जानिये शहद को क्यों कहते हैं अमृत

प्रभुप्रद मधु (शहद) एक अमृततुल्य पदार्थ है । वह परमेश्वर की प्राणियों के कल्याण के लिए दिव्य देन है । जिस प्रकार यह जगत्प्रसिद्ध मान्यता है कि गंगाजल कभी सड़ता नहीं, पाचक व रोगनाशक है । इसी प्रकार मधु (शहद) भी एक ऐसी पवित्र वस्तु है जिसमें सड़ांद कभी उत्पन्न नहीं होती । यह शरीर से उत्पन्न होने वाली सड़ांद को भी रोकता है । फल आदि वस्तुओं को भी इसमें बहुत देर के लिए सुरक्षित रखा जा सकता है ।

 

शहद के गुणों को समझने के लिए वैज्ञानिकों ने जो अनुसंधान किये हैं, उनसे इस बात का भी पता चला है कि शहद कृमिनाशक है । डॉक्टर डब्ल्यू जी सैकट ने रोगकीटाणुओं को शहद में रखा, तो ये कीटाणु शीघ्र ही मर गए । इनमें टाईफाईड और पेचिस पैदा करने वाले कीटाणु भी थे । शहद में सड़ान्द को रोकने और कीटाणुओं का नाश करने की जो शक्ति विद्यमान है, उसने उसे भोजन में सर्वोत्तम (सर्वश्रेष्ठ) और पवित्र स्थान दिया है । हमारे पूर्वज शहद के इन गुणों से परिचित थे, इसलिए उन्होंने शहद पंचामृत का अंग माना है ।

 

शहद में विटामिन कम पाये जाते हैं । ‘बी’ वर्ग के विटामिनों के अतिरिक्त विटामिन ‘सी’ भी शहद में मिलता है । प्रत्येक साधारण चम्मच शहद से ४५ क्लोरीज शक्ति उत्पन्न होती है । इन तत्त्वों के अतिरिक्त शहद में अनेक प्रकार के पुष्पों की मनोरम सुगन्ध होती है जो अन्य किसी भी मिठाई में नहीं मिलती ।

 

सामान्य सफेद चीनी की तुलना में मधु एक उत्कृष्ट पदार्थ है । चीनी में ६६ प्रतिशत से अधिक श्वेत सार होता है जबकि मधु में केवल ५ प्रतिशत । चीनी में कोई धातुयिक तत्त्व नहीं होते और न विटामिन ही ।

 

मधु ७० डिग्री (फार्नहाइट) तापक्रम से नीचे रवेदार बन जाता है, उसमें गाढ़ापन आ जाता है और वह जमने लगता है । जाड़ों के दिनों में पिघलाने के लिए शहद के बर्तन को गर्म पानी में रखकर या धूप में रखकर पिघलाना चाहिए । १५० डिग्री फार्नहाइट से अधिक ताप देने से इसका स्वाद और रंग बिगड़ जाता है ।

 

भारत में राजयक्ष्मा अथवा क्षय रोग से एक मिनट में एक व्यक्ति मरता है । आज विश्व में क्षय रोग दिवस मनाया जा रहा है । विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भारत सहित सभी एशियाई देशों से कहा कि एशियाई देशों में विश्व के अन्य देशों की अपेक्षा नये प्रकार का क्षय रोग (टी.बी.) फैलने की बहुत आशंका है । इस क्षय रोग का बहुत भयानक रूप है जो पूरे विश्व में ही फैल रहा है । इस भयंकर रोग से बचने के लिए शीघ्र ही कोई सफल पग नहीं उठाया गया तो इस रोग के रोगियों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ जायेगी । अभी तक इसकी चिकित्सा में सफलता नहीं मिल रही है । ब्रह्मचर्य के पालन न करने से असाध्य रोग एड्स दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है । लोगों के यत्‍न करने पर यह घटा नहीं किन्तु यह बहुत भयानक रूप धारण कर सम्मुख आ रहा है । विश्व स्वास्थ्य संगठन का मत है कि क्षय रोग से ही सबसे अधिक लोगों की मृत्यु होती है । प्रतिवर्ष लगभग ३० लाख लोग इस क्षय रोग से मरते हैं । इनकी संख्या तेजी से बढ़ रही है । यह भयंकर रोग ब्रह्मचर्य का पालन न करने, आहार-व्यवहार के दूषित होने और अंडे-मास, मदिरा आदि नशीले पदार्थों के सेवन से क्षय एड्स आदि भयंकर रोग दिन-प्रतिदिन बढ़ते जा रहे हैं । प्रतिवर्ष लगभग ७० लाख नये क्षय के रोगी आते हैं । बाल्यकाल से ही माता-पिता व गुरुजन बालकों को ब्रह्मचर्य के पालन की शिक्षा दें और सर्वोत्तम भोजन मधु (शहद), गोदुग्ध आदि पदार्थों का सेवन करायें तो इन भयंकर रोगों से बचा जा सकता है ।

