जानिये प्राचीन नदियों की संस्कृति को

जानिये प्राचीन नदियों की संस्कृति को

सप्त सिन्धु और पुल्लिंग नद-वेद में तीन सप्तसिन्धु का वर्णन है। दो की विभाजक रेखा सिन्धु नाम से प्रसिद्ध नदी हो सकती है। सिन्धु का मूल अर्थ समुद्र है, नदी समूह को भी विस्तार दृष्टि से सिन्धु कह सकते हैं। पूर्व में एक गंगा है। किन्तु गंगा नाम की ७ नदियां पुराण में वर्णित हैं। २-२ गंगा पामीर से पूर्व, उत्तर तथा पश्चिम में हैं। इनमें एक अभी भी महा-गंगा (ह्वाङ्गहो) के नाम से प्रसिद्ध है। इनके समान पुराणों में क्रौञ्च द्वीप की भी ७ मुख्य नदियों को गंगा कहा गया है। उत्तर अमेरिका तथा उसकी मुख्य पर्वत माला-दोनों का नक्शा उड़ते पक्षी के आकार का है अतः उनको क्रौञ्च द्वीप तथा क्रौञ्च पर्वत कहते। कार्तिकेय के शक्ति प्रहार से क्रौञ्च पर प्रहार किया तो उसकी एक चोटी विदीर्ण हो गयी थी। १८००० वर्ष बाद उसका चिह्न मिलना कठिन है। सिन्धु के पूर्व में जो सप्तसिन्धु है उसे हम दैनिक स्मरण करते हैं-

गङ्गे यमुने चैव गोदावरी सरस्वती।

नर्मदे सिन्धु कावेरी जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु।।

इनमें सरस्वती का बहुत प्रचार है जो अब लुप्त है। एक समय यह गङ्गा-यमुना के साथ प्रयाग में मिलती थी, जो त्रिवेणी सङ्गम के नाम से प्रसिद्ध है। शरीर के भीतर इड़ा-पिङ्गला सुषुम्ना का सङ्गम भी त्रिवेणी सङ्गम है। अभी सरस्वती मार्ग का जो अवशेष मिलता है वह हिमालय से कुरुक्षेत्र हो कर कच्छ के पास समुद्र तक है। इसके और दो अर्थ हैं। गायत्री पृथ्वी है, सौर मण्डल का विस्तार सावित्री है, तथा ब्रह्माण्ड का विस्तार सावित्री है। मनुष्य से आरम्भ कर ये क्षेत्र क्रमशः १-१ कोटि गुणा या २ घात २४ गुणा बड़े हैं। अतः ये २४ अक्षर के छन्द गायत्री के रूप हैं और गायत्री का ध्यान गायत्री, सावित्री, सरस्वती के रूपों में करते हैं।

अन्य अर्थ है-ज्ञान या अध्ययन की दो विपरीत विधियों में एक। गिनती के लिये हर वस्तु एक कण है। उनका समूह गण है। मनुष्य गण का समूह भी गणपति हुआ। अलग-अलग वस्तुओं का अध्ययन ( discrete) गणेश हुआ। कणों के समूह रूप में ब्रह्माण्ड महागणपति तथा अनन्त विश्व उच्छिष्ट गणपति है। पुरुष रूप में इसके ४ भागों में एक ही पाद से सृष्टि हुई। बाकी ३ पाद बचे रह गये अतः उच्छिष्ट हैं।

सतत आकाश या क्षेत्र का ज्ञान सरस्वती है। इसे गिन नहीँ  सकते, केवल भाव या रस का अनुभव होता है, अतः इसे सरस्वती कहते हैं। शब्द तथा अक्षर गिना जा सकता है, वह गणेश है। उनका भाव या रस सरस्वती है-

वर्णानामर्थसङ्घानां रसानां छन्दसामपि।

मङ्गलानां च कर्तारौ वन्दे वाणी विनायकौ।

(रामचरितमानस मङ्गलाचरण)

दोनों विपरीत या पूरक पद्धति का पर्व माघशुक्ल पञ्चमी तथा उसके संवत्सर चक्र में उसके विपरीत होता है।

वर्तमान सप्त सिन्धु क्षेत्र में शोणभद्र (सोन) तथा ब्रह्मपुत्र पुल्लिंग होते हैं। अतः तीसरा सप्तसिन्धु ब्रह्मपुत्र से इण्डोनेशिया तक है।उस क्षेत्र में भी बर्मा का एक सोन नद है। किष्किन्धा काण्ड अध्याय ४० में इण्डोनेशिया (यव द्वीप से पूर्व  ७ मुख्य द्वीप) में भी एक पुल्लिंग शोण नद का उल्लेख है। एक इरावती या इरावदी नदी है जहाँ श्वेत हाथी ऐरावत का निवास था (वायु पुराण, अध्याय ३६,३७)। एक अन्य मां-गंगा (अंग्रेजी में मेकांग) है। अन्य ४ के विषय में अनुमान ही कर सकते हैं।

भारत में सोन तथा ब्रह्मपुत्र के अतिरिक्त सभी नदी स्त्रीलिंग हैं। पर पश्चिम की ५ नदियों का समन्वय पुल्लिङ्ग है। एक भोजपुरी राष्ट्र गीत बटोहिया में इन तीनों पुल्लिंग नद का उल्लेख एक पंक्ति में है-

ब्रह्मपुत्र पञ्चनद घहरन निशि दिन, शोणभद्र मीठे स्वर गावे रे बटोहिया।

क्या ये सैन्य या वीर लोगों के क्षेत्र माने जाते थे?

श्री अरुण कुमार उपाध्याय 

( धर्म शास्त्र विशेषज्ञ )

Mysticpowernews

मिस्टिक पावर (dharmik news) एक प्रयास है धार्मिक पत्रकारिता(religious stories) में ,जिसे आगे अनेक लक्ष्य प्राप्त करने हैं सर्वप्रथम पत्रिका फिर वेब न्यूज़ और अगला लक्ष्य सेटेलाइट चैनेल ............जिसके द्वारा सनातन संस्कृति(hindu dharm,sanatan dharma) का प्रसार किया जा सके और देश विदेश के सभी विद्वानों को एक मंच दिए जा सके | राष्ट्रीय और धार्मिक समस्याओं(hindu facts,hindu mythology) का विश्लेषण और उपाय करने का एक समग्र प्रयास किया जा सके |

Mysticpowernews has 574 posts and counting. See all posts by Mysticpowernews

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *