जानिये छिन्नमस्ता महाविद्या को

जानिये छिन्नमस्ता महाविद्या को   

पाकयज्ञ, हवीर्यज्ञ,महायज्ञ, अतियज्ञ, शिरोयज्ञ,ऐसे पांच प्रकार के यज्ञ याने श्रुष्टि का मूल यज्ञ !!!

अथवा ऐसे भी बोल सकते हो कि सृष्टि के मूल यज्ञ के ही यह पांच भाग है,।(यज्ञ याने श्रुष्टि चलाने के लिए उपयोग में आने वाले कर्म….)

श्रुति के कथनानुसार यह सब यज्ञ छिन्न शीर्ष ही है (उदा: हम खाना खाते हैं वो भी एक यज्ञ ही है,पर ध्यान में रखने योग्य बात यह है कि वह अधो मुख ही जाता है उसको शीर्ष नही है,)

जो महामाया षोडशी के रूप के अनंतर भुवनेश्वरि बन कर श्रुष्टिपालन करती है, वो ही अंतकाल में छिन्नमस्ता बन कर नाश करती है(स्वत:में ही समा लेती है,)

करत्री,खापर, रक्त,नाग,दिगम्बर तत्व,इत्यादि इस सहरशक्ति की प्रतीक है,(रेणुका,एकवीरा,यह छिन्नमस्ता का ही रूप है!!!!स्थान :माहुर गढ़ ,कार्ला)

छिन्नमस्ता का फोटो अगर आप देखेंगे तो छिन्नमस्ता जी का सिर धड़ से अलग है उनके धड़ से रक्त की तीन धाराएं बह रही है, यह तीन धाराएं हमारी तीनो मुख्य नाड़ियो के प्रतिक है, इड़ा, पिंगला,सुषम्ना, आप देखेंगे उनकी दो सखिया उनके धड़ से निकलने वाली दो रक्त धाराओ का  प्राशन कर रही है, यह दोनों रक्त धारा इड़ा ओर पिंगला है जो योगी इड़ा ओर पिंगला में समा जाता है वह माया में रह कर ईश्वर को प्राप्त हो जाता है, अब आप छिन्नमस्ता जी का फोटो देखेंगे तो ये पाएंगे के रक्त की तीन धाराओ में से एक मुख्य धारा को  छिन्नमस्ता स्वयं ग्रहण कर रही है इसका मतलब ये हुआ कि जो योगी सुषम्ना नाडी में सदा के लिए स्थिर हो जाता है वह स्वय ईश्वर बन जाता है…..

 

अखिलेश्वरनन्दनाथ भैरव(ज्ञानेंद्रनाथ)

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