जानिये श्रीमद्भगवद्गीता के मोक्षसंन्यासयोग को

यदि आपने गीता जी का थोड़ा भी स्वाध्याय किया होगा तो पाया होगा कि भगवान् ने गीता जी के प्रारम्भ में भगवान् श्रीवासुदेव कृष्ण ने उपदेश किया था :

अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे ।

गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ॥

{ श्रीमद्भगवद्गीता २ / ११ }

 

पण्डित अर्थात् जो समझदार लोग हैं वे प्राणों के रहने और प्राणों के जाने दोनों , का शोक नहीं करते । शोक के दो ही कारण हैं । दुश्मन तगड़ा हो तो शोक होता है कि यह अभी तक हटा क्यों नहीं और मित्र मर  जाये तो शोक होता है । अर्थात् जिसमें द्वेष होता है उसके रहने से दुःख और जिसमें राग होता है उसके मरने से दुःख होता है । फिर गीता – शास्त्र के समापन में भगवान् कहते हैं ” माशुचः ” अब तू इस ज्ञान को समझकर पण्डित हो गया इसलिये अब शोक मत कर । गीताशास्त्र के प्रारम्भ और अन्त दोनों में भगवान् ने कहा शोक मत कर ।

 

गीता जी में चूँकि कर्म करने का और कर्मत्याग दोनों का उपदेश है , इसलिये प्रश्न उठता है कि कर्म करना उत्तम है या नहीं करना उत्तम हैं । अथवा कर्म करना और नहीं करना दोनों साथ करना उत्तम है ? बड़ा भारी प्रश्न है । भगवान् भाष्यकार श्री शङ्कर स्वामी कहते हैं कि आत्मज्ञान तो अकेला मोक्ष का कारण है क्योंकि श्रुतियाँ बार – बार कहती हैं । मोक्ष का कारण केवल ज्ञान है क्योंकि भेदप्रतीति का निवर्त्तक ज्ञान ही हो सकता है । भेदनिवृत्ति का प्रवर्त्तक कर्म हो ही नहीं सकता क्यों कर्म तो भेदप्रतीति से ही किया जाना पड़ता है । भेदप्रतीति से भदप्रतीति की निवृत्ति कैसे हो सकती है ? केवल आत्मज्ञान ही निःश्रेयस का कारण है । न कर्म से मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है और न कर्म व ज्ञान साथ करके मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है और न कर्म व ज्ञान साथ करके मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है । क्यों कर्म समुच्चितरूप से और न अकेले ही मोक्ष के प्रति कारण है ? क्योंकि मोक्ष उत्पन्न होने वाली चीज नहीं है । कर्म के द्वारा , जो चीज़ या जो स्थिति पहले नहीं है , उसको पैदा करते हैं । जैसे मिट्टी पड़ी हुई है तो आप उसे पानी से गूँथ कर , चाक पर चढ़ा कर घड़ा बनाते हैं । घड़ा आपके कर्म से पैदा हुआ। पहले घड़ा नहीं था और अब घड़ा पैदा हुआ । यदि आप कहें कि घड़ा पैदा तो हुआ पर आगे नष्ट नहीं होगा । तो यह कभी नहीं होगा क्योंकि भगवान् ने पहले ही गीता में नियम बता दिये हैं ” जातस्य ही ध्रुवो मृत्युः ” जो पैदा हुआ है उसका नाश होना निश्चित है । अगर मोक्ष कुछ करके प्राप होता तो फिर जितना आपने प्रयत्न किया है उसका प्रभाव जब बीत जाता तब फिर मोक्ष खत्म हो जाता ! इसलिये कर्म के द्वारा जो लोग मोक्ष मा7ए है वे यही मानते हैं कि यहाँ से आप किसी लोकान्तर में जायेंगे , वहाँ रहेंगे और फिर बाद में लौटकर आयेंगे । किन्तु तब मोक्ष नित्य नहीं होगा । वर्तमान में ” आर्यसमाजी स्वामी दयानन्द ” ने लोकान्तररूप मोक्ष नही माना परन्तु उन्होंने माना कि शास्त्र में बताये हुए कर्म करने से तुम्हारे में विशेष शक्ति आ जायेगी और इसलिये इस प्रलय तक जो तुम्हारी जन्म – मरण की परम्परा नहीं रहेगी । जब अगली सृष्टि होगी तब फिर तुम संस्कार वाले होकर ऋषिकुल में उत्पन्न होगे और आगे फिर जैसा करोगे वैसा ही फल पाओगे । चाहे लोकान्तर में जाकर अतिदीर्घ काल के बाद हो , चाहे महाप्रलय के खत्म होने पर हो , हर हालत में कर्म करने वाले यही मानते हैं कि आना तो पड़ेगा ही ।

