जानिये होली का शास्त्रीय विधान

लोककथा के अनुसार हिरण्यकशिपु की भगिनी होलिका ने प्रह्लाद के वध के लिए उसे अपनी गोद में लेकर अग्नि में प्रवेश किया और स्वयं को एक ऐसे वस्त्र से ढंक लिया जिससे अग्नि उसे न जला पाए । लेकिनवायु ने उस वस्त्र को होलिका से हटा कर प्रह्लाद पर डाल दिया जिससे प्रह्लाद बच गया लेकिन होलिका जल गई । इस लोककथा के पौराणिक स्रोत का पता नहीं लग पाया है । लेकिन कथा अपने आप में कमरहस्यमयी नहीं है ।
पुराणों में होलिका का संदर्भ एकमात्र नारद पुराण १.१२४.७८ में फाल्गुन पूर्णिमा के संदर्भ में प्राप्त हो पाया है जहां फाल्गुन पूर्णिमा को होलिका पूजन के लिए निम्नलिखित मन्त्र का विधान है :
असृक्पाभयसंत्रस्तै: कृता त्वं होलि बालिशै: । अतस्त्वां पूजयिष्यामि भूते भूतिप्रदा भव ।।
इसका अर्थ है कि रक्त पीने वाले राक्षसों के भय से त्रस्त होकर बालिशों द्वारा होलि की रचना की गई । अतः हे होलि, मैं तेरा पूजन करता हूं, तू मेरे लिए भूतिप्रद, समृद्धि दायक हो । इससे आगे कहा गया है किहोलिका राक्षसी है, प्रह्लाद को भय देने वाली है, अतः इसका काष्ठ आदियों से तथा गीत वाद्यादि से प्रदाह करते हैं । फिर कहा गया है कि यह संवत्सर का दाह है और यह भी कि यह काम का दाह है । नारद पुराणके इस कथन का एक – एक शब्द महत्त्वपूर्ण है ।
होली को समझने के लिए सर्वप्रथम होलिका शब्द के निर्वचन पर ध्यान देते हैं । उणादि कोश के वार्तिकों में ह्री शब्द से ह्रीक, ह्लीक आदि शब्दों की व्युत्पत्ति के उल्लेख हैं । ह्री को लज्जा के अर्थ में लियाजाता है । महाभारत वन पर्व ३१३.८८ के अनुसार ह्री अकार्य से निवर्तन करती है, रोकती है । लक्ष्मीनारायण संहिता २.२४५.४९ के अनुसार जीव रथ में ह्री वरूथ रूप है, वह शत्रुओं से रक्षक सेना व्यूह का कार्य करतीहै । तैत्तिरीय आरण्यक में परमेश्वर की पत्नियों के रूप में ह्री व लक्ष्मी का उल्लेख है । ह्लीक से होलि शब्द की व्युत्पत्ति हो सकती है या नहीं, यह विचारणीय है । यह संभव है कि हिरण्य शब्द की उत्पत्ति भी ह्री सेही हुई हो । अंग्रेजी भाषा में होली शब्द का प्रयोग पवित्र के अर्थ में होता है ।
होलिका शब्द की एक निरुक्ति का प्रयास होला, होरा से किया जा सकता है । होरा का सामान्य अर्थ एक क्षण का समय होता है जिसे अंग्रेजी में आवर कहा जाता है । होरा से तात्पर्य अहोरात्र से भी लिया जासकता है जिसमें अ व त्र अक्षरों का लोप हो जाता है । यह भी संभव है कि संस्कृत का होरा अंग्रेजी के ओरा, आभामण्डल का संकेतक हो । वर्तमान संदर्भ में आभामण्डल का संकेतक अर्थ ही सबसे अधिक ठीकबैठता है । ऊपर नारद पुराण का कथन उद्धृत किया गया है जिसमें कहा गया है कि होलि की रचना बालिशों द्वारा की गई । जैसा कि वृन्दा