जानिये धर्म क्या है ?

धर्म क्या है ? किसे कहते हैं धर्म ? क्या उसका कोई लक्षण भी है ? धर्म की परिभाषा क्या ? धर्म – अधर्ष का भेद कैसे समझे ? धर्म धारण से , पालनापालन से , लाभ – हानि क्या है ? ऐसे अनेको प्रश्न आरम्भकाल से ही मनुष्यों को सताते है ? आज भी सामान्यतः मनुष्य ” धर्म ” की जिज्ञासा को लेकर भ्रान्त है । इसी भ्रान्तवश कई तरह के लोग ” धर्मान्तरण ” के बलि चढ़ रहे हैं ? प्रश्न यह भी है कि ” धर्म ” परिवर्तन उचित है या नहीं ? ” धर्मत्याग ” एवं ” अन्यधर्मस्वीकार ” किस आधार पर अथवा किस विधि से उचित है ? उचित है भी या नहीं ?

” धर्म ” शब्द जातिवाचक है कि पंथ वाचक वा सप्रदायवाचक ? यह भी उन प्रश्नों में – से एक प्रश्न है , जिसका ज्ञान हमारे वर्तमान पीढ़ी को न कराया जाय तो भविष्य में न जाने कितनी भ्रान्तियाँ और अगणित अनर्थ पनपने लगेंगे जैसे कि – नये – नये बढ़ते रोग , और बिमारियाँ ।

किसी भी विषय अथवा जिज्ञासा की शान्ति हेतु सर्वप्रथम हम शास्त्र को प्रमाण मानते हैं और यह कटु सत्य है कि ” शास्त्र ” किसी एक व्यक्ति विशेष की देन नहीं है। सभी शास्त्रों का मूल ” वेद”  है । ” वेदों ” को सरल भाषित करने हेतु ” उपनिषद् , गीता , ब्रह्मसूत्र , तथा च पुराणइतिहासादि ” की रचना की गयी । ” मनुस्मृति ” आदि ग्रन्थ जिन्हें ” धर्मग्रन्थ ” कहते हैं , उनका मूल – आधार ” वेद ” ही है । यह भी निश्चय तथ्य है कि ” वेदों ” को सभी मानते हैं । जैसे कि ” श्रीमद्भगवद्गीता ” है जो कि उपनिषदों का सार अर्थात् वेदों का ही सार है जिस पर किसी का भी कोई आक्षेप नहीं है । कतिवन विद्वान् इस ” गीताग्रन्थ ” को भारतीय लोगों का ” धर्मग्रन्थ ” मानते हैं । यह भी एक आश्चर्य है कि इस ग्रन्थ का आरम्भ ” धर् ” वर्ण से होकर अन्त ” म ” वर्ण से ही हुआ है । निश्चित ही सभी मनुष्यों को अपने एवं सभी जीवों के कल्याण व सुख – शान्ति के लिए जीवन में पालनयोग्य , आचरणयोग्य सभी बातें हर तरह से दिग्दर्शित कराने का अथक प्रयास इसमें किया गया है , जिसे धर्म का स्वरूप , धर्म का अर्थ , परिचय , लक्षण , धर्म की परिभाषा मानने में कोई झिझक या आशंका नहीं होनी चाहिए । धर्म को समझने के लिए ” गीताग्रन्थ ” को समझना पर्याप्त है ।

” मनुस्मृति ” आदि धर्मग्रन्थों में धर्म को दिग्दर्शित कर ” सर्वे भवन्तु सुखिनः ” सर्वहितार्थ यथायोग्य आचरण करने हेतु जीवन व्यवहार को निश्चित अनुशासित करने हेतु यथासंभव सर्वतोभावेन महर्षि – मुनियों ने प्रयास किया है । वे महर्षि – मुनि किसी जाति के अथवा वर्गविशेष के नहीं अपितु वनस्थ सर्वसंगपरित्यागी { गृहत्यागी } वानप्रस्थी , संन्यासी होते थे जो कि चतुर्वर्णातिरिक्त – जातिधर्म से हटकर सर्वहितार्थ जीते थे , उनकी कृतियाँ भी निष्पक्ष वेदानुगामी सर्वहितार्थ होती थी । उनका यह वचन भी –

