोग कर दिया । जिससे वे थक कर लेट गये और धनुष को सिर के नीचे रख लिया । उनको नीन्द आ गयी । भगवान् शङ्कर ने कहा अब सो गये अब काम हो जायेगा । भगवान् शङ्कर वल्मीक { बाँबी } का रूप लेकर स्थिर हो गये । देवता लोग चीटियाँ { दीमक } बन गये । वे लोग धनुष को काटने लगे । धनुष की डोरी कट गयी तो क्योंकिं धनुष तना हुआ था इसलिए जोर से सीधा हो गया , जिससे  श्रीविष्णु का सिर कट गया । उनके सिर कट जाने पर लक्ष्मी जी ने भगवान् शङ्कर जी से प्रार्थना की । भगवान् शङ्कर ने कहा ” सिर को दुबारा जोड़ देते हैं । ” उन्होंने सिर को धड़ से जोड़ दिया । भगवान् श्रीविष्णु ने भगवान् शङ्कर की वल्मीकनाथ नाम से प्राथना की क्योंकि वे वल्मीक रूप में ही थे । लक्ष्मी जी ने और भगवान् श्रीविष्णु ने वर माँगा ” हमें एक पुत्र हो । ” लक्ष्मी जी ने पहले भी भगवान् शङ्कर जी से प्रार्थना की थी । उन्होंने देवी जी की ओर ध्यान नहीं दिया । इसलिये उन्होंने नाराज होकर शाप दिया ” इनके आशीर्वाद से पुत्र तो होगा लेकिन वह जल कर मर जायेगा । ” इसलिए भगवान् श्रीविष्णु और लक्ष्मी दोनों ने मिलकर पावती जी , भगवान् शङ्कर और उनके पुत्र कार्तिकेय तीनों का पूजन किया । जिससे भगवती प्रसन्न हो गयीं । उन्होंने कहा मेरे शाप से वह जलेगा तो , लेकिन फिर बच जायेगा । इस प्रकार भगवान् श्रीविष्णु के पुत्र कामदेव { मन्मथ } हुए । वे भगवान् शिव के तीसरे नेत्र से जले । लेकिन पुनः जीवित हो गये । परन्तु वह शिव अनुग्रह से अनंग रहा इसीलिये काम का कोई निश्चित अंग नहीं होता ।

देवराज इन्द्र के ऊपर जब  दैत्यों ने चढ़ाई की तो भगवान् श्रीविष्णु ने उन्हें ” सोमस्कन्ध ” की मूर्ति को दिया और कहा ” इसकी पूजा करो विजय होगी। ” देवेन्द्र ने पूजा की तो भगवान् श्रीविष्णु ने मुचुकुन्द को इन्द्र की सहायता के लिये भेजा । मुचुकुन्द की सहायता से इन्द्र दैत्यों पर विजयी हुए । विजयी होने पर देवेन्द्र बड़े प्रसन्न हुए । देवेन्द्र ने कहा ” तुम मेरे राज्यचिह्न – श्वेतछत्र , कल्पवृक्ष व कामधेनु – को छोड़कर जो चाहो मांग लो । ” इसके पहले ही दिन देवेन्द्र को उन्होंने सोमस्कन्ध की पूजा करते हुए देखा था । देवेन्द्र ने न माँगने वाली वस्तुओं में मूर्ति तो गिनाई नहीं थी । इसलिये उसने कहा कि ” सोमस्कन्ध की मूर्ति हमें दे दो । ” देवेन्द्र ने सोचा यह मूर्ति तो भगवान् श्रीविष्णु से मिली थी। इसी से तो मुझे विजय मिली । इसको तो नहीं देना है। सब चीजों में मैंने इसको गिनाया ही नहीं , यह तो बड़ी भारी भूल हो गयी । देवेन्द्र ने कहा ठीक है यह मूर्ति मैं तुम्हें कल दूँगा । देवेन्द्र ने अपनी माया के द्वारा ठीक उसी तरह की छह मूर्तियाँ बना दीं । सातों मूतियों को वहाँ रख दिया । देवेन्द्र का मतलब था ” मैं इनसे कहूँगा जो पसन्द हो  ले जाओ , तो वे पहचान नहीं पायेंगे । ” परन्तु मुचुकुन्द भगवान् शङ्कर का भक्त था । उन्होंने स्वप्न में बता दिया कि अमुक सुगन्ध वाली मूर्ति ही असली मूर्ति है । अगले दिन देवेन्द्र ने सातों मूर्तियाँ सामने रख दीं । मुचुकुन्द ने सुगन्ध से पहचान लिया कि कौन सी मूर्ति असली है । इन्द्र को बड़ी शर्म आयी । शर्म के मारे देवेन्द्र ने कहा ” आप सातों मूर्तियाँ ले जायें । मुचुकुन्द सातों मूर्तियों को ले आया । मूल मूर्ति को जहाँ मिली थी वहाँ स्थापित कर दिया और बाकी मूर्तियों को भिन्न – स्थानों पर स्थापित कर दिया । इस प्रकार वह मूर्ति पुनः पृथ्वी पर आ गयी ।

