जानिये प्रथम महाविद्या काली को

जानिये प्रथम महाविद्या काली को

Pratper ऐसे विश्वातीत महाकालपुरुष के शक्ति का नाम *”काली”*है……

शक्ति ओर शक्तिमान एक ही है ,यही अद्वेत सिद्धांत यहाँ अक्षुण्ण रहता है यही ध्यान में रखे…..

अप्रज्ञात, अलक्षण, अपरतवर्य, अनिर्देश्य, ऐसे paratper तत्व ही *महाकाल* होता है……

उनकी ही शक्ति याने काली,श्रुष्टि निर्मिति के पहले, इस महाविद्या का साम्राज्य रहता है, यही महाशक्ति का प्रथम स्वरूप है,प्रथमा ,आद्या यह अन्य नाम है…….

आगे के विवेचन के लिए एक बात समझले की दिन का प्रतीक याने श्रुष्टि ओर रात यह प्रलय का प्रतीक है,श्रुष्टि के पहले प्रलयकाल रहता है,इस मे भी मध्यरात्रि का काल घोरतम होता है, रात के 12 बजे के बाद सूर्योदय के पहले का सम्पूर्ण काल ही काली है……

इस के बाद क्रम क्रम से अंधियारा दूर होने लगता है,(मूल श्लोकमें संस्कृत शब्द “तम ह्रास”)अभी तक के इस काल को (अंधकारमय काल)हृषियों ने 84 भागो में विभक्त किया है,अब इस काल पर जय हो इस लिए शक्ति अर्जित करना है वो तो निर्गुण है,अब ये सुलभ हो इस लिए ,शक्ति के इन रूपो को समजने के लिए मूर्ति (प्रतिमा)तयार कि गयी ,कारण सगुन में से आचरण सुलभ रहता हैं ना,,,,,इसी रूप की साधना उपासना आज भक्त ,तांत्रिक  करते रहते है…….

प्रलयरात्री की मध्य से संबंध रखनेवाली महाशक्ति काली है,जब तक विश्व शक्तिमय(शक्तिमान) रहता है ,तब तक वह *शिव* ओर शक्ति दूर हो गयी तो जो बाकी रहता है वो “शव” !!अर्थात उसका स्वरूप ही नष्ट हो जाता है……

महाकालजी की शक्ति कालिका आविर्भाव /विकास विश्व के पहले का है,विश्व का संहार याने लय करनेवाली *”कालरात्रि”* वो यही है, प्रलयकाली विश्व *शव* रूप में रहता है, उस पर काली खड़ी है,यही रहस्य समझ मे आये इसलिए शव को शक्तिहीन अर्थात शिवस्वरूप विश्व का प्रतीक माना गया है……

प्रत्येक गोल में (गोलाकारमे)360°रहती है,उस मे 90°__90°के चार भाग रहता है ,इसी ही गोलाकार की चार भुजा ,अनंताकाशरूप महाकाशमे चतुर्भुज रूप में परिणित (प्रकट) हो कर वो विश्व का लय करती है, उनकी चार भुजाओं का रहस्य यही है एक हाट में नाश शक्ति का प्रतीक खड्ग है, नष्ट होनेवाले जीव का प्रतीक मान कर दूसरे हाथ मे मुंड है,उनकी उपासना से अभय मिलता है,इसलिए तीसरा हाथ *अभय मुद्रा* में है……

ध्वस्त विश्व मे के रूप जीव उसी पर ही प्रतिष्ठित रहना यह भाव मुण्डमाला है, विश्व का लय होने के बाद सिर्फ दिशा ही वस्त्ररूप में रह सकती है, यही नग्नावस्था है, प्रलयकाल में सम्पूर्ण विश्व ही स्मशान बन जाता है,ऐसी उग्रता की आराधना करने के लिए सर्वसामान्य इंसान असमर्थ है,इसलियें ऊपर वर्णन किया है उस प्रकार सगुन मूर्ति की /प्रतिमा की कल्पना की है,क्यों के तत्व को,तत्त्वरूप में ही जान कर आत्मसात करना ये शुद्ध ज्ञानयोग का हिस्सा है जो कि सर्वसामान्य लोगो के लिए कठिन रहता है, इसीलिए सगुन का साथ ले कर तत्व तक पोहोचना ,इसी प्रकार की शक्ति उपासना होती है……

*काली* का रूप हम समझ गए ,अब कुछ जिज्ञासुओ ,अभ्यासकों,के शंका/प्रश्न के उत्तर देखेंगे…..

काली के गले मे जो मुण्डमाला है,उस मे 50 मुंड है,यह 50 मातृकाओं के अर्थात वर्ण के प्रतीक है, भगवती स्वयं *शब्दब्रम्ह* है……. यह बोध यह स्वीकार किया गया है….

जिज्ञासुओ का अगला प्रश्न यह हैं कि मुंड में से निकलत हुआ रक्त क्या है,शब्द यह आकाश का गुण पंचतत्व में से यह प्रथम तत्व इस शब्दगुन मे से रक्त ,अर्थात रजोगुण टपकता है, कहने का मतलब श्रुष्टि का आरंभ होने के लिए यह सहयभूत है,यही भाव याने भगवती की सृजनशक्ति है……

कुछ विद्वजन प्रतिमा देख कर ही बोलेंगे के मुण्डमाला यह सच्चे मुंडो की माला है, तो यही बोलना अप्रस्तुत हे, क्यो की अभी पंचभौतिक श्रुष्टि होना बाकी है………. तब राक्षस या इंसान आये कहा से ——-के उनके मुंडो को काट कर मा भगवती उनकी माला बनाएगी ???अर्थात यही 50 वर्णो की ही (स्वर+व्यजंन) माला है……..

इति आदेश…….

अखिलेश्वरनन्दनाथ भैरव(ज्ञानेंद्रनाथ)

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