जानिये स्त्री तत्व को

जानिये स्त्री तत्व को

सृष्टि का ज्ञात कारण है   ईषत-इच्छा

’एकोहं बहुस्याम”

यही जीवन का उद्देश्य भी है । जीवन के लिये युगल-रूप की आवश्यकता होती है । अकेला तो ब्रह्म भी रमण नहीं कर सका….

”स: एकाकी, नैव रेमे । स

द्वितीयमैच्छत ।“

तत्व दर्शन में ..ब्रह्म- माया, पुरुष-प्रकृति , वैदिक साहित्य में ..योषा-वृषा … संसार में……नर-नारी…।

 

ब्रह्म स्वयं माया को उत्पन्न करता है… अर्थात माया स्वयं ब्रह्म में अवस्थित है……

जो रूप-सृष्टि का सृजन करती है, अत: जीव-शरीर में– माया-ब्रह्म अर्थात पुरुष व स्त्री दोनों भाव होते हैं।

शरीर – माया, प्रकृति अर्थात स्त्री-भाव होता है । अत: प्रत्येक शरीर में स्त्री-भाव व पुरुष-भाव अभिन्न हैं।

आधुनिक विग्यान भी मानता है कि जीव में ( अर्थात स्त्री-पुरुष दोनों में ही) दोनों तत्व-भाव होते हैं। गुणाधिकता (सेक्स हार्मोन्स या माया-ब्रह्म भाव की न्यूनता अधिकता) के कारण स्त्री, स्त्री बनती है…पुरुष, पुरुष।

 

तत्वज्ञान एवं परमाणु-विज्ञान के अनुसार इलेक्ट्रोन- ऋणात्मक-भाव है … स्त्री रूप है । उसमें गति है, ग्रहण-भाव है।

प्रोटोन..पुरुष है….अपने केन्द्र में स्थित, स्थिर, सबसे अनजान, अज्ञानी-भाव रूप, अपने अहं में युक्त, आक्रामक, अशान्त …

धनात्मक भाव ।  स्त्री- पुरुष के चारों ओर घूमती हुई उसे खींचती है, यद्यपि खिंचती हुई लगती है, खिंचती भी है, आकर्षित करती है,आकर्षित होती हुई प्रतीत भी होती है|

इस प्रकार वह पुरुष की आक्रामकता, अशान्ति को शमित करती है, धनात्मकता को नयूट्रल, सहज़, शान्ति भाव करती है…. यह परमाणु का, प्रकृति का सहज़ सन्तुलन है।

 

वेदों व गीता के अनुसार शुद्ध-ब्रह्म या पुरुष अकर्मा है,  मायालिप्त जीव रूप में पुरुष कर्म करता है |

माया व प्रकृति की भांति ही स्त्री- स्वयं कार्य नहीं करती अपितु पुरुष को अपनी ओर खींचकर, सहज़ व शान्त करके कार्य कराती है परन्तु स्वय़ं कार्य करती हुई

भाषती है, प्रतीत होती है। नारी –पुरुष के चारों ओर घूमते हुए भी कभी स्वयं आगे बढकर पहल नहीं करती, पुरुष की ओर खिंचने का अभिनय करते हुए उसे

अपनी ओर खींचती है।  वह सहनशीला है। पुरुष आक्रामक है, उसी का शमन स्त्री करती है,

जीवन के लिये, उसे पुरुषार्थ प्राप्ति हेतु, मोक्ष हेतु ।

भारतीय दर्शन के अनुसार जीवन के चार पुरुषार्थ हैं –

धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष….  स्त्री –धर्म (गुणात्मकता) व काम (ऋणात्मकता) रूप है,  पुरुष….अर्थ (धनात्मकता) व काम (ऋणात्मकता ) रूप है…

स्त्री– पुरुष की धनात्मकता को सहज़-भाव करके मुक्ति की प्राप्ति कराती है।

यह स्त्री का स्त्रीत्व है।

 

कबीर गाते हैं….

