जानिये  जनसंसद (CIVIL PARLIAMENT) को

जानिये  जनसंसद (CIVIL PARLIAMENT) को

परिभाषा-लोकतंत्र को लोगों तक ले जाने के लिए, लोगों का,लोगों के लिए, लोगों द्वारा सामुहिक प्रयास

 

उद्देश्य – सत्ता की दो चाबियां हों, ताकि समाज और सरकार एक दूसरे के पूरक बन अपनी अपनी चाबी का इस्तेमाल कर सकें। यानि समाज तक लोकतंत्र के पहुंचने के दो लक्षण माने जा सकते हैं।

 

पहला, पहल करने का अधिकार

दूसरा,

अपना गांव या वार्ड चलाने का पूर्ण अधिकार, ये दोनों अधिकार ही लोकतंत्र के ज़मीन तक पहुंचने का प्रमाण होंगे। इन दोनों लक्ष्यों की व्याख्या सबसे नीचे दी गई है।

 जनसंसद 

जनसंसद के लिए ग्रामीण इलाकों में हर ब्लाॅक से 1 जनप्रतिनिधि होगा, जो पहले साल 10 गांवों के 20-20 प्रमुख लोगों का सहमति पत्र केंद्रीय कार्यालय को भेजने के बाद जन संसद में हिस्सा ले सकेगा। वहीं शहरों में 2 लाख की आबादी पर एक सदस्य होगा।

2020 में होने वाली दूसरी जनसंसद में, जनप्रतिनिधि, ब्लाॅक के हर गांव के कम से कम 20 लोगों की ग्राम संसद समिति के सदस्यों की बड़ी बैठक होगी, जिसमें वो सर्वसम्मित से अगले जनप्रतिनिधि को तय करेंगे। साथ ही अपने क्षेत्र की बड़ी समस्या भी बतायेंगे, किस मंत्रालय से क्या सवाल पूछना है, बताऐंगे, और क्या सुझाव है, उनका ये भी… दरअसल वही तो भारत भाग्यविधाता हैं ..

जनसंसद एक स्थाई व्यवस्था होगी, जो किसी संस्था का हिस्सा ना होकर, सीधे समाज का प्रतिबिंब होगी, परंतु सभी संस्थाऐं,संगठन और समूह समाज की एक सांझा ताकत के लिए जनसंसद को अपनी अपनी ताकत देंगे।

इसका आयोजन हर वर्ष कम से कम पांच दिन के लिए होगा, पांच दिनों में 10 सत्र होंगे, 1 दिन में 5 से 6 मंत्रालयों को शामिल किया जाएगा, जिनसे बीते साल के काम पर सवाल, और आगामी वर्ष के लिए सुझाव दिए जाऐंगे।

जनसंसद, की कार्यवाही भाषणबाजी से दूर, समस्याओं, सवालों और सुझावों पर केंद्रित होगी, जनप्रतिनिधि, के पास तीनों काम रहेंगे, अपने क्षेत्र की समस्या उठाना, मंत्रालय से सवाल पूछना और प्रस्ताव के रूप में सरकार को समाज की आज्ञा से अवगत कराना।

जनसंसद का प्रथम सत्र अध्यक्ष के 10 मिनट के भाषण से शुरू होगा, उसके बाद 1 घंटे का शुन्यकाल होगा, जिसमें हर जनप्रतिनिधि अपने ब्लाॅक से जुड़ी किसी एक समस्या को सदन के पटल पर रख सकेगा। इसके बाद 2 घंटे का प्रश्नकाल होगा, जिसमें छह मंत्रालयों से संबंधित सवाल पूछे जाऐंगे।

भोजन के बाद, दूसरे सत्र में विधायी कार्य होंगे, जिसमें जनप्रतिनिधि उन्हीं छह मंत्रालयों से संबंधित सुझाव प्रस्ताव रखेंगे। यही प्रस्ताव सरकार के लिए आगामी वर्ष का एजेंडा होगें, जिसे पूरा करना किसी भी सरकार का दायित्व होगा, क्यूंकि समाज ही परमात्मा का प्रत्यक्षीकरण है, उसकी इच्छा किसी भी सरकार के लिए आज्ञा से कम नहीं।

दूसरे सत्र के समापन पर भी 10 मिनट का अध्यक्षीय भाषण होगा, जिसमें उस दिन की समीक्षा, अगले दिन के लिए मार्गदर्शन शामिल होगा।

जनसंसद के अंतिम दिन लोकतंत्र को जमीन तक ले जाने के लिए संकल्प प्रस्ताव पारित होगा, तब तक, जब तक कि आ न जाए, ये संकल्प हर वर्ष दोहराया जाएगा।

सुझाव है कि देश की प्रथम जनसंसद का आयोजन, मार्च के प्रथम सप्ताह में किया जाए

जनप्रतिनिधि के जनसंसद में आने-जाने और उसके खाने, पीने और ठहरने की व्यवस्था वो लोग करेंगे, जो मालिक हैं, जिन्होंने उसे अपना प्रतिनिधि बनाकर भेजा है। यही आदर्श भी है, नहीं तो वो प्रतिनिधि ना बनकर खुद मालिक बन जाएगा।

फालोअप

सत्र के अंतिम दिन, हर कमिश्नरी से आए जनप्रतिनिधि एक बैठेंगे। अपनी कमिश्नरी के हर गांव और हर शहरी वार्ड के 20-20 सदस्यों का मिलाकर एक सम्मेलन आयोजित करेंगे, जो अगली जनसंसद से 3 महीने पहले तक पूरे कर लिये जाऐं।