 

सामान्य आदमी की शङ्का होती है कि ज्ञान भी जो फल उत्पन्न करेगा वह नष्ट क्यों नहीं हो जायेगा ? परन्तु यह ज्ञान के स्वरूप को नहीं समझने के कारण है । ज्ञान कुछ पैदा नहीं करता । ज्ञान तो जो चीज़ जैसी है उसे प्रकट करता है । जैस आप जहाँ बैठे हैं और उस कमरे में अंधेरा है तो आपको ” सुधि शुक्ला जी ” , ” हर्षवर्धन ” , ” अप्पु ” , पप्पु ” आदि कोई नहीं दीख रहा है । उसके बाद बिजली का खटका दबा , प्रकाश हो गया तो प्रकाश ने आपके पत्नि – ” सुधि ” , पुत्र – ” हर्ष ” आदि को पैदा नहीं किया । वे तो पहले से ही वहाँ थे , केवल उन्हें प्रकट कर दिया । जैसे प्रकाश किसी चीज़ को उत्पन्न नहीं करता , जो चीज़ है उसे प्रकट कर देता है , उसी प्रकार ज्ञान जो चीज़ है उसे प्रकट कर देता है , ज्ञान किसी चीज़ में कोई परिवर्तन नहीं करता । अगर कार्य होता तो अनित्य होता । मोक्ष तो नित्य है , ज्ञान उसे प्रकट करता है , ” मोक्षरूप ब्रह्म ” को प्रकट कर देता है । ज्ञान से मुक्तरूप ब्रह्म प्रकट हो जाता है , पैदा नहीं होता । क्रिया से जो पैदा होता है वह पैदा होने से पहले नहीं होता । पहले एक लकड़ी थी । आपने कुल्हाड़ी से काटकर उसे दो  कर दिया । पहले एक थी , कुल्हाड़ी की क्रिया होने पर दो हो गई । इसी प्रकार पहले आग नहीं थी । आपने माचीस की तिल्ली को घीसा तो आग पैदा हो गई अर्थात् पहले नहीं थी और फिर पैदा हो गई । इसलिये कर्म के द्वारा कुछ नवीनता आती है । लेकिन ज्ञान के द्वारा जो चीज़ जैसी होती है, वैसी प्रकट हो जाती है , कोई नवीनता नहीं आती । इसलिये ज्ञान की कारणता कर्म की कारणता से बिलकुल दूसरे ढंग की है । कर्म की कारणता कार्य को उत्पन्न करती है । ज्ञान के द्वारा कार्य उत्पन्न नहीं होता , जो है वह प्रकट हो जाता है ।

 

यदि आप कहिए कि स्वामी जी . ज्ञान और कर्म दोनों साथ कर लें तो क्या हर्ज है? ज्ञान निष्ठा और क्रिया दोनों में आपस में विरोध है । ज्ञाननिष्ठा है कि ब्रह्म अकर्त्ता – अभोक्ता है और क्रिया करने के लिए उस ब्रह्म को ” अहं ” से एक ही रहना पड़ता है । शुद्ध आत्मा कहीं कुछ करता नहीं । इसलिये तो भगवान् ने श्रीमद्भगवद्गीता जी के द्वारा पहले ही अठारहवें अध्याय के चौदहवें श्लोक द्वारा अपने श्रीमुख से बता दिया कि कर्म करने के लिये पाँच चीज़ें चाहिये , अकेला आत्मा कुछ नहीं करता है । पाँचों चीजों की कारकता बताकर  भगवान् ने आत्मा का अकर्त्तृत्व पहले ही कह दिया । अहंकार में आत्मा का अध्यास मानकर ही कर्त्तापना है । इसलिये कर्म करने से , कर्म सहित या कर्मयुक्त होकर ज्ञाननिष्ठा हो सके , यह सम्भव ही नहीं है । जितनी ज्ञाननिष्ठा होती जायेगी उतनी कर्म की निवृत्ति ही होती जायेगी क्योंकि कर्म करने के लिये आपको बाब – बार द्वैत वृत्ति बनानी पड़ेगी ।

