भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा

जानिये ओडिशा जगन्नाथ पुरी रथ यात्रा का आध्यात्मिक लाभ

ओडिशा -प्रत्येक वर्ष की भांति विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ रथ यात्रा 4 जुलाई, 2019 से पुरी (ओडिशा) में शुरू होगी । यह यात्रा भगवान श्री जगन्नाथ के भक्तों के लिए एक महान विशेषाधिकार है । पुरी का मंदिर कलियुग के चार धामों में से एक है। भारत ही नहीं, यह यात्रा विश्व भर के भक्तों की भगवान के प्रति समर्पण और भक्ति की एक भावपूर्ण झलक प्रदान करती है। यह दुनिया की सबसे बड़ी यात्रा है। लाखों विष्णु भक्त यहां एकत्रित होते हैं। इस स्थान की विशेषता यह है कि, अधिकांशतः अन्य मंदिरों में, श्रीकृष्ण पत्नी के साथ विराजमान हैं; लेकिन इस मंदिर में वे अपने भाई बलराम और बहन सुभद्रा जी के साथ बैठते हैं। पुरी विष्णु भूमि है । इस मंदिर की कई विशेषताएं हैं l जैसे, मंदिर के द्वार से मंदिर में प्रवेश करने के तुरंत बाद समुद्र की आवाज बंद हो जाती है; लेकिन पूरे पुरी शहर में कहीं भी जाने पर समुद्र की आवाज आती रहती है।

रथयात्रा के उपलक्ष्य में श्री जगन्नाथ के चरणों में यह प्रार्थना है कि, ‘परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी द्वारा कलियुग में किया जानेवाला धर्मसंस्थापना का कार्य शीघ्रातिशीघ्र पूर्णत्व की ओर जाए तथा हिन्दू राष्ट्र की स्थापना हेतु हम साधकों को आशीर्वाद प्राप्त हो !’

1. रथयात्रा में श्री बलराम, सुभद्रा माता बीच में और भगवान जगन्नाथ पीछे, इस तरह क्रम होता है ।
पुरी का जगन्नाथ मंदिर भारत के 4 पवित्र तीर्थ क्षेत्रों में से एक है। भगवान श्रीकृष्ण ने जगन्नाथ का रूप धारण किया है। वर्तमान मंदिर 800 वर्ष से अधिक पुराना है। भगवान कृष्ण को उनके बड़े भाई श्री बलराम और उनकी बहन सुभद्रा देवी के साथ पूजा जाता है। पुरी रथ यात्रा के लिए श्री बलराम, श्रीकृष्ण और देवी सुभद्रा के लिए तीन अलग-अलग रथ तैयार किए जाते हैं। इस रथयात्रा के सामने श्री बलराम का रथ, बीच में सुभद्रा देवी और फिर भगवान जगन्नाथ (भगवान कृष्ण) के रथ बने हुए हैं।

2. तीन रथ और उनकी विभिन्न प्रकार की विशेषताओं को दिए गए विशेष नाम!

अ. श्री बलराम के रथ को ‘तलवहज’ कहा जाता है। इस रथ का रंग लाल और हरा है। देवी सुभद्रा के रथ को ‘द्रिपदलन’ या ‘पद्मारथ’ कहा जाता है। यह काला, नीला या लाल रहता है। भगवान जगन्नाथ के रथ को ‘नंदीघोष’ या ‘गरुड़ध्वज’ कहा जाता है। उस रथ का रंग लाल या पीला होता है।

आ. श्री बलरामजी के रथ की ऊँचाई ४५ फीट है, सुभद्रा देवी के रथ की ऊँचाई ४४.६ फीट है, और भगवान जगन्नाथ के नंदीघोष रथ की ऊंचाई ४५.६ फीट है।

इ. इन तीनों रथों की विशेषताएं इस प्रकार हैं, ये तीनों रथ नीम की पवित्र और परिपक्व लकड़ियों से बनाए जाते हैं। उसके लिए नीम के एक स्वस्थ और शुभ पेड़ को चुना जाता है। उसके लिए एक विशेष समिति भी बनाई जाती है। इन रथों को बनाने में किसी भी प्रकार के कील या किसी अन्य प्रकार की धातु का उपयोग नहीं किया जाता ।

ई. रथ के लिए आवश्यक लकड़ी का चयन विशेष मुहूर्त पर किया जाता है। उसके लिए वसंत पंचमी का दिन चुना जाता है। उस दिन से लकड़ियाँ लेना शुरू हो जाता हैं। प्रत्यक्ष रथ का निर्माण अक्षय तृतीया से शुरू होता है।

उ. ये तीनों रथ तैयार होने के बाद ‘छर पहनरा’ नाम का अनुष्ठान किया जाता है । इस के अंतर्गत पुरी के गजपति राजा पालकी से आकर इन तीनों रथों का विधीवत् पूजन करते हैं । उस समय सोने के बुतारे से रथ का मंडप तथा मार्ग साफ करने की प्रथा है ।

तत्पश्‍चात् रथ का प्रस्थान होता है । आषाढ शुक्ल पक्ष द्वितीया को रथयात्रा आरंभ होती है । उस दिन ढोल, नगाडे, तुतारी तथा शंख की ध्वनी में भक्तगण इस रथ को खीचते हैं । श्रद्धालुओं की यह श्रद्धा है कि, यह रथ खींचने का अवसर जिसे प्राप्त होता है, वह पुण्यवान माना जाता है । पौराणिक श्रद्धा के अनुसार यह रथ खींचनेवाले को मोक्षप्राप्ति होती है ।
3. भगवान जगन्नाथ मौसी के यहां ७ दिन निवास करते हैं !
अ. जगन्नाथ मंदिर से इस रथयात्रा का आरंभ होता है । यह रथयात्रा पुरी शहर से भ्रमण करते हुए गुंडी मंदिर में पहुंचती है । वहां भगवान जगन्नाथ, श्री बलराम तथा सुभद्रादेवी ७ दिन निवास करते हैं ।