इस सम्मेलन में कमिश्नरी के लोग, जिस किसी भी कार्यकर्ता के प्रवास की मांग करेंगे, वो अपने उस कार्यक्रम में प्रवक्ता के तौर पर शामिल होगा।

इसी सम्मेलन में अगले, जनप्रतिनिधि का सर्वसम्मित से चयन होगा।

अगर जनप्रतिनिधि के लिए 2 या अधिक नाम सामने आते हैं, तो क्रम से 1-1 सदस्य को क्रमशः जनसंसद में जाने के लिए तय माना जा सकता है।

 आचार्यकुलम्

लोकतंत्र को जमीन तक पहुंचाने  के लिए एक आचार्यकुलम् का भी गठन होगा।

जिसके पहले 2 सस्दयों की घोषणा सर्वसम्मित से जनसंसद करेगी, तीसरे सदस्य की घोषणा आपसी सहमति से पहले दो सदस्य, और चैथे की पहले तीन, यानि किसी भी नए सदस्य को बाकी सदस्य सर्वसम्मित से ही शामिल कर सकेंगे।

आचार्यकुलम् की संख्या आदर्श संख्या 20 से पच्चीस या कुछ ज्यादा भी हो सकती है।

आचार्यकुल की भूमिका, जनसंसद के लिए राष्ट्रपति सरीखी होगी, ये बेहद सम्मानित कुल होगा।

ये एक मार्गदशर्क मंडल की तरह होगा। इतना ही नहीं। सालाना जनसंसद की अध्यक्षता भी आचार्यकुल के सदस्य करेंगे। मसलन 5 दिन की जनसंसद में आचार्यकुलम् के 10 सदस्य उसकी अध्यक्षता कर सकते हैं।

अर्हता- वो, जो अपने आगे का जीवन पूरी तरह से सामाजिक मुक्ति के इस यज्ञ में समर्पित कर सके। वो, जो परिवार की जिम्मेदारियों से मुक्त हो चुका हो।

नीति सभा

ये अलग अलग क्षेत्रों के विशेषज्ञों की सभा होगी, जो देश के विकास में हर क्षेत्र के लिए अपने अपने सुझाव तैयार करेगी, अगर किसी जनप्रतिनिधि को कोई सुझाव उपयुक्त लगता है, तो वो उस सुझाव को नीति सभा के सदस्य का नाम लेकर सदन के सामने रख सकता है।

नीति सभा में 122 सदस्य होंगे, हर सदस्य, किसी एक कमिश्नरी का आमंत्रित सदस्य होगा। जो इस पूरे काम में उस कमिश्नरी के लोगों का मार्गदर्शन, और समन्वय भी करेगा।

नोट- चूंकि ये आपके बिना संभव नहीं है, इसलिए आपके सुझाव के लिए प्रेषित

व्याख्या

पहला लक्ष्य-लोगों को पहल करने का अधिकार हो

(  यानि कोई भी व्यक्ति, यदि चुनाव आयोग की निगरानी में 50 ग्राम सभा/ वार्ड सभा में बहुमत से किसी भी प्रस्ताव को पास करवा लेता है, तो उस पर आयोग देश की सभी ग्राम/वार्ड सभाओं मंे जनमत संग्रह करवाए, यदि प्रस्ताव पास हो जाए तो वो सीधे एक्ट मानकर सीधे लागू कर दिया जाए।

ऐसे प्रस्ताव जिन्हें 91 फीसदी मत प्राप्त हों, उन्हें 15 साल, जिन्हें 71 फीसदी प्राप्त हों, उन्हें 10 और जिस प्रस्ताव को 51 फीसदी ही मत प्राप्त हों, उसे सिर्फ पांच साल के लिए कानून बनाया जाए। समय पूरा होने पर कोई चाहे तो उसकी समीक्षा कर सकता है।)

दूसरा

गांव/शहरों में वार्ड चलाने का पूर्ण अधिकार

(जिस तरह से केंद्र सरकार देश चलाने का काम करती है, राज्य सरकार राज्य को, उसी तरह गांव या वार्ड में रहने वाले लोग, इन स्थानीय इकाईयों का संचालन करें।

मसलन, केंद्र या राज्य सरकारें, गांव या वार्डों के लिए योजनाऐं न बनाकर उनके लिए आबादी के हिसाब से उनका बजट आवंटित करें।

प्रधान या पार्षद के चुनावों को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया जाए। इस बजट को खर्च करने का काम उन लोगों को दे दिया जाए, जो गांव चलाना चाहते हैं। बस एक शर्त के साथ जो इस ग्राम संसद समिति या वार्ड संसद समिति में शामिल हों, वो सबकी उपस्थिति और सबकी सहमति के सिद्धांत पर व्यवस्था के संचालन का संकल्प लें। शुरू में इस समिति की संख्या कम से कम 20 हो, जिसमें अंततः हर परिवार का कम से कम 1 सदस्य शामिल होने का अधिकारी है।

जिस गांव या शहरी वार्ड के हर परिवार का सदस्य इस समिति का सदस्य बन जाएगा, उस दिन वो गांव या वार्ड, ग्राम संसद या वार्ड संसद का रूप ले लेगा। आशा है कि, इस तरह जनसंसद लोकतंत्र की गंगा को संसद से सड़क तक ले जाने के लक्ष्य में सफल होगी।

रामवीर श्रेष्ठ ( वरिष्ठ पत्रकार )

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