जानिये महाविद्या तारा को

जानिये महाविद्या तारा को 

मध्यरात्रि12 से 6 बजे तक काली के सत्ता के बाद भगवति तारा का साम्राज्य शुरू होता है,(यह कालगणना की परिभाषा आज के काल अनुरूप प्रयोग की है, मूल भाषा घटिका ,पल,प्रहर,इस प्रकार की है )…….

 

निगम शास्त्रानुसार सम्पूर्ण विश्व के रचना का आधार सुर्य को माना गया है, सौर – मण्डल यह आग्नेय है इसलिए हिरण्यमय कहे जाते है……

कारण अग्नि हिरण्यरेता है या हिरण्यमय मण्डल के केन्द्रस्थान “सोरब्रम्ह तत्व” है,इसीलिए सौर ब्रह्म को “हिरण्यगर्भ“कहा गया है…..

 

जिस प्रकार विश्वातीत काल पुरूष की शक्ति काली ,इसी प्रकार से विश्वाधिष्ठता हिरण्यगर्भ पुरुष की शक्ति तारा है,

घोर अंधकार में (घोर तम) दिव्यता की ज्योत किसी तारे के अनुसार जगमग रहती है,इस महात्म के केन्द्र स्थान में उत्पन्न हो रहे सूर्य को श्रुतियों की “नक्षत्र” ऐसा नाम दिया है,इसी प्रकार आगमशास्त्र मे उसकी शक्ति “तारा” इस नाम से प्रसिद्व हुई,यही पुरुष तन्त्रमार्ग में “अक्षोभ्य” नाम से जाना जाता है,यह अक्षोभ्य नाम क्यों पड़ा ?

कारण यह है कि वैदिक सिद्धान्त के अनुसार सूर्य सदैव स्थिर रहता है, बृहती छंद नाम से प्रसिद्व रहनेवाले विशुवृत्त के मदयभाग में क्षोभरहित सूर्य स्थिर रह कर तप्त होते रहता है,इसीलिए  प्रसिद्धि “अक्षोभ्य नाम से हुई”…….

ऐसा यह सुर्य प्रकट होते ही उसे अन्नाहुति दी गयी,इस आहुति के पूर्व वह महाउग्र  था,इसीलिए उसकी शक्ति उग्रतारा के नाम से जानी गयी ,जब तक आहुति मिलती रहती है, तब तक तारा शांत रहती है…..

जिस प्रकार महाप्रलय की अधिष्ठात्री काली, उसी प्रकार सूर्यप्रलय की अधिष्ठात्री तारा,प्रलय यही दोनो शक्तियों का समान गुणधर्म,इसी लिये दोनो में अल्प ऐसा फरक है,तारा के चार भुजाओं में सर्प लिपटे हुए हैं, इसका अर्थ ऐसा की विषाक्त वायुद्वरा वो संहार (लय) करती है, विश्व के केंद्र में इसकी सत्ता है, यही दर्शाने के लिए ही वो शव के हृदय पर प्रतिष्ठित हैं….

आहुति रुकते ही सौर – अग्नि प्रचण्ड वेग लेता है,ओर सु$$$$$ सु$$$$$$ऐसा ध्वनि होने लगता हैं, तारा का अट्टाट हास्य (जोर जोर से गड़ गड़ाहट भर हास्य ) इसी का प्रतीक है,  प्रलयकाली सभी का रस (आपतत्व) सौर -अग्नि से शुष्क होने लगता है, सुख जाता है, रस याने सभी ही जीवो का श्री भाग !!वह शिरोभाग में होता है, तारा उसका प्राशन करती है, इसी का प्रतीक याने खपर (खप्पर) !

उग्रसूर्य को निल ग्रीव कहते है,(निलग्रीवो विलोहित:!!यजु 016/7).इसीलिए उसकी शक्ति का यही रूप  (तारा ) ही है,सूर्यरष्मी यह उसकी जटा !!!इसी प्रकार से कालरूपी विश्वातीत तत्व के बाद सूर्यरूपा तारा यह दूसरी महाशक्ति का आविर्भाव (अथवा आरम्भ बोल सकते है) होने लगता हैं,……

आखिलेश्वरानंदनाथ भैरव(ज्ञानेंद्रनाथ)

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