 

कुछ लोग ऐसा भी कहते हैं कि आदमी कुछ काम दृष्ट फल के लिये और कुछ अदृष्ट फल के लिये कर लेता है । अदृष्ट फल के लिये संध्या – वन्दन , अग्निहोत्रादि कर लेता है और दृष्ट भूख लगने पर भोजन कर लेता है जिसमें किसी शास्त्र की आज्ञा की जरूरत नहीं है । इसी प्रकार से कर्म तो संस्कार के वश से कर लेगा है और शास्त्र के बल पर अपनी व्यापकता को जान लेगा । इस पक्ष में दोष यह है कि भोजन करने में प्रवृत्ति करने के लिये भोजन के प्रति तृष्णा चाहिये । अगर आपको सवेरे से शाम तक सौ दस्त लग गई हों और फिर आपसे कोई कहे कि ” बढ़िया दूध बादाम की लस्सी पी लो ” तो क्या आप पियेंगे ? जो लौकिक क्रिया में होती है वे तृष्णावशात् या रागवशात् होती हैं लेकिन जहाँ एकमात्र ब्रह्म ही रह गया है तदन्य सब बाधित हो गया है , वहाँ राग किसमें रहेगा? राग का मूल कारण किसी चीज़ में सुख – बुद्धि होना है । इसलिये भगवान् पहले ही कह दिये कि जब खूब बरसात होकर तुम्हारे चारों तरफ पानी भरा हो तो क्या तुम कुँएँ से पानी निकालने जाओगे ? राग का कारण सुख बुद्धि है और कैवल्य ज्ञान से आप परमानन्द म

ें हैं तो फिर आप में राग कहाँ से आयेगा ?  संस्कार  भी तो सुख दिखाकर ही प्रवृत्त करते हैं कि ” उस चीज़ से पहले सुख हुआ था ” । जब आपको परम आनन्द की प्राप्ति है तब प्रवृत्ति कैसे होगी ? श्री शङ्करानन्द स्वामी ने गीता जी का भाष्य किया है ” शङ्करानन्दी भाष्यम् ” उसमें वे कहते हैं , कि कोई व्यक्ति मारवाड़ { राजस्थान } का रहने वाला है । उधर से कोई घुड़सवार निकला , उसे प्यास लगी है और उसे मृगतृष्णा का जल दीख रहा है । आगन्तुक कहता है ” वहाँ से एक घड़ा पानी लाओ।” मारवाड़ का अनुभवी कहता है कि ” वहाँ पानी नहीं है , केवल पानी दीखता है । ” घुड़सवार उसे डाँटता है कि ” मुझे साफ पानी दीख रहा है , मैं अन्धा नहीं हूँ , नहीं जाओगे तो कोड़े मारूँगा । ” उस मारवाड़ वासी का निश्चय है कि वहाँ पानी नहीं है परन्तु कोड़े खाने के भय से सोचता है कि ” थोड़ी दूर तक मरुभूमि में ही चला जाऊँ ” । इसी प्रकार जब निश्चय हो जाता है कि प्राप्त परमानन्द की अपेक्षा विषयों में सुख है ही नहीं , फिर भी प्रारब्ध जबर्दस्ती प्रवृत्त करता है । जैसे उस मरुभूमि में रहने वाले को मृगतृष्णा की तरफ जाते हुए भी केवल यही अनुभव होता है कि ” बड़ा कष्ट है , जाना पड़ रहा है । ” मैं जा रहा हूँ – ऐसा  प्रतीत नहीं होता , ज़बर्दस्ती भेजा जा रहा हूँ – यह लगता है । इसी प्रकार ज्ञाननिष्ठा के अन्दर पता है कि संसार के विषयों में सुख की कोई सम्भावना नहीं है , परन्तु प्रारब्ध भुगवाने के लिये जबर्दस्ती ले जा रहा है । उसके मन में यह नहीं होता कि ” मैं विषयों की तरफ जा रहा हूँ ” । वरन् भान रहता है कि ” संस्कार प्रारब्धभोग करने वाले शरीर मन से लेकर अहङ्कार पर्यन्त को ले जा रहा है । मुझे उस अहंकार के अन्दर चेतनता की जो प्रतीति है , बस यही प्रारब्ध का फल है । ” इसलिये वह कर्त्ता बनता नहीं। जबर्दस्ती ले जाया जाना कर्त्ता बनना नहीं है । इसलिये यह कहना कि जैसे दृष्ट फल के लिये खा लेता है , वैसे अदृष्ट फल के लिये अग्निहोत्रादि कर ले , यह बनता नहीं।

