|| जानियें, पंचक नक्षत्रों के – पाँच निषेध कार्य ||

पंचक अर्थात पांच नक्षत्रों का समूह । इसमें धनिष्ठा,शतभिषा, पूर्वामाद्रपद, उत्तराभाद्रपद और रेवती ये पांच नक्षत्र शामिल है । जब गोचरवश चन्द्रमा धनिष्ठा नक्षत्र से रेवती नक्षत्र तक गमन करता है तो इस काल को पंचक कहते हैं।
अधिकांश लोगों में यह भ्रम और भय व्याप्त है कि इन नक्षत्रों में शुभ-कर्म वर्जित होते हैं अथवा इन नक्षत्रों में प्रारम्भ किए गए कार्य पूर्ण नहीं होते और होते भी हैं तो पूरे पांच बार प्रयास करने बाद। इस सम्बन्ध में यह मान्यता भी चली आ रही है, कि पंचकों में कहीं से कोई सगे-सम्बन्धी की मृत्यु की सूचना मिलती है तो ऐसे में पांच दुःखद समाचार और भी सुनने को मिलते हैं। लोगों में भ्रम तो यहाँ तक व्याप्त है कि इन दिनों में सनातन धर्म के कोई शुभ कार्य भी नहीं करना चाहिए।
सबसे पहले तो यह भय,भ्रम और अंधविश्वास मन से निकाल दें कि पंचक काल के ये पांच नक्षत्र सदैव अहितकारी ही होते हैं। ज्योतिष ग्रंथो में पंचको के शुभाशुभ विचार का विवरण प्राप्त होता है। यदि गहनता से पंचकों के विषय में अध्ययन किया जाए तो हम पाते हैं कि पंचक के नक्षत्रों में केवल पांच कर्मों को ही नहीं करनें का निर्देश है। शेष समस्त कर्म इन (निषेध-कर्मों को छोड़कर) नक्षत्रों में किये जा सकतें है ।

पंचकों में जिन पांच कार्यों को न करने का वर्णन है, उनके विषय में उनके दुष्परिणाम भी दिए गए हैं और यदि इन निषेध कार्यों को पंचक काल में ही करना आवश्यक हो तो कुछ सरल से उपयों को करके कार्यों को सम्पन्न किया जा सकता है। अब आइये उन पांच कार्यों को उपाय सहित जानें जो पंचककाल में वर्जित है –
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* पहला, पंचककाल में लकड़ी का सामान क्रय करना और लकड़ी,घास आदि एकत्रित करना वर्जित है । धनिष्ठा नक्षत्र में इस कर्म से बचें क्योंकि इससे अग्नि भय का संकट हो सकता है। यदि यह कार्य करना आवश्यक हो तो कार्य कर लेवे और पंचक काल समाप्त होने पर क्रय-लकड़ी के कुछ भाग से हवन करें । ऐसी भी मान्यता है कि इस नक्षत्र के स्वामी मंगल हैं और उसके इष्ट देव हनुमान जी हैं, इसलिए कार्य से पूर्व धनिष्ढा नक्षत्र में उनका स्मरण अवश्य कर लें, अज्ञात भय से अवश्य ही रक्षा होगी।
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* दूसरा, पंचककाल में विशेषरुप से दक्षिण दिशा की यात्रा करना वर्जित है । दक्षिण दिशा के अधिष्ठाता ‘यम’ हैं, इसलिए भी यात्रा को निषेध माना गया है। यदि यात्रा करना अति आवश्यक हो तो यात्रा से पूर्व यात्रा में प्रयुक्त कुछ पैसे, हल्दी तथा चावल अपने इष्ट देव के सम्मुख रख लें और यात्रा को मंगलमय बनाने की प्रार्थना करें। यात्रा वाले दिन इष्ट देव के सम्मुख रखे यह पैसे भी साथ ले लें। हल्दी और चावल किसी वृक्ष की जड़ में छोड दें अथवा जल प्रवाहित कर दें। अथवा हनुमान मंदिर में फलदान करके यात्रा करें ।
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* तीसरा, पंचककाल में भवन में छत डलवाना वर्जित है। मान्यता है कि पंचकों में भवन में डाली गयी छत उस घर में कलह का कारण बनती है, वहाँ से सुख और शांति का पलायन हो जाता है। मान्यता तो यहाँ तक है कि इन नक्षत्रों में डाली गयी छत कमजोर होती है और भवन में निवास करने वाले लोगों में अलगाव तक करवा देती है। इन नक्षत्रों में यदि छत डालना आवश्यक हो तो छत डालने से पूर्व इष्टदेव को मिष्ठानादि का प्रसाद चड़ाये और यह प्रसाद काम करने वाले लोगों में बांटकर कार्य आरंभ करे।
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* चौथा, पंचककाल में चारपाई बनवना या क्रय करना वर्जित है | इसके पीछे का भाव भी वही लकड़ी के क्रय करने वाला ही है। पंचको में लकड़ी को विशेष महत्व दिया गया है। पंचककाल में यदि चारपाई पलंग आदि बना लिया है तो इसका उपयोग पंचक के बाद करें|
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* पांचवाँ, सबसे महत्वपूर्ण है कि पंचककाल में शव दाह नहीं करते। इसके पीछे भी कारण लकडियों का ही है क्योंकि दाह के लिए लकड़ियों की आवश्कता होती है। पंचक काल में शवदाह के समय आटे अथवा कुशा के पांच पुतले बनाकर शव के साथ रखकर दाह संस्कार करना चहिए।
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मुहूर्त चिंतामणि के अनुसार यदि पंचककाल में भी कोई कार्य करना अतिआवश्यक हो तो घनिष्ठा नक्षत्र का अंत, शतमिषा नक्षत्र का मध्य, पूर्वाभाद्रपद का प्रारम्भ और उत्तराभाद्रपद नक्षत्र के अन्त की पांच घड़िया कार्य करने के लिए चुनी जा सकती हैं।
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विशेष-
पंचको में नक्षत्रों के अनुरुप अनेक कार्य शुभ माने गए हैं। इसीलिए यह भ्रम पालना सर्वथा अज्ञानता है कि पंचककाल अशुभ होता है, क्योंकि

* धनिष्ठा और शतभिषा चर-संज्ञक नक्षत्र है ये नक्षत्र यात्रा, वस्त्र, आभूषण आदि के क्रय-विक्रय के लिए बहुत शुभ हैं।

* पूर्वाभाद्र उग्र-संज्ञक नक्षत्र है ये कोर्ट-कचहरी,विवाद जैसे महत्वपूर्ण कार्यों के निर्णय आदि के लिए शुभ हैं।

* उत्तराभाद्रपद ध्रुव-संज्ञक नक्षत्र है इस नक्षत्र में पूर्वनियोजित अधूरी और बड़ी-बड़ी परियोजनाओं का आरंभ, शिलान्यास, योगाभ्यास करना शुभ होता है |

* रेवती मृदु-संज्ञक नक्षत्र है ये विद्याध्ययन, गीत-संगीत,अभिनय, सौम्य-कर्म और गुह्य विधाओं की साधना के लिए शुभ है।

डॉ. सर्वेश्वर शर्मा
अतिथि व्याख्याता ज्योतिष विभाग

 विक्रम विश्वविद्यालय ,उज्जैन ( म.प्र. )

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