व कृपा शब्द की टिप्पणी में कहा जा चुका है, बालिशः का अर्थ बाल, वालआदि हो सकते हैं । वाल शब्द का अर्थ मण्डल होता है । उगते हुए बाल सूर्य के परितः एक मण्डल होता है । जब तक व्यक्तित्व में पूर्ण सूर्य का उदय न हुआ हो, तब तक यही स्थिति रहती है । नारद पुराण के इससंदर्भ में कहा गया है कि होलि की यह स्थिति भी रक्त पीने वाले राक्षसों से रक्षा करती है लेकिन प्रह्लाद को यह भय पहुंचाने वाली है । अतः इसका दहन ही उपयुक्त है । कहा गया है कि यह संवत्सर का दाह है, यह काम का दाह है । इसका अर्थ यह हुआ कि यदि पूर्ण सूर्य का उदय हो जाए तभी काम दाह हो सकता है, केवल होलिका के रूप में आभामण्डल के विकास मात्र से नहीं । आभामण्डल का उदय – अस्त होता रहता है। वह पर्याप्त नहीं है । नारद पुराण के इस कथन का सर्वाधिक उत्कृष्ट रूप ऋग्वेद व अथर्ववेद के निम्नलिखित मन्त्र में मिलता है :
शीतिके शीतिकावति ह्लादिके ह्लादिकावति ।
मण्डूक्या३ सु सं गम इमं स्वग्निं हर्षय ।। – ऋग्वेद १०.१६.१४, अथर्ववेद १८.३.६०
ऋग्वेद के इस सूक्त का ऋषि यम – पुत्र दमन है । देवता अग्नि है । यह मन्त्र अनुष्टुप् छन्द में है । ऋग्वेद के इस सूक्त का विनियोग पितृदाह हेतु है । शव दाह के पश्चात् अस्थि संचयन कार्य से पहले क्षीरोदक सेशमीशाखा द्वारा पूरे श्मशान का तीन बार इस मन्त्र से प्रोक्षण किया जाता है । पहले अग्नि का उपयोग शव के दाह के लिए किया गया । अब इस ऋचा में कहा जा रहा है कि हे अग्नि, तुम शीतदायक होओ, तुमह्लाददायक होओ, जैसे मण्डूक वर्षा की कामना करता है, ऐसे होओ और हर्ष प्रदान करो । नारद पुराण में जिसे संवत्सर दाह, काम दाह कहा गया है, उसे इस सूक्त का पितृमेध माना जा सकता है । मूल भाव यह हैकि हमारे जो पूर्व कर्म फल उत्पन्न करने वाले हैं, जो बीजों की भांति कार्य करते हैं, उन कर्मों को पहले बीज की तरह भून दिया जाए जिससे वे आगे फलीभूत न हों । संस्कृत भाषा में भुने हुए अन्न को होलक कहतेहैं ( द्र. – शब्दकल्पद्रुम ) । उससे आगे शीत रूप में शान्ति की, ह्लाद की कामना की गई है । यह ह्लाद पुराणों का प्रह्लाद हो सकता है । होलिका दहन का कार्य फाल्गुन मास की पूर्णिमा को सम्पन्न होता है । फल्गुशब्द का अर्थ व्यर्थ, निरर्थक होता है, जब पूर्व कृत कर्म निरर्थक हो जाएं, वह फलीभूत न हों । पहली अवस्था पूर्व – कृत कर्मों को निरर्थक बनाने की है । यह संभव है कि यह कर्म आभामण्डल द्वारा, औरा द्वारासम्पन्न हो जाता हो । उससे अगली स्थिति इस औरा को भी जला डालने की है । यह कैसे संभव होगा । अनुमान है कि देह से उत्पन्न अग्नि इतनी प्रबल हो जाएगी कि औरा का महत्त्व नहीं रहेगा । वह भस्म कीस्थिति होगी ।
