जानिये सात जन्म का विज्ञान क्या है ?

किसी व्यक्ति के स्वयं में समाये पितृ पिंड की 28 कलाओं में 7 कला (1/4) स्वयं में उपस्थित होती है |

इन सात प्राणों के बाद शेष 21 भाग पुत्रों के होते हैं। इसमें जितना रस पुत्र शरीर में रहता है, पितृस्तोम यज्ञ के आवपन क्रम में उसके भी दो भाग हो जाते हैं। इसमें 21 कला के अपने पिण्डरस का 6 कला (3½ अंश) वाला भाग पिता का, शेष 15 कला उसके पुत्रों के अंश होते हैं। पौत्र शरीर पैदा करने को यह दूसरा आवाप है।आगे इन 15 कला रस के भी दो भाग हो जाते हैं। पिता के पांच अंश (तृतीय भाग), शेष दस कला पुत्रों की प्रपौत्र के शरीर निर्माण के लिए होती है। यह तीसरा आवपन है। अगले आवपन क्रम में दस कला वाले पिण्डरस के दो भाग हो जाते हैं। अढ़ाई (2½ अंश) रूप चार कला पिता में रहती है। शेष 6 कला उसके पुत्रों में जाती है। वे वृद्ध प्रपौत्र के शरीर का निर्माण करती हैं।

यह चौथा आवपन है। वृद्ध प्रपौत्र की छह कलांश के भी दो भाग हो जाते हैं। तीन कला (द्वितीयांश) रूप पिता होता है। शेष तीन कला अतिवृद्ध प्रपौत्र का निर्माण करती है। यह पांचवां आवपन होता है। अन्त में तीन कला पुत्रांश के भी दो भाग होते हैं। दो कला वाला पिता तथा एक कला पुत्र के लिए। यह अंश वृद्ध से भी अतिवृद्ध प्रपौत्र के शरीर का निर्माण करने में उपयोग होती है। यह छठा आवपन है। इसके आगे शेष एक कला के भाग नहीं होते। यह एक कला पितृभाग रूप ही निकल जाती है। आगे पुत्र भाग में कोई कलांश नहीं रहता। सप्तम आवपन पर पिण्ड का सन्तान भाव समाप्त हो जाता है।

इस प्रकार पुरूष की यह महान आत्मा 84 कलाओं से सम्पन्न होता है। इनमें 56 कला पितरों की होती है तथा 28 उसकी स्वयं की होती है। आधुनिक विज्ञान इसी 28 कलाओं को गुण सूत्र का नाम से दुनिया को समझती है |

|| पितृ ऋण, देव ऋण और गुरु ऋण क्यों ? ||

अत: इस प्रकार पितरों के अंश को प्राप्त करके जन्म ग्रहण करने वाला पुरूष सात जन्म के काल क्रम तक पितरों का ऋणी होता है। जैसा कि तैतरीय ब्राह्मण मे कहा गया है-  “एष वै जायमानस्त्रभिर्ऋण्वान् जायते ब्रह्मचय्र्येण ऋषिभ्यो, यज्ञेन देवेभ्य:, प्रजया पितृभ्य:। एष वा अनृणी य: पुत्री यज्वा ब्रह्मचारी च।” (तैत्तरीय संहिता) |  इस तरह इस धरती पर जन्म लेने वाला हर जातक पितृऋण के साथ पैदा होता है | यज्ञ से देवताओं का तथा प्रजा रूप सन्तान क्रम से पितरों के ऋण का प्रत्यर्पण होता है। जो पुत्रवान् हो, यज्ञ करने वाला हो तथा ब्रह्मचर्य पालन करता हुआ वेदों के अध्ययन में रत हो, वही अनृणी (उऋण) माना जाता है। स्मृति में वर्णन है की पूर्व की सात पीढ़ियों में पिता-पितामह-प्रपितामह ये तीन पीढियां पितर पिंड की भागी होती हैं और आदि चार पूर्व पितर लेपमात्र के ग्राही होते हैं |

 

डॉ. मदन मोहन पाठक

( धर्म शास्त्र विशेज्ञ )

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