“हरि मोरे पीउ मैं हरि की बहुरिया…”

अर्थात मूल-ब्रह्म पुरुष-रूप है

अकर्मा,

परन्तु जीव रूप में ब्रह्म ( मैं ) मूलत:…स्त्री-भाव है ताकि संतुलन रहे।

अत: यदि पुरुष अर्थात नर भी यदि स्वयं नारी की ओर खिंचकर स्त्रीत्व-भाव धारण करे,

ग्रहण करे तो उसके अहम, धनात्मकता, आक्रामकता का शमन सरल हो

तथा जीवन, पुरुषार्थ व मोक्ष- प्राप्ति सहज़ हो जाय ।

 

प्रश्न यह उठता है कि यदि नारी स्वयं ही पुरुष-भाव ग्रहण करने लगे, अपनाने लगे तो ?

यही आज हो रहा है । पुरुष तो जो युगों पहले था वही अब भी है ।

ब्रह्म नहीं बदलता, वह अकर्मा है, अकेला कुछ नहीं है। ब्रह्म का मायायुक्त रूप, पुरुष जीवरूप तो नारीरूपी पूर्ण स्त्रीत्व- भाव से ही बदलता है, धनात्मकता, पुरुषत्व शमित होता है, उसका अहम्-क्षीण होता है, शान्त-शीतल होता है, क्योंकि उसमें भी स्त्रीत्व-भाव सम्मिलित है। परन्तु स्त्री आज अपने स्त्रीत्व को छोडकर पुरुषत्व की ओर बढ रही है।

आचार्यों का कथन है कि-

’यदि स्त्री, पुरुष जैसा होने की चेष्टा करेगी तो जगत में जो भी मूल्यवान तत्व है वह खो जायगा । हम बडे प्रसन्न हो रहे हैं कि लडकियां, लडकों की भांति आगे बढ रही है।

माता-पिता बडे गर्व से कह रहे हैं कि हम लडके–लडकियों में कोई भेद नही करते खाने, पहनने, घूमने, शिक्षा सभी मैं बराबरी कर रही हैं, जो क्षेत्र अब तक लडकों के,

पुरुषों के माने जाते थे उनमें लडकियां नाम कमा रही है। परन्तु क्या लडकियां स्त्री-सुलभ कार्य, आचरण-व्यवहार कर रही हैं?

परन्तु मूल भेद तो है ही… सृष्टि महाकाव्य में कहा गया है ….

‘ भेद बना है, बना रहेगा, भेद-भाव व्यवहार में नहीं हो | ‘

क्या आज की शिक्षा उन्हें नारीत्व की शिक्षा दे रही है?

आज सारी शिक्षा-व्यवस्था तथा समाज भी भौतिकता के अज्ञान में फ़ंसकर लडकियों को लड़का बनने दे रहा है।

यदि स्त्री स्वयं ही पुरुषत्व व पुरुष-भाव की आक्रमकता, अहं- भाव, धनात्मकता ग्रहण कर लेगी तो उसका सहज़ ऋणात्मक- भाव, उसका कृतित्व,

उसका आकर्षण समाप्त हो जायगा। वह पुरुष की अह्मन्यता, धनात्मकता को कैसे शमन करेगी?

पुरुष-पुरुष अहं का टकराव विसन्गतियों को जन्म देगा।

नारी के स्त्रीत्व की हानि से उसके आकर्षणहीन होने से वह सिर्फ़ भोग-उपभोग की बस्तु बनकर रह् जायगी ।

पुरुषों के साथ-साथ चलना, उनके कन्धे से कन्धा मिला कर चलना एक पृथक बात है आवश्यक भी है

परन्तु लडकों जैसा बनना, व्यवहार, जीवनचर्या एक पृथक बात।

आज नारी को आवश्यकता शिक्षा की है, साक्षरता की है, उचित ज्ञान की है। आवश्यकता स्त्री-पुरुष समता की है, समानता की नहीं, स्त्रियोचित ज्ञान, व्यवहार जीवनचर्या त्यागकर पुरुषोचित कर्म व व्यवहार की नहीं…..।

इसलिये आग्रह है कि नारित्व का सम्मान करें और उसकी रक्षा करें उसे पुरुष बनने के लिये प्रोत्साहित या मजबूर न करें , यही स्त्री , पुरुष व मानव जाति के हित में है

अन्यथा प्रकृति की साम्यावस्था बिगड़ते ही कुछ शेष नहीं बचेगा ।

सुन्दर कुमार 

( प्रधान सम्पादक )

 

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