जानिए वेद में अन्नों का उल्लेख

अरुण कुमार उपाध्याय (धर्मज्ञ)

वेद में संक्षिप्त निर्देश ही है।
व्रीह्यश्च च मे, यवाश्च मे (वाज. यजु, १८/१२)=धान, जौ अन्न।
वेद में यवः का अर्थ है-सम्मिलित रहने वाले राष्ट्र या प्रजा। यवः = यवर् या जवार (निकट का क्षेत्र, इलाका)। शरीर में भी अन्न इकट्ठा कर पुष्ट करता है, अतः यव (जौ) मुख्य अन्न है।
विट् (समाज, वैश्य) वै यवः, राष्ट्रं यवः। (तैत्तिरीय ब्राह्मण,३/९/७/२)
यवं वृकेणाश्विना वयन्ता। (ऋक्, १/११७/२१, निरुक्त, ६/२)
इमं यवमष्टा योगैः (अथर्व, ६/९१/१)
इसी प्रकार व्रीहि का अर्थ धान्य तथा निकट (भोजपुरी में भीरी = निकट) दोनों होता है-
स (मेधो देवैः) अनुगतो व्रीहिरभवत्। (ऐतरेय ब्राह्मण, २/८)
देवाः)
तं ( मेधम् खनन्त इवान्वी पुस्तमन्वविन्दन्ता विमौ व्रीहि-यवौ। (शतपथ ब्राह्मण, १/२/३/७)

वेद में कुछ अन्य अन्नों के नाम भी हैं-
अतस, अतसी (तीसी)-ऋक् (२/४/७)
अलाबू (अथर्व, २०/१३२/१) -लौकी
आम्ब = एक जंगली चावल-अम्बानां चरुम् (तैत्तिरीय सं, १/८/१०/१, काठक सं, १५/५)
नाम्बानां चरुम् (मैत्रायणी सं, २/६/६)
इक्षु (ईख)-(ऋक्, १०/६०/४)
उर्वारुक-ककड़ी (महामृत्युञ्जय मन्त्र में)-ऋक् (७/५९/९२), वाज. यजु (३/६०) आदि
कर्कन्धु-बेर, इसका सत्तू। (वाज. यजु, १९/२३, २१/३२)
खर्जूर-खजूर (तैत्तिरीय, २/४/९/२)
खल्व (चना)-वाज यजु (१८/१२), अथर्व (५/२३/८)
गर्मुत-जंगली मूंग, इसका चरु बनता था (तैत्तिरीय संहिता, २/४/४/१-३)
गोधूम-गेहूं-यजु (१८/१२)
जम्बीर, जाम्बीर, जाम्बील, जाम्बिल-जंबीरी नीम्बू (यजु, २५/३, मैत्रायणी, ३/१५/३)
जर्तिल-जंगली तिल (तैत्तिरीय सं, ५/४/३/२)
तिल-(यजु, १८/१२, अथर्व, २/८/३)
अजशृङ्गी या तीक्ष्णशृङ्गी (सिंघाड़ा)-(अथर्व, ४/२७/६, ८/७/९)
तृष्टाघ-सरसों (अथर्व, ५/२९/१५)
नीवार-नीवार, तिन्नी, जंगली धान (वाज यजु, १८/१२)
नीवीभार्य-श्वेत पीत सर्षप (पीली सरसों)-(अथर्व, ८/६/२०)
पिंग = पीली सरसों, बज = सफेद सरसों (अथर्व, ८/६/२४)
बदर (बेर)-(यजु, १९/२२)
बिभीतक (बहेड़ा)-(ऋक्, १०/३४/१)
माष (उड़द)-(यजु, १८/२, अथर्व, १२/२/५३)
शालि-लाल चावल (अथर्व परिशिष्ट, ७०/१/६-९)
श्यामाक (सांवा धान्य)-(यजु, १८/१२, अथर्व, २०/१३५/१२)

इनकी विस्तृत सूची चरक संहिता, सूत्र स्थान, अध्याय २७ के श्लोकों ८-३४ में हैं। १२ प्रकार के धान्य, कई प्रकार के यव आदि वर्णित हैं।
इसी अध्याय में अन्य फलों, मद्य, मांस, शाक आदि का विस्तृत वर्णन प्रायः ३०० श्लोकों में है।
चरक संहिता भी यजुर्वेद का ही भाग हैं। मूल रूप से वेद संहिता थी, बाद में उसका केवल आयुर्वेद रूप में व्याख्या रह गयी है। शौनक के चरण व्यूह में कृष्ण यजुर्वेद की ८६ शाखाओं में चरक नाम की १२ शाखा हैं।
सुश्रुत संहिता, सूत्र स्थान, अध्याय ४५-४६ में प्रायः ५०० श्लोकों में विभिन्न प्रकार के खाद्य पदार्थों, अन्न-फल आदि का वर्णन है। सुश्रुत, सूत्र स्थान (४६/२९८) में १३ प्रकार के आलुओं का वर्णन है।

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