 

रूस व मध्य एशिया में पौष्टिक पदार्थों के सेवन से वहाँ के लोगों की आयु व कद बढ़ते जा रहे हैं । कई वर्ष पहले रूस में एक सम्मेलन हुआ जिसमें पाँच हजार से अधिक संख्या में दीर्घ आयु वाले लोगों ने दर्शन दिये । उन सबकी आयु १५० वर्ष से अधिक थी । जब बालक माँ के गर्भ में हो तो माता को गोदुग्ध के साथ मधु का सेवन कराना चाहिए और शिशु को उत्पन्न होते ही बालक का पिता स्वर्ण की शलाका से मधु से उसकी जिह्वा पर ओ३म् लिखे व मधु उसी शलाका से चटावे और बालक को प्रथम नौ मास तक मधु दिया जाये तो उसको छाती रोग, श्वास, कास, जुकाम, निमोनिया आदि नहीं होते ।

 

मधु कोई बहुमूल्य या दुर्लभ वस्तु नहीं है । साधारण मनुष्यों के लिए भी वह शुद्ध रूप में सुलभ हो सकता है । वे चाहें तो बड़ी सुगमता से मधुमक्खियों को अपने घरों में पाल-पोसकर उनसे मधु वैसे ही प्राप्‍त कर सकते हैं जिस प्रकार से अपने यहां गौ और बकरियों को पालकर उनसे दूध लेते हैं । गौ, बकरियों के चारे पर जो व्यय होता है, मधु-मक्खियों के लिए उसकी भी आवश्यकता नहीं पड़ेगी । वे अपना आहार वन, जंगल के फूलों से संग्रह कर ले आती हैं । उनके रहने के लिए केवल लकड़ी के बने हुए मक्षिका कोष्टों की आवश्यकता पड़ेगी और उनकी देखभाल ही पालन-पोषण के रूप में अवश्य करनी पड़ेगी । हां, मधुमक्खियों की पालनकला को सीख लेना आवश्यक है ।

 

हमारे देश में चीनी का प्रयोग बहुत अधिक बढ़ता जा रहा है । प्राकृतिक चिकित्सकों ने तो चीनी को सफेद जहर माना है । चीनी के सेवन से आंतों में सड़ान्द व अल्सर पैदा होता है और अम्लपित्त (तेजाब) की उत्पत्ति होती है । इसके सेवन से सभी आयु के व्यक्तियों के यकृत खराब हो जाते हैं और उन्हें बहुत शीघ्र जुकाम होने लगता है और छाती में निमोनिया आदि रोगों की उत्पत्ति होती है और गले की ग्रन्थियां सूज जातीं हैं । इसके खाने से शरीर में चूने (कैल्शियम) की कमी हो जाती है । चीनी में कोई पोषक तत्त्व नहीं हैं और चीनी और मधु में उसी प्रकार का भेद है जैसा दूध और शराब में होता है । दुग्ध अमृत है । शराब विष है । इसी प्रकार मधु अमृत और चीनी विष है ।

 

