जानिये क्या है ? जप यज्ञ 

विश्व के सभी धर्मों ने भगवत् प्राप्ति हेतु जप को विशेष मान्यता प्रदान की है। आर्य, जैन, बौद्ध, ईसाई और इस्लाम धर्म सभी जप को महत्व देते हैं। आगम शास्त्र इस विषय पर निर्देश देते हैं :-

 

”सर्वेषां कर्मणां श्रेष्ठं-जपज्ञांन महेश्वरि

जप यज्ञो महेशानि-मत्स्वरूपो न संशय:

जपेन देवता नित्यं-स्तूयमाना प्रसीदति

प्रसन्ना विपुलां कामान्-दद्यान्मुक्ति च शाश्वतीम्”

 

(हे देवि! जप करना सर्वश्रेष्ट कर्म है। जपयज्ञ स्वयं मेरा ही स्वरूप है। जप करने से देवता प्रसन्न होकर समस्त कामनाओं की पूर्ति करके मुक्ति भी प्रदान करते हैं)

 

मनु महाराज का कथन है :-

”विधि यज्ञा जप यज्ञो-विशिष्टों दशभिगुर्णै”

आगम शास्त्रों में जप की महिमा का वर्णन निम्न प्रकार किया गया है:-

”जप यज्ञात्परो यज्ञो-नापरोस्तीह कश्चन:

तस्मात्जपेन धर्मार्थं-काम मोक्षाश्च साधयेत्”

 

(जप यज्ञ के समान श्रेष्ट कुछ भी नहीं है। अत: जप करके धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष की प्राप्ति करनी चाहिए।)

 

अन्यच्च :-

”सर्वयज्ञेषु सर्वत्र-जप यज्ञ: प्रशस्यते

तस्मात्सर्व प्रयत्नेन-जप निष्ठापरो भवेत्”

 

(अत: समस्त प्रयास करते हुए जप में पूर्ण निष्ठा रखनी चाहिए। सर्वत्र तथा सर्वकाल में जप करना प्रशस्त है।)

 

भगवान श्रीकृष्ण जप की श्रेष्टता का सम्पादन करते हुए कहते हैं कि मैं ही यज्ञो में सर्वश्रेष्ट जपयज्ञ हूँ:-

 

”यज्ञानां जप यज्ञोस्मि।”

 

आचार्यपाद शंकराचार्य जी जप को ही योगक्षेम का कारण मानते हैं :-

 

”तवापर्णे कर्णे विशति मनुवर्णे फलमिदम्

जन: को जानीते जननि जपनीयं जप विधौ”

 

आचार्यपाद के अनुसार जप यज्ञ अत्यन्त कठिन एवं गुरूमुखगम्य है। जप किसी मंत्र विशेष का किया जाता है तथा मंत्र अक्षरों से बनता है। अक्षर = अ+क्षरण अर्थात् जिसका नाश नहीं होता वही अक्षर है तथा मंत्र ही अक्षर ब्रह्म है। अक्षरों से बना मंत्र इसी कारण ‘शब्दब्रह्म’ कहा जाता है। वेदपाठ एवं स्तोत्रादि का उच्च स्वर से पाठ करते समय समीपवर्ती वातावरण भी पवित्र हो जाता है तथा आनन्द की प्राप्ति कराता है।

 

शास्त्रों में जप के विभिन्न स्वरूपों का वर्णन करते हुए उनकी पारस्परिक महत्ता का प्रतिपादन किया गया है :-

 

”वाचिकश्च उपांशुश्च-मानस स्त्रिविधि स्मृत:

त्रयांणा जप यज्ञांना-श्रेयान् स्यादुत्तरोत्तरम्”

 

अर्थात् वाचिकजप से श्रेष्ट उपांशु जप तथा उससे श्रेष्ठ मानसिक जप माना गया है। जब तक सतत अभ्यास द्वारा साधक की वृत्ति अन्तमुर्खी नहीं हो जाती तब तक जप का उद्देश्य सफल नहीं हो सकता है। जप की सिद्धि का सम्बन्ध प्राणों(वायु) के आयाम (रोकना) से भी होता है। जप जितना अन्तमुर्खी होता जायेगा उस समय श्वास की गति उतनी ही कम (मन्द गति) हो जायेगी तथा एक आनन्द की अनुभूति होगी।

 

”मनसा य: स्मरेस्तोत्रं वचसा वा मनु जपेत्। उभयं निष्फलं देवि।”

 

(स्तोत्र को मन ही मन पढ़ना तथा जप को वाणी से उच्चारण करना निष्फल हो जाता है।) जप हमेशा मानसिक होना चाहिए।

 