 

ऐसा कुछ नहीं है कि ज्ञान को मोक्ष रूपी फल देने के लिये कर्म की मदद की जरूरत हो । इसलिये श्रुतियों ने कहा है कि ज्ञान को कर्म इत्यादि किसी सहायक की अपेक्षा नहीं है । ” पुरुषसूक्त ” का मन्त्र स्पष्ट कहता है कि उस परमात्मा का ज्ञान होने से ही अमृतत्व , मोक्ष की प्राप्ति है , ज्ञान का और कोई सहायक भी नहीं है । इसका निषेध भी कर दिया  ” नान्यः पन्था  विद्यते ” { पुरुषसूक्त } मोक्ष का दूसरा रास्ता है ही नहीं । इसलिये अविद्या – निवूत्ति के लिये किसी कर्म की जरूरत नहीं है जिसके लिये ज्ञान – कर्म का समुच्चय माना जाये ।

 

यह सिद्ध होने पर भी जो कर्मजड मीमांसक है उनका कहना है कि नित्य कर्म को न करने से ” प्रत्यवाय ” या दोष लगता है । इसलिये अगर तुम सारे कर्मों का परित्याग करोगे तो वह दोष लगता ही रहेगा । जैसे आप टैक्सी में बैठ गये तो उसका मीटर चलने लगता है । आप टैक्सी से उतरकर अपना काम करने चले जाये , अब टैक्सी में नहीं बैठे है तो अगर लौटने के लिये टैक्सी खड़ी रखी है तो उसका किराये का मीटर चलता ही रहेगा । इसी प्रकार ज्ञाननिष्ठा के बाद आपको कर्म का प्रयोजन नहीं रहा परन्तु आप ब्राह्मण आदि शरीर में तो हो ही , इसलिये उसमें नित्य कर्म मीटर चलता रहेगा , और आपका प्रत्यवाय इकट्ठा होता रहेगा । अतः नित्य कर्म करके वह भुगतान तो करना ही पड़ेगा इसलिये केवल ज्ञान से नहीं , ज्ञान के साथ प्रत्यवायनिवृत्ति के कार्य भी होते रहने चाहिये । किन्तु यह बात कहीं श्रुति ने तो कही नहीं है कि नित्य कर्मों के न करने से प्रत्यवाय या दोष लगता है । फिर क्यों  मीमांसक ऐसा मानता है ? उसका सोचने का प्रकार समझ लेना चाहिये : नित्य कर्म करने को कहा और नित्य कर्म का फल बताया नहीं । वेद जिस बात को कहेगा वह फल वाली होती है । अतः नित्यकर्म के भी फल की कल्पना करनी ही पड़ेगी अन्यथा ” वेदवाक्य ” अप्रमाण्य हो जायेगा । इसलिये , नित्यकर्म करने से प्रत्यवाय नहीं लगेगा – बस इतना मात्र उसका फल है । इसलिये मीमांसक मानता है कि नित्य कर्मों को करके प्रत्यवाय से बचना चाहिये ।