इस चीनी ने मानव जाति के स्वास्थ्य का नाश करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । मधु (शहद) में वे सभी तत्त्व पाये जाते हैं जो कि शारीरिक उन्नति के लिए आवश्यक हैं । प्रत्यामिन जो तन्तुओं का निर्माण करती है, लोह जो कि रक्त के लिए आवश्यक है, चूना जो हड्डियों को सुदृढ़ बनाता है । खाद्योज जिनकी पोषक महत्ता से सभी परिचित हैं, यह सभी पदार्थ शहद में पाए जाने वाली शर्करा में अधिकांश ग्लूकोज का होता है, जो बिना किसी पाचनक्रिया पर बोझ डाले शरीर में आत्मसात् हो जाता है । शहद किसी भी श्लेश्मिक कला में से गुजर कर रक्त में सीधा घुल जाता है । आप आश्चर्य में आ जायेंगे यदि मैं यह कहूँ कि शहद जब कि वह मुंह में होता है, पूर्व इसके वह हमारी भोजन नालिका द्वारा आमाशय में पहुंचे, वह रक्त में मिलना प्रारम्भ हो जाता है । मेदे में पहुंचकर शहद का आत्मीकरण भी बहुत जल्दी होता है । यही कारण है कि शहद हृदय के लिए शक्तिवर्द्धक माना गया है । थका-मांदा इन्सान चाय पीकर सुस्ती को दूर करता है, यदि वह चाय के स्थान पर शहद को पानी में घोलकर पिये तो उसे यह अनुभव कर बड़ा आश्चर्य होगा कि न केवल उसकी थकावट ही दूर हो गई है बल्कि उसके शरीर में नवीन स्फूर्ति आ गई है ।

 

जो देश कभी दूध की अधिकता के लिए प्रसिद्ध था, आज वह दूध के अभाव में शारीरिक व आत्मिक दृष्टि से दिनप्रतिदिन अवनत होता जा रहा है । धनी और सम्पन्न व्यक्तियों को भी यथोचित मात्रा में दूध और घी नहीं मिलता । आज समाज के खान-पान की दृष्टि से इतने निकृष्ट स्तर पर पहुंचने का कारण प्रणघातक चीनी ही है । सब जानते हैं कि मिठाई बनाने के काम चीनी ही आती है । हलवाई के हाथ में अगर चीनी न हो तो आज दूध की इस प्रकार हत्या न की जाए । हमें खुरचन, मलाई, रबड़ी, पेड़ा और लड्डू नहीं प्राप्‍त हो सकें । दूध का प्रयोग अधिकतर इन मिठाइयों के बनने में हो जाता है । हमें शुद्ध घी व दूध पीने को नहीं मिलता । देश के स्वास्थ्य का हित इसमें है कि चीनी का सेवन बंद किया जावे । सरकार भी कानून बनाकर इस पर प्रतिबन्ध लगावे और जनता भी इसका कम से कम प्रयोग करे ।

 

रूसी लेखक डॉक्टर एड्वर्द कान्देल ने सोवियत भूमि में प्रकाशित अपने एक लेख में लिखा था कि जब वे मास्को के एक चिकित्सालय में गये तो उन्होंने वहां के रोगियों को एक गाढ़ी-गाढ़ी दवा को बहुत स्वाद से खाते देखा । प्रायः दवाओं का स्वाद कड़वा होता है लेकिन इस सुगन्धित फीके अंबर रंग के द्रव पदार्थ को बड़ी प्रसन्नता से गटकते देखा । यह दवा थी मधु । सारे इतिहास में रूस ने अपने शहद के लिए संसार में सर्वश्रेष्ठ इनाम पाया है । युद्ध में जख्मी सैनिकों को सौ वर्ष पुराना शहद स्वास्थ्य प्राप्‍ति के लिए देने की चर्चा आती है । प्राचीनकाल से ही रूस विभिन्न देशों में अपने मधु का निर्यात करता रहा है । आधुनिक चिकित्सकों ने रोगों पर मधु का प्रयोग किया । वे सभी इसी परिणाम पर पहुंचे कि मधु प्रत्येक रोग पर आश्चर्यजनक लाभ करता है ।

यह सभी जानते हैं कि खाने की भोजन सामग्री अधिक दिन रखने से खराब हो जाती है । परन्तु क्या ऐसा भी कोई खाद्य पदार्थ है जो हजारों वर्षों तक रखा रहने पर भी न तो सड़े और न ही बिगड़े । वह केवल मधु ही है । १९३३ में मिश्र के पिरामिड में एक मधु का पात्र मिला जो ३३०० वर्ष पुराना था । पात्र के मधु का कोई स्वाद वा गुण नहीं बिगड़ा था क्योंकि मधु में कीटाणुनाशक बहुत गुण हैं । इतना ही नहीं, यह अनेक रोग उत्पन्न करने वाले कीटाणुओं का नाश करता है और इसका सेवन उत्तम स्वास्थ्य प्रदान करता है । इस प्रकार मधु के जितने गुण गाए जायें, उतने थोड़े हैं । यह सर्वोत्तम भोजन व सर्वोत्तम औषध है ।

नितिन श्रीवास्तव ( सहसंपादक )

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