”उत्तमो मानसो देवि! त्रिविध: कथितो जप:”

 

अभ्यास करते-करते साधक को निम्न छ: प्रकार की स्थितियों से गुजरना पड़ता है यथा- परातीतजप, पराजप, पश्यन्ती जप, मध्यमा जप, अन्त:वैरवरी जप तथा बहिरवैरवरी जप। जिस जप में जीभ तथा होठों को हिलाया जाता है वह जप बहिरवैरवरी के अन्तर्गत आता है। जब जिह्वा तथा होठों का संचालन किए बिना जप आरम्भ हो जायेगा उस समय जप के स्पन्दनों का प्रवाह हृदय चक्र की तरफ होने लगेगा तथा श्वास की गति अत्यन्त धीमी हो जायेगी। बाहर की तरफ श्वास चलना लगभग बन्द हो जायेगा। गुरूमुख से प्राप्त चैतन्य मंत्र का जप करते समय साधक को इस स्थिति का लाभ अल्प समय में ही मिलने लगता है। यह केवल स्वानुभव का विषय है। ऐसा जप साधक के मूलाधार चक्र, स्वाधिष्ठान तथा मणिपूरक चक्र में स्वयं उच्चरित होता हुआ प्रतीत होता है। यह स्थिति मध्यमा जप सिद्ध हो जाने पर आती है तथा वास्तविक जप का श्री गणेश यहीं से माना जाता है। ऐसी अवस्था आ जाने पर साधक की वृत्ति अन्तमुर्खी हो जाती है और तब जप करने के लिए किसी आसन विशेष की आवश्यकता नहीं रह जाती। इस जप का साधक लेटे, सोये, उठे, बैठे, खाते-पीते भी अनुभव कर सकता है। शास्त्र बताते हैं कि मध्यमा जप की स्थिति आ जाने पर अनाहत चक्र में कई तरह के नाद भी उत्पन्न होते हैं जिन्हें जप कर्ता सुन सकता है। प्राय: साधक को अपना मंत्र अन्दर से स्वयं ही सुनाई देता है।

मध्यमा स्थिति के पश्चात् जप की तीसरी भूमिका पश्यन्ती पर साधक पदार्पण करता है। ऐसी स्थिति में साधक को अपना मंत्र आज्ञाचक्र (भ्रूमध्य) में प्रतिविम्बित होता दिखाई देता है। आचार्यपाद शंकराचार्य जी ने पश्यन्ती जप का स्थान आज्ञाचक्र बताते हुए लिखा है :-

 

”तवाज्ञाचक्रस्थं तपन शशि कोटि द्युतिधरं

परंशम्भु वन्दे परिमिलत पार्श्वं परिचिता”

 

(सौन्दर्य लहरी)

जप से उत्पन्न नाद की स्थिति केवल विशुद्धि चक्र (कंठ स्थान) तक ही सीमित रहती है। उसके बाद आज्ञा चक्र में स्वमंत्र प्रकाशमय अवस्था में दिखाई देता है। अत: आज्ञाचक्र के ऊपर के चक्रों में स्वमंत्र का दर्शन होना ही पश्चन्ती जप का सिद्ध हो जाना माना जाता है।

 

जब स्वमंत्र के सभी स्वर-व्यंजन सकुंचित होकर बिन्दु में लय हो जाते हैं तो यह अवस्था ‘पराजप’ की अवस्था कही जाती है। इस स्थिति को प्राप्त साधक परमानन्द की अनुभूति करने लगता है। इस अवस्था का वर्णन भगवान् श्री कृष्ण ने भी किया है :-

 

”युन्जन्नेवं सदात्मांन-योगी विगत कल्मश:

सुखेन ब्रह्म संस्पर्श-अत्यंन्त सुख मश्नुते।।”

 

  (गीता)

 

इससे पूर्व के श्लोक में कहा गया है कि जिस प्रकार कछुआ अपने सभी अंगो को अपने में ही समेट कर छोटा हो जाता है उसी प्रकार मंत्र के वर्णादि भी बिन्दु में लय हो जाते हैं। इस बिन्दु का कम्पन ही आत्मसाक्षात्कार की अनुभूति दिलाता है जिसे ब्रह्म संस्पर्श का आनन्द मिलना कह सकते हैं।

 

मंत्र के अवयवों का शुद्ध उच्चारण जिह्वा तथा हौठों के विभिन्न स्थानों पर स्पर्श के कारण होता है परन्तु मंत्र के अद्धर्मात्रा में स्थित बिन्दु का उच्चारण सही रूप से तभी हो पाता है जब श्री सत्गुरू शिष्य को इसे उच्चारित कर बताते हैं। इसके सम्बन्ध में निम्न प्रमाण है –

