जानिये काल को ...

जानिये काल को …

काल की कई परिभाषाएं विभिन्न दर्शनों में हैं। उनका सारांश है-परिवर्तन का आभास काल है।

इसके अनुसार ४ प्रकार के काल हैं-

(१) नित्य काल या मृत्यु – एक बार जो स्थिति चली गई वह वापस नहीँ आयेगी। बच्चा बूढ़ा हो सकता है पर वापस बच्चा नहीं होता। कच्चा आम पक जाता है, वह सड़ कर नष्ट हो जायेगा पर फिर से कच्चा नहीँ होगा। यह परिवर्तन या क्षरण सदा होता रहता है, अतः नित्य काल है। क्षरण होते होते नष्ट हो जाता है, अतः मृत्यु है।
कालोऽस्मि लोकक्षयकृत् प्रवृद्धो,
लोकान् समाहर्तुमिह प्रवृत्तः।
प्रथम पंक्ति नित्य काल की परिभाषा है। द्वितीय तात्कालिक काम है।

(२) जन्य काल-कई परिवर्तन चक्रीय क्रम में होते हैं, जैसे दिन-रात, मास, वर्ष या सृष्टि के विभिन्न सर्ग। सृष्टि के ९ सर्गों के निर्माण चक्र के अनुसार काल के ९ मान हैं-ब्राह्म, प्राजापत्य, दिव्य, पितर, बार्हस्पत्य, सौर, चान्द्र, नाक्षत्र, सावन। (सूर्य सिद्धान्त, १५/१)
इन काल मानों या इनके अवयवों से काल की माप या कलन होता है। यह सबसे कठिन कलन है, जिसमें आधुनिक विज्ञान को भ्रम है (Stephen Hawking-A Brief History of Time). गति द्वारा काल की माप है। सामान्य गति दर्शक के अनुसार बदलती है। ट्रेन में कोई बैठा है। वह बाकी यात्रियों के लिये स्थिर है पर जमीन पर खड़े व्यक्ति के लिये चल रहा है। पर प्रकाश की गति हर दर्शक के लिये एक ही है-३ लाख किलोमीटर प्रति सेकण्ड। पर प्रकाश या गति विज्ञान दोनों जगह हम गणित के लिए एक ही काल का प्रयोग करते हैं जो सिद्धान्त रूप में भूल है। इसका अभी तक समाधान नहीं हो पाया है अतः भगवान् ने कहा है-
कालः कलयतामहम्।
जितने निर्माण या सृष्टि के यज्ञ हैं वे चक्रीय क्रम में होते हैं। इस क्रम द्वारा जनन होता है, अतः यह जन्य काल है।

(३) अक्षय काल – पूरे विश्व या स्वतन्त्र संस्था को देखें तो कुल मिलाकर कोई परिवर्तन नहीँ हो रहा है। मनुष्य, परिवार, समाज, देश बनते बिगड़ते रहते हैं पर आकाश में देखने पर २ अरब वर्षों से पृथ्वी उसी प्रकार सूर्य कक्षा में चल रही है। स्वतन्त्र संस्था में एक स्थान पर जो कमी होती है, उतना दूसरे स्थान पर बढ़ जाता है। भौतिक विज्ञान में ५ प्रकार के संरक्षण सिद्धान्त हैं-मात्रा, आवेग, कोणीय आवेग, ऊर्जा, विद्युत् आवेश। यह पूर्ण विश्व या ब्रह्म का रूप है। अतः भगवान् ने कहा है-
अहमेवाक्षयो कालः धाताऽहं विश्वतो मुखः।
अक्षय काल रूप पुरुष को ग्रन्थ साहब के आरम्भ में अकाल पुरुष कहा है।

(४) परात्पर काल – हर विन्दु पर सूक्ष्म परिवर्तन होते रहते हैं। पर बहुत सूक्ष्म या बहुत विराट् होने पर उनका आभास सम्भव नहीं है। हमारी कल्पना से परे होने के कारण इसे परात्पर काल कहते हैं (भागवत पुराण, ३/११)

 

श्री अरुण कुमार उपाध्याय ( धर्म शास्त्र विषेशज्ञ )

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