होलिका शब्द की एक निरुक्ति हुल धातु के आधार पर की जा सकती है । हुल धातु हिंसा व संवरण के अर्थ में है । लोक कथा में होलिका स्वयं को अग्नि के बचाने के लिए एक वस्त्र द्वारा स्वयं का संवरणकर लेती है । यह संवरण आभामण्डल का प्रतीक हो सकता है । लक्ष्मीनारायण संहिता में ह्री को वरूथ कहा गया है । अतः होलिका ह्री का पूर्व रूप हो सकता है ।
प्रह्लाद की पौराणिक कथाओं से संकेत मिलता है कि ह्री से प्रह्लाद का जन्म होता है और उससे आगे श्री के सम्पादन की स्थिति है । एक कथा में आता है कि शील के विनाश से श्री ने प्रह्लाद को त्यागदिया ।
होलिका मन्त्र में प्रकट होने वाले बालिशै: शब्द की व्याख्या डा. लक्ष्मीनारायण धूत द्वारा वृन्दा शब्द के संदर्भ में इस प्रकार से भी की गई है कि प्रकृति में तीन प्रकार की अभीप्साएं विद्यमान हैं । जहांकिसी अभीप्सा का अभाव है, वह तमोगुणी प्रकृति है । जहां प्रकृति में विकास के लिए किंचित् अभीप्सा का उदय हुआ है, वह रजोगुणी प्रकृति है । जहां अभीप्सा पूर्णतः विकसित है, वह सत्वगुणी प्रकृति है ।बालिशः के संदर्भ में प्रकृति को रजोगुणी मान सकते हैं । बालिशों द्वारा होलिका की सृष्टि की जाती है । यह होलिका राक्षसों से रक्षा तो कर सकती है, लेकिन प्रह्लाद रूपी सतोगुणी प्रकृति की रक्षा नहीं कर सकती। होलिका दहन के अवसर पर होलिका में विभिन्न प्रकार की मालाओं को अर्पित किया जाता है । कुछ मालाएं गोबर से बने बडकुल्लों से बनती हैं और कुछ विशेष प्रकार के मिष्टान्नों, सूखे मेवों आदि से । माला केबीच में एक विशिष्ट मणि को रखा जाता है । यह कहा जा सकता है कि मणियां मन का प्रतीक हैं और सूत्र प्राण का । होलिका दहन संवत्सर दहन भी है । संवत्सर का जन्म प्राण, मन और वाक् के संयोग से, अथवासूर्य, चन्द्रमा और पृथिवी के विशेष संयोग से होता है । माला में मन रूपी मणियों और सूत्र रूपी प्राण का संयोग कह सकते हैं । इसमें वाक् का संयोग किस प्रकार किया जाना है, यह अन्वेषणीय है । उद्देश्य यही हैकि किसी प्रकार से रजोगुणी अभीप्सा का विकास सतोगुणी अभीप्सा में हो । व्रज भूमि में होलिका के अवसर पर राधा व कृष्ण की प्रेम केलि भी अभीप्सा के सत्त्व गुण को दर्शाती है । होलिका दहन के अवसर परकाष्ठ से बने खड्ग अर्पित करने का भी विधान है । यज्ञ कर्म में काष्ठ से बने खड्ग का उपयोग ब्राह्मण राक्षसों के वध के लिए करता है । क्षत्रिय लोहे आदि की खड्ग का उपयोग करता है लेकिन ब्राह्मण काष्ठ कीखड्ग का, जिसे स्फ्य कहते हैं । यह खड्ग ध्यान से, समाधि से प्राप्त शक्ति हो सकती है क्योंकि काष्ठवत् स्थिति समाधि में ही प्राप्त होती है, ऐसा डा. फतहसिंह का मत है ।