” तर्को प्रतिष्ठः श्रुतया विभिन्ना नैको महर्षिर्यस्य मतं प्रमाणम् ।

धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायाम् महाजनो येन गतः स पन्थाः ।। ”

यह आज भी चरितार्थ है । मनुस्मृतिकार ने ” धर्म ” को दिग्दर्शित करते हुए ” धर्म ” के दस लक्षण बतलाये हैं । इससे ” धर्म ” का स्वरूप सुस्पष्ट हो जाता है ।

” धृति क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः ।

धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ।। ”

इसी प्रकार ” वैशेषिक दर्शनकार ”  – *यतोभ्युदयनिः श्रेयस सिद्धिः स धर्मः* बतलाते है ।  इससे वास्तविक धर्म का स्वारूप स्पष्ट हो जाता है । सत्य तो यह है की ‘ धर्म का स्वरूप अतिसूक्ष्मसे भी सूक्ष्म है उसी तरह व्यापक से भी अतिव्यापक है । शब्दोंसे धर्म को स्पष्ट करना वैसे ही कठिन जान पड़ता है , जैसे समुद्र को सीप में समेटना ।

धर्म को समझना और धर्मानुकूल आचरण करना भी अतिकठिन है जितना सरल भी । कठिन इसलिए कि तत्त्वेत्ताओं ने उसे ” क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गपयस्तत् कवयो वदन्ति ” आत्मतत्त्वत् अतिशय दुर्ग बतलाया है । धर्माचरण से जीवों का कल्याण , अभ्युदय ही होता है । जो हानि पहुँचा दे , कष्ट दे वह धर्म कैसे हो सकता है ? महाभारत के वनपर्व में कहा है कि –

” धर्म यो बाने धर्मो स धर्मः कुवर्त्य तत् ।

अविरोधात्तु यो धर्मं स धर्मः सत्यविक्रम ।। ”

निश्चय ही जो सबको सुख दे , शान्ति दे वही एक धर्म है जो सृष्टिकाल से निरन्तर चला आ रहा है इसलिए उसे ” सनातन ” कहते हैं । वेदों के द्वारा ही प्रमाणित है , विहित है , अतः वह ” वैदिक धर्म ” है , किसी व्यक्तिविशेष द्वारा प्रेरित वा संस्थापित नहीं है । इसे आर्यसंस्कृति वालोंने सर्वदा अपनाया है इसलिए इसे ” आर्य ” भी कहते हैं । इस प्रकार ” वैदिक सनातन , आर्य धर्म ” ही अतिप्राचीन एवं सर्वहितकारी समस्त संसार का कल्याणकारी उदार हृदयवाला एक मात्र धर्म है । यह कोई सम्प्रदाय वाची पंथ अथवा जातिवाचक कदापि नहीं । मूलतः प्रत्येक जीव का कल्याण चाहनेवाला , किसीसे किसी प्रकारका द्वेष न रखनेवाला और उसके सेवन से निःश्रेयस मोक्ष देने वाला यही एक धर्म सारे जीव – जन्तुओं का समस्त मानवों का आदि धर्म है । जिस तरह प्रत्येक जीव का ” लाल ” ही रक्त है अन्य रंग का नहीं , ठीक उसी तरह प्रत्येक जीव का जन्मतः वही वास्तविक धर्म है । वह उसके अन्तरात्मा में है , रग – रगमें है जो त्यागने से व्यक्त नहीं हो सकता और न ही नये सिरे से ग्रहित हो सकता है । वह तो जन्मतः अनादिकाल से छायाकी तरह साथ में है । उसने ही सबको धारण किया हुआ है।

” धारणात् धर्ममित्याहुर्धर्मो धारयते प्रजा ।

यत् स्यात् धारणसंयुक्त स धर्म इति निश्चय ।। ”