गुंडी मंदिर को ‘गुंडीचा बाडी’ इस नाम से भी पहचाना जाता है । यह भगवान जगन्नाथ की मौसी का घर है । यहां विश्‍वकर्मा ने भगवान जगन्नाथ, श्री बलराम तथा सुभद्रादेवी की प्रतिमाएं निर्माण की थी ।

रथयात्रा के तीसरे दिन अर्थात् पंचमी को लक्ष्मी, भगवान जगन्नाथ को ढूंढते हुए आती हैं ।
किंतु उस समय द्वारपाल द्वार बंद करते हैं; इसलिए देवी रूठकर रथ का पैर तोडती है तथा हेरा गोहिरी साही क्षेत्र में देवी लक्ष्मी के मंदिर में लौट जाती है ।
(यह क्षेत्र पुरी में है ।)

4. ऐसी परंपरा है कि तत्पश्‍चात् स्वयं भगवान जगन्नाथ रूठी हुई देवी लक्ष्मी को मनाते हैं । इस उत्सव के माध्यम से इस प्रकार अद्भुत भक्तिरस उत्पन्न होता है ।

5. आषाढ़ मास के 19 वें दिन यह रथ मुख्य मंदिर के लिए प्रस्थान करता है। रथ की इस यात्रा को ‘बहदड़ा यात्रा’ कहा जाता है।

6. श्री जगन्नाथ मंदिर में लौटने के पश्‍चात् भी सभी प्रतिमाएं रथ में ही रखी जाती हैं । उनके लिए मंदिर के द्वार दूसरे दिन अर्थात् एकादशी के दिन खोले जाते हैं । उस समय प्रतिमाओं को विधिवत् स्नान करवा कर वैदिक मंत्रोच्चारों के साथ पुनर्प्रतिष्ठापना की जाती है ।

7. पुरी का रथोत्सव एक सामूहिक उत्सव है ।
इस समय में पुरी में निवास करनेवाले श्रद्धालु उपवास नहीं करते । समुद्र किनारे पर निवास करनेवाले पुरी में मनाए जानेवाले भगवान जगन्नाथ की इस विश्‍वविख्यात रथयात्रा का दर्शन होना, परमभाग्य माना जाता है । पूरे वर्ष में मन में इसी भाव-भक्ति का स्मरण रखते हुए श्रद्धालु अगले वर्ष की रथयात्रा की बडी आतुरता से प्रतीक्षा करते हैं । रथयात्रा के निमित्त पाई जानेवाली श्रद्धा एवं भक्ति पूरे विश्‍व में कहीं भी नहीं पाई जाती । अतएव यह उत्सव दुर्लभ और अनूठा है । (संदर्भ : संकेतस्थल – www.sanatan.org)

जगन्नाथ मंदिर की अद्भुत और बुद्धि से समझ न आने वाली विशेषताएं!

1. 800 साल पुराने इस मंदिर की वास्तुकला इतनी शानदार है कि, संशोधन करने के लिए, दुनिया के वास्तुकार इस मंदिर की यात्रा करते हैं। यह तीर्थयात्रा भारत के 4 पवित्र तीर्थस्थलों में से एक है। श्री जगन्नाथ मंदिर की ऊंचाई 214 फीट है। मंदिर का क्षेत्र 4 लाख वर्ग फीट में फैला हुआ है।
पुरी के किसी भी स्थान से मंदिर के शिखर पर सुदर्शन चक्र को देखने पर वह हमारे सामने है ऐसा प्रतीत होता है। मंदिर का झंडा हवा की दिशा के विपरीत लगातार लहराता है। (प्रत्येक विषय के संबंध में बुद्धि के स्तर पर सोचने वाले बुद्धिजीवियों के लिए इस मंदिर की विशेषताएं एक करारा जवाब हैं ! इससे हिंदू धर्म का अद्वितीय महत्व है, ध्यान में आता है! – संपादक, दैनिक सनातन प्रभात)

2. हर रोज शाम को मंदिर पर ध्वज बदल दिया जाता है। है। आम तौर पर हवा हर दिन समुद्र से जमीन की ओर बहती है और शाम को इसके उलट जाती है; लेकिन पुरी में उलटा होता है। मुख्य गुंबद की छाया दिन के किसी भी समय अदृश्य रहती है।
यहां पक्षी और विमान कभी नहीं दिखेंगे। मंदिर में सदा वर्ष भर खाने के लिए पर्याप्त बहुत सारे खाद्य पदार्थ रहते हैं । यहां की विशेषता है कि अतिरिक्त होने के कारण महाप्रसाद यहां कभी व्यर्थ नहीं होता । इस मंदिर का रसोई घर दुनिया के किसी भी रसोई घर से बड़ा है। महाप्रसाद बनाते समय मिट्टी के बर्तन एक के ऊपर एक रखे जाते हैं। सारा भोजन लकड़ी की आग पर पकाया जाता है। इस विशाल रसोई घर में, भगवान जगन्नाथ द्वारा पसंद किया जाने वाला महाप्रसाद बनाया जाता है। उसके लिए, एक ही समय में 500 रसोइए और 300 सहायक काम करते हैं।

कृतिका खत्री , प्रवक्ता , सनातन संस्था , दिल्ली

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