होलिका के संदर्भ में भविष्य पुराण ४.१३२ में ढुंढा राक्षसी की कथा है जिसमें वह ब्रह्मा से किसी भी शस्त्र से, किसी भी ऋतु में, देव या मनुष्य से वध न होने का वर प्राप्त करती है । उसका दूसरा नामअडाअडा है । उसके वध के लिए संवत्सर की संधि के काल का चयन किया जाता है । शस्त्र के रूप में काष्ठ का खड्ग है । ढुंढ धातु अन्वेषण के अर्थ में प्रयुक्त होती है । और अड धातु उद्यम के अर्थ में । प्रकृति मेंसामान्य स्थिति यही है कि वह सतत् अन्वेषणशील है और उद्यमी है । जो ऊर्जा क्रिया में, उद्यम में लग रही है, लगता है कि पुराणकार का उद्देश्य उसको वहां से निकाल कर किसी प्रकार से उच्चतर विकास मेंलगाना है । इसके लिए काष्ठ स्थिति, समाधि की, वास्तविक सत्य की स्थिति का चयन किया जाता है । काष्ठ में अग्नि को कैसे प्रज्वलित करना है, यह अन्वेषणीय है । अडा शब्द का दूसरा अर्थ अरा से भी लियाजा सकता है । रथ के चक्र में एक नाभि होती है, उसके परितः अरे होते हैं और अरों के परितः परिधि होती है । डा. फतहसिंह के अनुसार अर, अर्यमा आदि शब्दों का प्रयोग बिखरी हुई ऊर्जा को एकत्रित करकेशक्तिशाली बनाने में होता है । रथचक्र की नाभि ऊर्जा के केन्द्रीभूत होने का सर्वाधिक शक्तिशाली स्थान है, उससे कम शक्तिशाली अरे और सबसे कम शक्तिशाली परिधि । नारद पुराण के होलिका मन्त्र मेंअसृक्पा शब्द प्रकट हुआ है । असृक् देह में भोजन से बने रस को, रक्त आदि को कहते हैं । लेकिन जब वैदिक शैली के अनुसार विचार करते हैं तो रस का अर्थ एण्ट्रांपी में कमी करना, उच्छ्रंखल हुई ऊर्जा कोव्यवस्थित करना होता है । अतः मन्त्र का सम्यक् अर्थ यह हो सकता है कि जो आसुरी शक्तियां रस को पी जाती हैं, ऊर्जा में अव्यवस्था उत्पन्न करती हैं, उसके उपचार के रूप में होलिका की रचना की गई है ।
जैसा कि ऊपर उल्लेख किया जा चुका है, अहोरात्र शब्द में अ तथा त्र अक्षरों का लोप करने से होरा बनता है और संभावना यह है कि होरिका या होलिका शब्द की व्युत्पत्ति का यह स्रोत हो सकता है । जबअहोरात्र का संदर्भ आता है तो भौतिक जगत में अहोरात्र का जन्म पृथिवी द्वारा अपनी धुरी पर भ्रमण करने के कारण होता है । पृथिवी की दूसरी गति सूर्य के परितः परिक्रमा है । लेकिन लगता है कि होलिकास्थिति केवल पृथिवी द्वारा अपनी धुरी पर भ्रमण से सम्बन्धित है । भौतिक जगत में तो यह घटना सामान्य लगती है लेकिन जब अध्यात्म में प्रवेश करेंगे तो भौतिक जगत की एक – एक घटना को स्वयं परघटाने के लिए विशेष प्रयासों की आवश्यकता होगी । यह कहा जा सकता है कि पृथिवी द्वारा अपनी धुरी पर भ्रमण संवत्सर निर्माण का पहला चरण है । उससे आगे पृथिवी द्वारा सूर्य की परिक्रमा तथा चन्द्रमाद्वारा पृथिवी की परिक्रमा के विषय में सोचना पडेगा ।
डॉ.दीनदयाल मणि त्रिपाठी ( प्रबंध सम्पादक )

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