जानिये क्या हैं व्यसन के आध्यात्मिक कारण  

मात्र मानसिक समस्या ही व्यसन का कारण नहीं हैं  आध्यात्मिक शोध यह दर्शाता है कि प्रायः व्यसन का मूल कारण आध्यात्मिक आयाम में रहता है  यह लेख पढने का सुझाव हम उन व्यक्तियों एवं उनके परिवारों काे देते हैं, जो व्यसन के साथ संघर्ष कर रहे हैं   व्यसनकारी आचरण के कारणों के संदर्भ में आधुनिक विज्ञान का क्या मत है ? व्यसनकारी विकारों के व्याधिनिदान-विज्ञान (कारण), निवारण एवं उपचार में कोई आम सहमति नहीं है ।

संयुक्त राज्य अमेरिका की सरकार का एक प्रकाशन में, ‘मादक पदार्थों का दुरुपयोग संबंधी सिद्धांत (थ्योरीस ऑन ड्रग अब्यूस) : चयनित सामयिक दृष्टिकोण,’ रासायनिक व्यसनों के लगभग तैंतालीस सिद्धांत एवं न्यूनतम पंद्रह उपचार पद्धतियां हैं । इस भ्रम का उदाहरण देना हो, तो अनेक लोग यह मानते हैं कि, व्यसनकारी आचरण जैसे जुआ खेलना एवं मद्यपान ‘रोग’ हैं; वहीं कुछ अन्य इसे आनुवांशिकता एवं पर्यावरण सम्बन्धी घटकों के मध्य जटिल परस्पर क्रिया के उत्तर में साेचा-समझी प्रतिक्रिया मानते हैं । जबिक कुछ अन्य लोग आनुवांशिक कारणों के पक्ष में तर्क देते हैं  । कुछ शोधकर्ताओं का कहना है कि, सबसे सामान्य रोगों के विपरीत जैसे क्षय रोग, जिसका एक निश्चित कारण (एक कीटाणु) एवं एक निश्चित उपचार तंत्र होता है, जिसपर सभी सहमत होते हैं, अधिकांश प्रकार के व्यसनकारी आचरणों का कोई निर्णायक कारण एवं निश्चित उपचार पद्धति नहीं है, जिसपर सभी सहमत हों ।

विशेषज्ञों के मध्य सहमति के इस अभाव के परिणामस्वरूप कई व्यसनकारी आचरणों की रोकथाम एवं उपचार विधियां समस्या बन गर्इ है । (संदर्भ: Department of Applied Health Science, Indiana University, 2003) इसी प्रकार, जहां एक आेर व्यसनों एवं मादक पदार्थों के सेवन को घटाने के लिए अरबों डालर का बजट निर्धारित है, वहीं दूसरी आेर व्यसनों के कारणों पर कोई आम सहमति नहीं है । यदि पूरे विश्व की सरकारें अपने शोध में व्यसनों के आध्यात्मिक कारण एवं आध्यात्मिक उपचार पर ध्यान केंद्रित करतीं, तो उन्हें व्यसनों को नियंत्रित करने में अपार सफलता प्राप्त होती ।

व्यसन के कारणों पर आध्यात्मिक शोध व्यसन के कारणों पर आध्यात्मिक शोध का क्या अर्थ है ? व्यसन के कारणों पर आध्यात्मिक शोध का अर्थ है उन्नत एवं सक्रिय छठवीं इंद्रिय के माध्यम से व्यसनों के आध्यात्मिक कारण एवं उपचार पर किया गया शोध । आध्यात्मिक अनुसन्धान  के माध्यम से कौन निदान कर सकता है? व्यसनों के विशिष्ट आध्यात्मिक कारण का उपचार मात्र आध्यात्मिक रूप से उन्नत व्यक्ति द्वारा संभव है; क्योंकि वे सूक्ष्म आयाम को समझ सकते हैं ।