इसी प्रकार उसी महाभारत में धर्म का एक संक्षिप्त स्वरूप बखान किया गया है –

” अद्रोह सर्वभूतेषु कर्मणा मनसा गिता ।

अनुग्रहश्च दानं च सतां धर्मः सनातनः ।। ”

इस सनातन धर्म की तटस्थता व उदारता अपने आपमें एक मिसाल है । ” वसिष्ठस्मृतिकार ” ने इस उदारता को इस प्रकार से व्यक्त किया है –

” धर्मं चरत माधर्मं सत्यं वदता ना नृतम् ।

दीर्घं पश्यत मा हस्वं परं पश्यत मापरम् ।। ”

जन्मतः सबकी प्रवृत्ति विभिन्न होते हुए भी स्वभाव भिन्न होते हुए भी अपने विवेकबुद्धि का प्रयोग करते हुए दूसरों को कष्ट न पहुँचे इस तरह का आचरण भी धर्म ही है । कहा भी है –

” अष्टादशपुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम् ।

परोपकाराय पुण्याय पापाय परपीडनम् ।। ”

पुण्य ही धर्म है और पाप अधर्म । स्वयंका भी हित सिद्ध हो व दूसरों का भी अहित न हो यह धर्माचरण ही है । तटस्थभाव से विचार करने पर यही प्रतीत होता है कि सबका ईश्वर एक ही है और धर्म भी एक ही है । धर्म को संक्षेप में इस प्रकार भी बतलाया गया है –

” एष धर्मो महायोगो दानं भूतदया तथा ।

ब्रह्मचर्यं तथा षत्यमनुकोशो धृति क्षमा ।

सनातनस्य धर्मस्य मूलमेतत्तनातनम् ।। ”

जो लोक कहते कि – ” धर्म सताते हुए प्राणी की सिसकी है , निर्दयी विश्वका हृदय है , नितान्त ही अध्यात्मविरोधी परिस्थितियों की भावना है । यह गरीबों की अफीम है । ” उन लोगों ने धर्म को जाना ही नहीं । धर्म को जाने बिना ही धर्म की गलत व्याख्या कर लेते है लोग । धर्म तो वह है जो स्वयं लिए है । वेदादिशास्त्र एक मुख से कहते ” *सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् । न ब्रूयात् सत्यम् , अप्रियम् । प्रियं च न अनृतः ब्रूयात् एष धर्मं सनातनः ।। “*

आज वर्तमान समय में सारे जहाँ सम्पूर्ण जगत् में मनुष्य क्या करे और क्या न करे प्रश्न से असमंजस में है । ऐसी अवस्था में सर्वहितकारी सबका मार्गदर्शक मात्र शास्त्र ही है।

*” तस्मात् शास्त्रं प्रमाणं तै कार्या – कार्यव्यवस्थितौ । “*

हम देखते हैं कि परिवार संचालन के लिए राज्य संचालन के लिए नियमानुशासन की कायदे – कानुन की आवश्यकता होती है । इस प्रकार सम्पूर्ण संसारके संचालन के लिए भी धर्म की आवश्यता निश्चित है ।

हे मेरे प्रभु ! धर्माचरण के लिए अनुग्रह करना।

 

डॉ. दीनदयाल मणि त्रिपाठी प्रबंध सम्पादक 

Mysticpowernews

मिस्टिक पावर (dharmik news) एक प्रयास है धार्मिक पत्रकारिता(religious stories) में ,जिसे आगे अनेक लक्ष्य प्राप्त करने हैं सर्वप्रथम पत्रिका फिर वेब न्यूज़ और अगला लक्ष्य सेटेलाइट चैनेल ............जिसके द्वारा सनातन संस्कृति(hindu dharm,sanatan dharma) का प्रसार किया जा सके और देश विदेश के सभी विद्वानों को एक मंच दिए जा सके | राष्ट्रीय और धार्मिक समस्याओं(hindu facts,hindu mythology) का विश्लेषण और उपाय करने का एक समग्र प्रयास किया जा सके |

Mysticpowernews has 574 posts and counting. See all posts by Mysticpowernews

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *