जानिए भोग क्या हैं ?

नन्द किशोर वैश्य
भोग दो प्रकार के होते हैं।1-प्राकृत भोग और 2- दिव्यभोग।
1-प्राकृत भोग~
प्राकृत भोग वे हैं जो अनायास अर्थात विना प्रयत्न के प्राप्त है वे हैं प्रारब्धाधीन भोग।इस हेतु श्रीमद्भागवत के 6/6/3,4 के श्लोक में प्रह्लाद अपने दैत्य सहपाठी बालको से कहते हैं~
सुखमैन्द्रियकं दैत्या देहयोगेन देहिनाम्।
सर्वत्र लभ्यते दैवाद्यथा दुःखमयत्नत:।।3
तत्प्रयासों न कर्तव्यो यत् आयुर्व्यय: परम्।
न तथा विन्दते क्षेमं मुकुन्द चरणाम्बुजम्।।4
हे मेरे दैत्य मित्रों जितनेभर देह को पालने पोसने के लिए वे इन्द्रियों के सुखरूप है और देह की प्रकृति अनुसार वे देह को पालने के लिए स्वतः योग करते है।उनकी उप्लब्धिता सर्वत्र है और उपलब्ध भी होते रहते हैं कैसे? जैसे विना प्रयासों के, विना प्रयत्न के दुःख स्वतः ही देह से योग करते रहते हैं।
इस लिए इन्द्रियों के सुख के भोगों के योग का प्रयत्न नही करना चाहिए।इनके प्राप्ति के प्रयास में जो यह परम् आयु भगवत भक्ति हेतु मिली है उसके नाश के अतिरिक्त और कुछ नही है।भगवान के चरणकमल के अतिरिक्त क्षेम रूप अप्राप्ति की प्राप्ति के अतिरिक्त कहीं भी कुशलता की प्राप्ति नही है।उसी के प्राप्ति का प्रयत्न करते रहना चाहिए।
यदि स्वकर्मों के द्वारा पूर्वार्जित प्रारब्ध सुख का भोग है तो सुख मिलेगा, यदि दुःख का भोग है तो दुःख भोगने को मिलेगा।जो प्रारब्धाधीन है वह तो स्वतः ही मिलते जायेंगे।विना प्रारब्ध के कितने ही प्रयास किये जाएँ वे प्राकृत भोग भी उपलब्ध नही हो सकते।माता कौशल्या राम के बन जाने और दशरथ के निधन पर विलाप करते हुए कहती हैं~
“हा राम! हा में रघुवंशनाथ, जातोsसि में त्वं परत: परात्मा।
तथापि दुःखं न जहाति मम् वै विधिर्बलीयान् इति में मनीषा।।
हे राम! हे मेरे रघुकुल के स्वामी मैंने तुम जैसे परम् परमात्मा को जन्म दिया।अर्थात अपनी कोख से परम्परमात्मा को भी जन्म देने पर भी मेरे दुःख कम नही हो रहे हैं।मैंने यह मनन करके जान लिया है कि विधि अर्थात उन परमात्मा के नियम ही बलवान होते है।
प्रारब्ध के भोग दैवाधीन होते हैं गीता 3/9 से 15 तक द्रष्टव्य हैं।वर्तमान देह में प्राकृत भोग प्रारब्ध के अधीन है, तो आगे होने वाली देहों में प्राकृतभोग देवों के अधीन है।देह प्राप्त होने पर सभी प्राकृतभोग प्रकृति से हीउत्पन्न हो
कर प्रकृति से ही उत्पन्न देह केही लिए परमात्मा ने प्रकृति से उत्पन्न किये हैं।इसका विस्तृत व्याख्यान विष्णुपुराण के दूसरे अंश भरत चरित के ऋभु निदाघ के आख्यान और छठे अंश में दिया है।विस्तृत होने से यहां देना सम्भव नही है।
2-दिव्य-भोग:-
महर्षि पातंजलि के योगदर्शन 3/36 में है~
“ततः प्रातिभश्रावणवेदनादर्शास्वादवार्ता जायन्ते”
स्वार्थ में संयम करने से प्रातिभ,श्रवण,वेदन,आदर्श,स्वाद और वार्त्ता नामक छै सिद्धि की प्राप्ति होती है।
1-प्रातिभ नाम की दिव्यदर्शन सिद्धि है(3/33)इसमें भूत भविष्य और वर्तमान एवं सूक्ष्म ,ढँकी हुई, तथा दूरदेश में स्थित वस्तुएं प्रत्यक्ष हो जाती हैं।
2-श्रावण नामकी दिव्य शब्द सुनने की शक्ति आ जाती है जिसके द्वारा अनहद नाद ध्वनि आदि को स्पष्ट सूना जाता है।
3-वेदन नामकी दिव्य स्पर्शशक्ति के अनुभव को अनुभूत कराती है।
4- आदर्श इसमें दिव्य दर्शन करने की क्षमता रूप शक्ति आ जाती है, जिसके द्वारा दहर आकाश और सहस्रार चक्र के दर्शन की क्षमता प्राप्त हो जाती है।
5-आस्वाद इस सिद्धि से दिव्य रसों का अनुभव करने की शक्ति आ जाती है।
6-वार्ता इसमें दिव्य गन्ध का अनुभव करने की शक्ति आ जाती है।
गीता 9/20 में है~
ते पूण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकमश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान्।
वे पुण्यकर्मी यज्ञादि पूण्य कर्मों के फलरूपसे देवताओं के लोक में दिव्य से दिव्य भोगों को खाते हैं।
उनकर्मों के फल क्षीण होने पर उन कर्मों से बने प्रारब्ध के फल भोगने योग्य योनि में जन्म ले कर उन कर्मों से निर्मित प्रारब्ध को इस लोक में सुख दुःख रूप में भोगता है।प्राकृत फल से प्राकृत भोगने हेतु पुनः जन्म लेते हैं।
हरि ॐ।

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