आध्यात्मिक रूप से उन्नत से हमारा अर्थ एक संत से है अर्थात जिन्होंने ७० प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर प्राप्त किया है । विकसित छठवीं इंद्रिय युक्त व्यक्ति मूल कारण का पता तो लगा सकता है, परंतु यदि उसने न्यूनतम ६० प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर प्राप्त नहीं किया है, तो उसके द्वारा किए गए रोग के निदान को ७० प्रतिशत से अधिक आध्यात्मिक स्तर के उन्नत व्यक्ति (संत) से अवश्य सत्यापित करवाना चाहिए ।आध्यात्मिक शोध के अंतर्गत व्यसनों के प्रकार   व्यसन के क्या कारण हैं ? ‘ज्ञात जगत’ का विस्तार ‘सूक्ष्म आध्यात्मिक आयाम’ की तुलना में १ : अनंत के अनुपात में है । आध्यात्मिक शोध की क्रियाविधियों (methodologies) द्वारा हम आध्यात्मिक आयाम में देखकर ये निश्चित कर सकते हैं कि, ये किस सीमा तक हमारे जीवन को प्रभावित करती है । यद्यपि यह जोडना भी आवश्यक होगा कि सूक्ष्मताएं तथा आध्यात्मिक घटकों की विविधताओं के मध्य का अंर्तसंबंध अत्यंत जटिल तथा कठिन हो सकता है । अतः किसी के प्रकरण में आध्यात्मिक घटकों का महत्त्व ८० प्रतिशत तक हो सकता है; तथापि इस बंधन के उपरांत भी, घटनाएं क्यों होती हैं, इसका मूलभूत कारण जानने के लिए आध्यात्मिक आयाम को ध्यान में रखते हुए, पारंपरिक शोध की तुलना में आध्यात्मिक शोध अधिक संपूर्ण होते हैं ।

व्यसनों के मूल कारण का पता लगाने के लिए आध्यात्मिक शोध निम्न परिणामों को दर्शाता है

१. इस सारणी में दिए आंकडे मात्र औसत हैं एवं प्रकरण के अनुसार अत्यधिक भिन्न हो सकते हैं । महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि, वर्तमान में आधुनिक विज्ञान के लिए अज्ञात आध्यात्मिक प्रभाव की संभावना उच्च है ।

२. यह पहलू मन एवं अहं के कारण है । उदहारण के लिए, साथियों के दबाव में अथवा मात्र दिखावे के लिए, एक किशोर मादक पदार्थ का सेवन आरंभ करता है, यह प्रायः धूम्रपान के साथ होता है, जो यह दिखाने के लिए किया जाता है कि व्यक्ति ‘बिंदास’ है ।

३. व्यसन के आध्यात्मिक कारणों की मात्रा उल्लेखनीय रूप से भिन्न हो सकता है । यदि प्रारंभ में व्यसन मनोवैज्ञानिक कारणों से लगा हो, तब भी अनिष्ट शक्तियां  व्यक्ति को प्रभावित करने के लिए इस दुर्बलता का लाभ उठा सकतीं हैं । इस प्रकार जो व्यसन शारीरिक अथवा मनोवैज्ञानिक कारणों से प्रारंभ हुआ, वह शीघ्र ही आध्यात्मिक कारण से दृष्टिगत होने लगता है । यह ध्यान में रखें, ताे सर्जन जनरल ( यूएस) में प्रकाशित विभिन्न राष्ट्रीय सर्वेक्षणों का तथ्य सर्वथा स्पष्ट हो जाता है । सर्जन जनरल ( यूएस) में विभिन्न राष्ट्रीय सर्वेक्षणों का उल्लेख है, जो यह बताते है कि राष्ट्र के ५१ मिलियन धूम्रपान करनेवालों में से ७५ से ८५ प्रतिशत लोग इसे छोडना चाहते हैं; परंतु अभी तक ऐसा करने में असमर्थ रहे (स्त्रोत : Time magazine) ।

व्यसनी व्यक्ति पर अनिष्ट शक्ति का प्रभाव रहता है, इसलिए वह व्यसन को छोडने की इच्छा रखकर भी उसे नहीं छोड पाता । आध्यात्मिक कारणों का विश्लेषण : व्यसनों के आध्यात्मिक कारणों के रूप में पितरों एवं अनिष्ट शक्तियां होती हैं । इनमें ३० प्रतिशत तक पितर तथा ७० प्रतिशत तक अनिष्ट शक्तियों का योगदान होता है । अनिष्ट शक्ति अथवा मृत पूर्वजों की सूक्ष्म देह व्यक्ति को दो कारणों से प्रभावित अथवा आविष्ट करती हैं : व्यसनकारी पदार्थ के प्रति अपनी स्वयं की तृष्णा को संतुष्ट करने के लिएव्यक्ति को व्यसनी बनाकर उसे कष्ट देने के लिए विविध व्यसनों से ग्रस्त व्यक्ति विविध अनिष्ट शक्तियों/मृत पूर्वजोंद्वारा अथवा विविध व्यसनों से ग्रस्त मात्र एक अनिष्ट शक्ति/मृत पूर्वज से प्रभावित हो सकता है । व्यसनी आचरण का प्रत्यावर्तन (Relapse( वापस लौटना) व्यसन के क्षेत्र में एक अत्यधिक कष्टप्रद विषय रहा है । यह विफलता का प्रतीक है ।