 

इस प्रकार काम्य कर्मों को नहीं करने से इष्ट शरीर की , स्वर्ग आदि की प्राप्ति नहीं होगी , नित्य को करते रहने से नरक की प्राप्ति नहीं होगी । वर्त्तमान शरीर के कर्मफलों की भोगने से समाप्ति हो जायेगी । तब आगे देहान्तर की उत्पत्ति का कोई कारण नहीं होगा तो मोक्ष हो ही जायेगा । यह शंका ” एकभाविकवादी ” लोग करते हैं । अपने यहाँ कुछ विचारक हुए हैं जो कहते हैं कि तुम्हारे सम्पूर्ण कर्मों को लेकर ही तुम्हारा शरीर उत्पन्न हुआ है , पहले के कुछ कर्म बचे हुए नहीं हैं । एक जन्म हो गया तो सब पूर्व कर्मों के फल प्राप्त होंगे । यहाँ तुम नये काम्य कर्म करोगे तो स्वर्ग और प्रतिषिद्ध करोगे तो नरक  मिलेगा। पहले किये हुए तो यहाँ भोग लोगे , लेकिन यहाँ किये हुओं से आगे नया शरीर मिलेगा । परन्तु यह मत शास्त्र के विपरीत है । एक दिन में हम इतने कर्म कर सकते हैं कि जिनके फल को हम एक जन्म में नहीं भोग सकते , एक घण्टे में हम ऐसा पूण्य भी कर लेते हैं कि स्वर्गादि जायें और ऐसा पाप भी कर लेते हैं कि ” कुम्भी पाक ” { एक तरह का नरक } में पड़ें । किन्तु दोनों के फलस्वरूप एक – साथ नरक और स्वर्ग में पैदा नहीं हो जायेंगे ! इसलिये यह मानना कि एक भव में सब समाप्त हो जायेगा, सर्वथा विरुद्ध है । बीते हुए अनेक जन्मों में हमने जो कर्म किये उनका फल एक जन्म में समाप्त नहीं हो सकता । कुछ लोग मानते हैं कि नित्यकर्मों से प्रत्यवाय – निवृत्ति का मतलब इतना है कि तुम कर्म करते रहोगे तो पुराने पाप कर्म क्षय हो जायेंगे; किन्तु सारे पाप कर्म तो क्षय होंगे नहीं ! इसलिये मोक्ष में कर्म का किसी भी प्रकार का विनियोग बनता नहीं । जिन कर्मों ने कर्मफल देना प्रारम्भ ही नहीं किया , तुम्हारे नित्य कर्म उन्हें नष्ट कैसे कर सकते हैं ? अतः यह कहना कि नित्य कर्म करने और काम्य व प्रतिषिद्ध से बचने से मोक्ष हो जायेगा , बनता  नहीं , उससे मोक्ष नहीं होगा । इसलिये ज्ञान को ही श्रुतिभगवती ने मोक्ष का उपाय बताया है । यदि नित्य कर्मों से , यथाकथंचित् मान भी लें कि सभी पुराने पाप कर्म खत्म होते हैं , तो भी पुराने पुण्य कर्म कैसे कटेंगे ? किंच , नित्य कर्मों का फल बताया भी गया है । वर्णाश्रम धर्म करना पुण्य लोकों की प्राप्ति करता है ऐसा शास्त्र ने स्पष्ट कहा है । अतः नित्य का फल नहीं बताया मानकर किया विचार निराधार है । अविद्यापूर्वक ही कर्म होते हैं अतः विद्या ही शुभ और अशुभ दोनों की निवृत्ति का कारण है ।

फिर नित्य कर्मों का विधान क्यों किया गया है ? वस्तुतस्तु कर्मों का विधान श्रुति ने किया ही नहीं !

डॉ. मदन मोहन पाठक धर्म शास्त्र विशेज्ञ 

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