जानिये क्या हैं नवरात्रि ?

नवरात्रि शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है- नव और रात्रि । नव का अर्थ है नौ और रात्रि शब्द में पुनः दो शब्द निहित हैं: रा+त्रि। रा का अर्थ है रात और त्रि का अर्थ है जीवन के तीन पहलू- शरीर,मन और आत्मा। इंसान को तीन तरह की समस्याएं घेर सकती हैं- भौतिक, मानसिक और आध्यात्मिक। इन समस्याओं से जो छुटकारा दिलाती है वह रात्रि है। रात्रि या रात आपको दुख से मुक्ति दिलाकर आपके जीवन में सुख लाती है। इंसान कैसी भी परिस्थिति में हो, रात में सबको आराम मिलता है। रात की गोद में सब अपने सुख-दुख किनारे रखकर सो जाते हैं। भारत के प्राचीन ऋषि- मुनियों ने रात्रि को दिन की अपेक्षा अधिक महत्व दिया है। यही कारण है कि दीपावली, होलि, शिवरात्रि और नवरात्रि आदि उत्सवों को रात में ही मनाने की परंपरा है। यदि, रात्रि का कोई विशेष रहस्य न होता तो ऐसे उत्सवों को रात्रि न कह कर दिन ही कहा जाता। जैसे- नवदिन या शिवदिन। लेकिन हम ऐसा नहीं कहते।
एक वर्ष में चार प्रकार कि नवरात्रि होती है ।इनमें से आषाढ़ और माघ की प्रतिपदा से शुरू होने वाले नवरात्र गुप्त होते हैं। इसमें देवी अपनी शक्तियों का अर्जन करती हैं। इस दौरान देवी साधक गुप्त रूप से देवी की उपासना कर अभीष्ट मंत्र सिद्धि करते हैं। चैत्र और आश्विन मास के नवरात्र खुले नवरात्र होते हैं। इसमें साधकों के साथ ही देवी भक्त भी देवी की उपासना करते हैं। पोष ओर आषाढ मास में आने वाली गुप्त नवरात्रि यह दोनों अधिक प्रसिद्ध नही है । चैत्र ओर आश्विन मास में आने वाली नवरात्रि को सम्पूर्ण भारतवर्ष में मनाया जाता है । जिसमें भी आश्विन मास में आने वाली नवरात्रि को अधिक धूमधाम से मनाया जाता है। इसे शारदीय नवरात्र भी कहा जाता है । नवरात्रि कि नौ रातो में तीन देवियों – महालक्ष्मी , महासरस्वती और दुर्गा माँ के नौ स्वरुपों की पूजा होती है जिन्हे नवदुर्गा कहते हैं।जिनके नाम इस प्रकार है:– प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्माचारिणी। तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्।। पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च। सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्।। नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा: प्रकीर्तिता:। प्रथम शैलपुत्री हैं, द्वितीय ब्रह्मचारिणी हैं तृतीय देवी का स्वरूप चन्द्रघण्टा है, कूष्माण्डा चौथास्वरूप है, पाँचवीं स्कन्दमाता हैं, छठवीं कात्यायनी हैं, सातवीं कालरात्री हैं और महागौरी आठवीं हैं, नवमीं सिद्धिदात्री हैं – इस प्रकार देवी के नव स्वरूप कहे गये हैं । अपनी आध्यात्मिक और मानसिक शक्ति का विकास करने के लिए अनेक प्रकार के व्रत, संयम, नियम,यज्ञ, भजन, पूजन, योग- साधना आदि इन नवरात्रि में किये जाते है । नवरात्रि का वैज्ञानिक आधार:– वैज्ञानिक आधार नवरात्र के पीछे का वैज्ञानिक आधार यह है कि पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिक्रमा काल में एक साल की चार संधियां हैं जिनमें से मार्च व सितंबर माह में पड़ने वाली गोल संधियों में साल के दो मुख्य नवरात्र पड़ते हैं। इस समय रोगाणु आक्रमण की सर्वाधिक संभावना होती है। ऋतुसंधियों में अक्सर शारीरिक बीमारियां बढ़ती हैं। अत: उस समय स्वस्थ रहने के लिए तथा शरीर को शुद्ध रखने के लिए और तन-मन को निर्मल और पूर्णत: स्वस्थ रखने के लिए की जाने वाली प्रक्रिया का नाम ‘नवरात्र’ है। जिस तरह मां के गर्भ में नौ महीने पलने के बाद ही एक जीव का निर्माण होता है ठीक वैसे ही ये नौ दिन हमें अपने मूल रूप, अपनी जड़ों तक वापस ले जाने में अहम भूमिका अदा करते हैं। इन नौ दिनों का ध्यान, सत्संग, शांति और ज्ञान प्राप्ति के लिए उपयोग करना चाहिए। नवरात्रि में दुर्गा सप्तशती के पाठ का अत्यधिक महत्व है ।
पंडित भारत भूषण शर्मा
ज्योतिषाचार्य ( राजस्थान )

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