इन्द्रियों को भी देव कहा जाता है । देवताओं में कौन श्रेष्ठ है , कौन सी चीज नहीं थकती ? ” मैं ” का ज्ञान कभी नहीं थकता । इसलिये ” मैं ” को श्रेष्ठता मिली । मैं चाहता है मेरा सबके ऊपर नियन्त्रण हो जाये । जबकि मैं तो खुद ही एक वृत्ति है । इसलिये देवता शङ्कर भगवान् के पास गये । शरीर के अन्दर चेतन रूपी सिर है । जब हम पहले जानने में प्रवृत्त होते हैं तो जड शरीरादि व उससे मिले – जुले चेतन को पृथक नहीं जान पाते । जब दोनों अलग हो गये तब पता लगा ।  अब उन्हें व्यवहार के लिये पुनः जोड़ दिया जाता है । व्यवहार करोगे तो जड और चेतन दोनों रहेंगे । परन्तु अलग करने से दोनों को जान लिया । उन्हीं से ” मन्मथ ” उत्पन्न होता है । जब व्यवहार करते हो तो कामना की आवश्यकता होती है । परन्तु कामना ऐसी होनी चाहिये जो जल चुकी हो । जला हुआ ही काम होना चाहिये । इसलिये किसी चीज की कामना हो तो पहले कामना को जला लो , तभी व्यवहार करो । ऐसा जो सोमस्कन्ध वह इन्द्र की ही भाँती मदद करता है और पार्थिव शरीर में आता है । वह फल पाता है तो इच्छाओं से व्यवहार करते समय अन्तःशीतल रहता है । जब पराविद्या की प्राप्ति हो गयी तो अन्तःशीतल ही रहता है । कामना होने पर भी वह शीतल ही है । कामना पूरी ही हो ऐसी लपट नहीं उठती । उसकी शान्ति अकृत्रिम है । साधारण मनुष्य के अन्दर अशान्ति और बाहर शान्ति होती है । साधक विचार करता है तो शान्ति होती है परन्तु जो बिना कुछ किये ही शान्त रहता है वही ज्ञानी है ।

श्रवण – मनन से जो वृत्ति उत्पन्न होती है वह पराविद्या है । उससे तत्त्व का ज्ञान मिल जाता है । यहाँ वेद शब्द से वेदों के शब्द कहे गये हैं । भगवान् भाष्यकार शङ्कर स्वामी जी कहते है –

” वेदशब्देन तु सर्वत्र शब्दराशिर्विवक्षितः । ”

अपराविद्या के विषय वेद के अक्षर ही हैं । शब्दराशि तो सब अपराविद्या में आ गयी । जो साक्षात् ब्रह्म का ज्ञान देते हैं वे शब्द भी पराविद्या है । कर्मविषयक बोध की अपेक्षा अदिक प्रयत्न करने से ही वेदशब्दों से ब्रह्मविषयक बोध मिलता है , यह सूचित करने के लिये अपरा से परा को पृथक कर दिया होने से उपनिषदों की अवैदिकता भी नहीं होती ।

वेद कैसा है ? उसमें समग्र बातों का प्रकटन करने की शक्ति सहज है। वेद में यह सामर्थ्य कहीं से आयी नही है । कार्य से पता चल जाता है कि सब चीजों का ज्ञान उससे हो जाता है । वह सबका – शेष का भी , अशेष का भी – प्रकाशन करता है । परमात्मा अशेष है । सब चीजें परमात्मा के लिये है पर वह किसी के लिये नहीं है । अतः मोक्ष भी परमात्मरूप है । उस अशेष परमात्मा का प्रतिपादक वेद पराविद्या कहा जा सकता है । इस प्रकार जहाँ – जहाँ पर लक्ष्यार्थ से उस परमार्थतत्त्व का प्रकाशन होता है वहाँ पराविद्या हो जाती है । वेद जब परमात्मा का साक्षात्कार करा दे तब वह पराविद्या है और उसके अतिरिक्त किसी का प्रकाशन करे तो वही अपराविद्या है ।  पराविद्या ही वस्तुतः ज्ञान है ।

एकमात्र पराविद्या से जो परमात्मा का ज्ञान होता है वही एकमात्र ज्ञान है । उससे भिन्न तो सब ज्ञान का आभास मात्र है । ज्ञान नहीं । इसका कारण क्या है ? कारण यह है कि मूल अज्ञान को हटाये बिना ही ये ज्ञान हो जाते हैं ।

सपने में सड़क पर जा रहे थे तो एक साँप दिखाई दिया । हमने टार्च चलाकर देखा तो पता लगा कि वह साँप नहीं रस्सी है । इस प्रकार हमको ज्ञान हो गया कि वह साँप नहीं रस्सी है । लेकिन आँख खुलने पर पता चला कि वहाँ तो रस्सी भी नहीं है ! जिस प्रकार उस समय लग रहा था कि साँप नहीं रस्सी है किन्तु जगने पर पता कि वहाँ पर तो रस्सी भी नहीं है , इसी प्रकार यद्यपि परमात्मज्ञान के पहले लगता है कि ज्ञान हो गया लेकिन वह भी ज्ञान का आभास मात्र है । कयोंकि उस समय निद्रा का मूल अज्ञान नहीं गया है । मूल अज्ञान है परमात्मा को नहीं जानना । क्योंकि जो सच्ची चीज है उसको नहीं जानते इसीलिये उसको परा अविद्या समझना चाहिये , अतः ज्ञानाभास – अपराविद्या है ।

डॉ. दीनदयाल मणि त्रिपाठी 

( प्रबंध सम्पादक )

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