ज्ञान मुद्रा तथा भद्रा मुद्रा का रहस्य

ज्ञान मुद्रा तथा भद्रा मुद्रा का रहस्य

“श्लोकार्धेन प्रवक्ष्यामीमि, यदुक्तं ग्रंथकोटिभिः ।
ब्रह्म सत्यं जगन्मित्थ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः ।।

करोड़ों ग्रंथों में जो विस्तार से कहा गया है उसे आधे श्लोक के द्वारा संक्षेप से कहूँगा । एकमात्र ब्रह्म ही सत्य है-त्रिकालाबाधित परमार्थ-सत्य है , और यह त्रिगुणात्मक नाम-रूपवाला संसार मित्थ्या है-यथार्थ नही। एवं यह जीवात्मा वस्तुतः ब्रह्म ही है ,-अन्य नही ।

कृपालु भगवान शंकर अपने शिष्यों को यही संक्षिप्त सारभूत उपदेश, हाथ की भद्रा मुद्रा के द्वारा देते है ।

“” हाथ में पांच अंगुलिया है , जिनके क्रमशः अंगुष्ठ, तर्जनी, मध्यमा, अनामिका, एवं कनाष्ठिका ये नाम है ।

“”हाथ मे एक तरफ अकेला अंगुठा रहता है , दूसरी तरफ चार अंगुलिया रहती है ।

“”इनमे अंगुठा परमेश्वर/ब्रह्म का प्रतीक है । एक तरफ परमेश्वर तो दूसरी तरफ सारी दुनिया रहती है । इस प्रकार अंगुष्ठ के समान परमेश्वर को देख लेने पर यह संसार समाप्त होता है।

“” अंगुष्ठ के समीप तर्जनी अंगुली जीवात्मा की प्रतीक है । इसलिए लोक मे इस तर्जनी अंगुली को दिखाकर ही अपने अभिमान को किसी दुर्बल के सामने प्रदर्शित किया जाता है ।

“” परिशिष्ट तीन अंगुलिया -मध्यमा , अनामिका एवं कनिष्ठिका , तीन गुणों के प्रतीक है।

“” कनिष्ठिका जो सबसे छोटी है , वह सत्वगुण को प्रदर्शित करती है । सत्वगुण संसार मे बहोत थोडा है -कही कही हजारों में किसी एक मे ही उसका दर्शन होता है ।

“” अनामिका अंगुलि जो कनिष्ठिका से थोड़ी बडी है , वह रजो गुण का निर्देश करती है ।आजकल दुनिया मे रजोगुण खूब बढा हुआ नजर आता है ।

“” एवं मध्यमा अंगुली , जो बीच मे तथा सबसे लम्बी है , वह तमोगुण की प्रतीक है ।संसार मे रजोगुण से भी तमोगुण खूब बढा चढा नजर आता है ।

“” इसप्रकार ये तीन अंगुलिया , तीन गुण एवं तीन गुणों के बने त्रिगुणात्मक संसार का ज्ञापन कराती है ।

“” इस संसार मे एवं तीनो गुणों मे यह जीवात्मा (मध्यमा अंगुली से ज्ञापीत ) अनादिकाल से आसक्त बना बैठा है ,इसलिए भगवान ने अर्जुन के प्रति उपदेश दिया है कि -“निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन”हे अर्जुन तू तीनो गुणों से रहित-निस्त्रैगुण्य हो जा ।

ऐसा ही भगवान सदाशिव शंकर भद्रा मुद्रा के द्वारा तीनो गुणों को त्यागने का उपदेश देते है । जबतक यह जीवात्मा त्रिगुणात्मक संसार से अहंभाव का परित्याग नही करता , तब तक वह ईश्वर के अभिमुख (अंगुष्ठ से ज्ञापीत ) ईश्वर का प्रेमी नही हो सकता । जब वह विवेक विचार के द्वारा त्रिगुणात्मक असार संसार से अपना नाता तोड डालता है , तब वह विना विलम्ब ही ईश्वरात्मा के साथ अभेदभाव से मिल जाता है ।

भगवान शंकर की भद्रा मुद्रा का मौन व्याख्यान यही उपदेश देता है की -त्रिगुणात्मक संसार मित्थ्या है , उसको छोडो , एवं जीवात्मा को उस परमात्मा से जोडो , जिससे यह जीव सर्वथा अनन्य है , अभिन्न है ।

यही तर्जनी एवं अंगुष्ठ का सम्बन्ध सूचित करता है , तर्जनी अंगुली जब साथमे जुटी हुई इन तीनो अंगुलियों से अलग होती है , तभी ही उसका अंगुष्ठ के साथ मिलाप होता है । यही भद्रा मुद्रा का रहस्य है ।।

” स्वात्मानं प्रकटीकरोति भजतां यो मुद्रया भद्रया ।
तस्मै श्री गुरुमूर्तये नम इदं श्री दक्षिणामूर्तये ।।

डॉ. दीनदयाल मणि त्रिपाठी ( प्रबंध संपादक )

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