आध्यात्मिक शोध दर्शाते हैं कि अनेक व्यसनों का मूल कारण आध्यात्मिक आयाम में होता है, इसिलए शारीरिक एवं मनोवैज्ञानिक स्तर पर होनेवाले उपचारों की सफलता दर कम होती है । शारीरिक उपचार का अर्थ है, पुनः स्वास्थ्यलाभ के अंतर्गत मादक पदार्थ का छोडना तत्पश्चात रसायनिक औषधि से उसके प्रत्यावर्तन (withdrawal) का उपचार करना । रसायन जैसे मेथाडोन (methadone) का प्रयोग वास्तविक मादक पदार्थ सेवन के सुरक्षित विकल्प के रूप में किया जाता है ।

मनोवैज्ञानिक उपचार के अंतर्गत परामर्श, शारीरिक उपचार के साथ अथवा इसके बिना औपचारिक एवं/अथवा अनौपचारिक मनोचिकित्सा इत्यादि आते हैं । अल्कोहल एंड अल्कोहोलिज्म से प्राप्त आकडों के अनुसार, ४६ प्रतिशत मद्यपी (अल्कोहोलिक) आंतरिक रोगोपचार कायर्क्रम के छः माह में प्रत्यावर्तित होते हैं अर्थात पुनः व्यसन करने लगते हैं, जबकि ४८ प्रतिशत मद्यपी बाहरी रोगी कार्यक्रम अर्थात अस्पताल में भर्ती हुए बिना पुनर्वास कराने के छः माह के भीतर पुनः व्यसन करने लगते हैं । औषधि नियंत्रण नीति के राष्ट्रीय कार्यालय के अनुसार दीर्घ कालावधि तक मेथामफेटामाइन (methamphetamine) द्वारा व्यसन से मुक्त होने की दर संभवतः १० प्रतिशत से भी अल्प हो सकती है । जो पहली बार व्यसन छोडने में सफल रहे, वे भी ठीक होते मद्यपियों एवं हेरोइन व्यसनियों के समान ७५ प्रतिशत की दर से पुनः व्यसन करने लगते हैं । (स्त्रोतTime magazine) प्रारब्ध अथवा स्वेच्छा के परिप्रेक्ष्य से व्यसन कर्मयोग के अनुसार, हमारे सभी कर्म एक ताे प्रारब्ध (हमारे नियंत्रण में नहीं है) अथवा स्वेच्छा से (हमारे नियंत्रण में) होते हैं I सामान्य नियम के अनुसार, वर्तमान काल में हमारे ६५ प्रतिशत कर्म पूर्वनिर्धारित हैं एवं ३५ प्रतिशत कर्म हम स्वेच्छा से करते हैं । तथापि व्यसनों की स्थिति में प्रारब्ध का अनुपात अधिक है ।

जीवन की मुख्य घटनाएं जैसे जन्म, विवाह, बडी दुर्घटनाएं एवं मृत्यु पूर्णतया प्रारब्ध के कारण होती हैं, अर्थात उनमें प्रारब्ध की भूमिका १०० प्रतिशत है । किसी व्यसनी व्यक्ति के प्रकरण में प्रारब्ध की वास्तविक मात्रा का अनुमान मात्र ७० प्रतिशत से अधिक आध्यात्मिक स्तर के व्यक्ति (अर्थात संत) अथवा अत्यधिक उच्च विकसित छठी इंद्रिय से युक्त व्यक्ति ही लगा सकते हैं ।

डॉ. दीनदयाल मणि त्रिपाठी

( प्रबन्ध सम्पादक )

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