 

”अमोध  मव्यंजन मस्वंर च-अंकढ ताल्वोष्ट नासिकं च

अरेफ जातोपयोष्ठ वर्जितं-यदक्षरो न क्षरेत् कदाचित।।”

 

सहस्रार एवं उसके ऊपर के चक्रों-स्थानों पर ब्रह्मसंस्पर्श ही जप की अनुभूति कराता है। यहॉं पर समस्त बाह्य कियाऐं नष्ट हो जाती हैं। इस विषय पर आगम बचन है :-

 

”प्रथमे वैखरी भावो-मध्यमा हृदये स्थिता

भ्रूमध्ये पश्यन्ती भाव:-पराभाव स्वद्विन्दुनी।।”

 

महानिर्वाण तन्त्र में इनका सम्बन्ध वहिरअर्चन-ध्यानादि के साथ निम्न प्रकार वर्णित हैं –

 

उत्तमों ब्रह्म सद्भावो             यह परावाक् नाम अन्तिम स्थिति है।

 

ध्यान भावस्तु मध्यम           यह पश्यन्ती स्थिति है।

 

जप-पूजा अधमा प्रोक्ता         यह मध्यमा जप की स्थिति है।

 

बाह्यपूजा अधमाधमा           यह वहिरवैर्रवरी स्थिति है।

 

इस प्रकार सतत जप से आत्म-साक्षात्कार रूपी लक्ष्य की प्राप्ति हो जाती है। पूर्वोक्त अवस्थाओं की प्राप्ति हेतु हठयोगादि का अवलम्बन न केवल दुरूह वरन् परम हानिकारक भी सिद्ध होता है। आगम शास्त्र जप की सिद्धि के लिए निम्न उपायों का वर्णन करने हैं :-

 

(1) सिद्ध गुरू की प्राप्ति (2) स्वगुरूक्रम का यथोक्तचिन्तन (3) शुद्ध संस्कारों की प्राप्ति (4) मल निवृत्ति (आणव, मायिक, कार्मिक) (5) वीर साधना का अवलम्बन(6) पूंर्वाग तथा उत्तंराग जप।

 

उपरोक्त सभी उपायों का विस्तृत वर्णन आगम शास्त्रों में मिलता है जिनके अवलोकन से ज्ञात होता है कि ये सभी अंग सिद्ध भूमिका में आरोहण करने के लिए नितान्त आवश्यक हैं। मूल मंत्र जप के साथ ही जप के पूंर्वाग तथा उत्तरांग मंत्रो का जप भी करना पड़ता है जो कि निम्नानुसार है :-

 

(1) मंत्र के शिव का जप (2) कुल्लका मंत्र (3) मंत्र उत्कीलन (4) संजीवन मंत्र(5) मंत्र शिखा (6) मंत्र चैतन्य (7) मंत्रार्थ (8) मंत्र शोधन (9) मंत्र संकेत (10)मंत्र ध्यान (11) सेतु (12) महासेतु (13) निर्वाण मंत्र (14) दीपिनी मंत्र (15)चौरमंत्र (16) मुख शोधन (17) मातृका पुटित जप।

 

स्थूल से सूक्ष्म की तरफ अग्रसर होना ही मंत्र जप का रहस्य है। जिसके लिए आगम शास्त्र कहते हैं :-

 

”पूजा कोटि संम स्तोत्रं-स्तोत्र कोटि समो जप

 

जप कोटि समो ध्यानं-ध्यान कोटि समो लय:।।”

 

अर्थात् वाहरी पूजा से स्तोत्रपाठ करना श्रेष्ट है। स्तोत्रपाठ से जप करना करोड़ गुना श्रेष्ट है। जप से ध्यान करना श्रेष्ट है। ध्यान से करोड़ गुना फलदायक ‘लय’ अवस्था (आत्मसाक्षात्कार) प्राप्त हो जाना है। जप के सम्बन्ध में उक्तानुसार संक्षेप में विवेचन किया गया है परन्तु समस्त प्रयासों के बावजूद भी मंत्र वही सिद्ध होगा जो शिष्य को सक्षम गुरू से प्राप्त हुआ होगा। आगम शास्त्र कहते हैं:-

 

सिद्ध मंत्र गुरोर्दीक्षा-लक्ष मात्रेण सौख्यदा

 

महामुनि मुखान्मत्रं-श्रवणाद् भुक्ति-मुक्तिदम्

 

जपहीन गुर्रोर्वक्त्रा-पुस्तकेन समं भवेत।”

डॉ. दीनदयाल मणि त्रिपाठी ( प्रबंध सम्पादक )

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