इल्युमिनाटी के विशेष समूह

जानिये इल्युमिनाटी के विशेष समूह

नाइट्स आॅफ द हैल्मेट ये एक इल्युमिनाटी का अत्यन्त गुप्त संगठन है फ्राँसीस बेकान इसका गब्बर यानि मुखिया है। मैसानिक रीतियों केा छुपाने के उद्देश्य से इसने एक नाटक लिखा था जिसका नाम ” द आर्डर आफ द हेल्मेट ये नाटक 3 जून 1594 को मंचित किया गया था (यहाँ लेखक ने मंचन का स्थान नहीं लिखा) पुन15 दिसम्बर 1594 को इसका मंचन किया गया। दिसम्बर 1594 में ब्रिटानिया कबीेले के तथाकथित अभिजात्य वर्ग जो कि इल्युमिनाटी सम्प्रदाय में पूर्ण आसुरि भाव से दीक्षित हैं वे वहाँ मिले वे ही उस नाटक में अभिनेता के रूप में कार्य कर रहे थे इस प्रकार फ्राँसीस ने अपनी रीतिरिवाजों को बड़े ही अच्छे ढंग से छुपा कर सबके सामने जिन जिन को देना उन उन को दे दिया। इसमें लेखक ने स्वयं प्रधान नायक का अभिनय किया तथा अन्य कई संगठनों के कई सदस्य विभिन्न पात्रों में थे तथा वहीं उन्होंने अपने संदेशों को आदान—प्रदान किया तथा इस नाम दिया गया प्ले का ।

फिर इनकी चुड़ेल महारानी ने इसको विभिन्न देशों के भ्रमण के लिये भेजा था। वहाँ से उसने फ्राँस, जर्मनी, इटलरी, स्वीडन आदि कई देशों में यात्राएँ की वहाँ वह कई गुप्त संस्थाओं से मिला उनके व्यवहार को देखा और समझा ये फ्राँसीस कई गुप्त संस्थाओं से दीक्षित था तथा उनमें उसका योगदान भी था उसने कॉबेलिस्टिक जादू, ईजिप्टीयन रहस्यवाद, अरेबियन रहस्यवाद तथा जर्मनस्टेन्मटिज्म को सीखा था। ये सिद्ध करता है कि यूरोप में तान्त्रिक कर्म किस तरह से फैला हुआ था।

ये ही विश्व का विकसित महाद्वीप भारत में आने पर यहाँ के पूजा और ध्यान आदि को पिछड़े हुआ कार्य कहते हुये उसे अन्धविश्वास कहता है। जबकि हमारे महान् भारत में तान्त्रिक कर्म नहीं आध्यात्मिक साधनाएँ होती हैं और ये लोग उन्हीं को रुकवाना चाहते हैं ताकि ये नकारात्मक ऊर्जा के द्वारा हमारे हिन्दू धर्म को रोक सकें।

हेल फायर क्लब (नारकीय ज्वाला क्लब):- ये एक अत्यन्त गुप्त आसुरी संघ है ये फ्रीमेसनरी से सम्बद्ध था। इन दोनों ने मिलकर कुछ नया किया अथवा ये कहा जाय कि विश्व में कुछ अधिक आसुरि तत्त्वों को जन्म दिया तथा कुछ बुरे कार्यों में वृद्धि हुईं। खुले में ये दोनों के एक दूसरे सम्बद्ध नहीं मानते।

बेंजामिन फ्रैंकलिन नामक एक अन्य व्यक्ति भी था जो कि कई गुप्त संस्थाओं का अध्यक्ष तथा सदस्य था जैसे फ्राँसीस था। इनमें सबमें एक बात बड़ी सामान्य है कि ये सब तब तक नोबेल या सम्मानीय नहीं कहलाते थे जब तक ये ब्रिटेन की महाचुड़ेल से सम्मानित नहीं हो जाते थे। उस चुड़ेल से सम्मानित होने के बाद उसको न केवल सम्मान मिलता था अपितु इल्युमिनाटी के द्वार भी उसके लिये खुल जाया करते थे।

डॉ. दिलीप कुमार नाथाणी

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